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दशकों बाद भी न लिया सबक: मिडे डे मील में परोसा जा रहा घटिया खाना, 32 साल पहले इसी गांव में भूख से हुई थी मौतें
Sat, 06 Jul 2024 10:43 PM IST
श्याम जी.
अमर उजाला नेटवर्क, बलरामपुर रामानुजगंज
अमर उजाला नेटवर्क, बलरामपुर रामानुजगंज
Published by: श्याम जी.
Updated Sat, 06 Jul 2024 10:43 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में एक ऐसा स्कूल है, जहां बच्चों को मिड डे मील के नाम पर छला जा रहा है। उन्हें घटिया भोजन परोसा जा रहा है। पंडो जनजाति के लोग यहां रहते हैं और उनके बच्चे इसके खिलाफ में आवाज नहीं उठा पा रहे हैं।
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मिड डे मील
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बलरामपुर जिले का बीजाकुरा गांव जहां 1992 में भूख से मौत की खबर ने देश के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को यहां आने के लिए मजबूर कर दिया था। इसके बाद देश में खाद्य सुरक्षा को लेकर नियम कानून बनने शुरू हुए, लेकिन आज भी इस गांव में बच्चों को दिए जाने वाले मिड डे मील में बड़ा घोटाला किया जा रहा है। यहां बच्चों को मिड डे मील के नाम पर चावल में घटिया किस्म की दाल मिलाकर खिचड़ी के रूप में परोसा जा रहा है। पंडो जनजाति के लोग यहां रहते हैं और उनके बच्चे इसके खिलाफ में आवाज नहीं उठा पा रहे हैं।
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बलरामपुर जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर से अधिक दूरी पर बीजाकुरा गांव स्थित है। यहां स्थित सरकारी स्कूल में सबसे अधिक विशेष पिछड़ी जनजाति यानी पंडो जनजाति के बच्चे पढ़ने के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इस स्कूल में बच्चों के साथ मध्यान्ह भोजन के नाम पर छलावा किया जा रहा है। यहां चावल में कुछ दाल मिलाकर दी जा रही है।
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चावल में हल्का सा हल्दी का पाउडर डाला गया था, जिससे खिचड़ीनुमा चावल पीले रंग के रंग के दिख रहे थे, लेकिन खाने में बिल्कुल बेस्वाद। वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अफसर निगरानी के लिए नहीं आते हैं। यही वजह है कि मनमाने तरीके से बच्चों को ऐसा घटिया भोजन मिड डे मील के नाम पर परोसा जा रहा है। दूसरी तरफ महिला समूह के सदस्यों का कहना है कि सरकार से इतना कम पैसा मिलता है कि वे मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम चलाने में समर्थ नहीं हैं। ऐसे हाल में शिक्षक महिला समूह की लापरवाही बता रहें हैं।
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बीजाकुरा गांव की प्राथमिक पाठशाला में पढ़ने वाले इन बच्चों को अब तक स्कूली ड्रेस तक नहीं मिली है। बच्चे यहां फटे-पुराने कपड़े पहनकर नंगे पैर स्कूल आने के लिए मजबूर हैं। वहीं, दूसरी तरफ बच्चों के पास किताब और कॉपी तक नहीं है। स्कूल की व्यवस्था दुरुस्त नहीं होने के कारण अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे हैं तो दूसरी तरफ यहां जागरूकता की भी बड़ी कमी है। ऐसे हाल में देखना होगा कि आखिर पांडो जनजाति के इन बच्चों को सही शिक्षा मिल सके, इसके लिए जिला प्रशासन के अधिकारी क्या कदम उठाते हैं। हालांकि अफसरों का कहना है कि उनके द्वारा यहां की व्यवस्था को दुरुस्त किया जाएगा और स्कूलों का जायजा लिया जाएगा।