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बस्तर से दिल्ली तक..'हर किसी को देशद्रोही ठहराने की होड़'

Sun, 28 Feb 2016 06:24 PM IST
Updated Sun, 28 Feb 2016 06:24 PM IST
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police harrasment Increasing in chhatisgarh

दिल्ली एक तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असंतोष जताने के अधिकार के लिए युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गया है और इस निष्कर्ष से भागना मुश्किल लग रहा है। पिछली बार हम लोगों ने इस तरह का असंतोष तब देखा था जब 16 दिसंबर, 2012 की रात 23 साल की मेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्कार किया गया था।

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इस बार एक विश्वविद्यालय परिसर में लगाए गए नारों को लेकर आया उबाल बंटा हुआ है। लेकिन जो सवाल उठ रहे हैं, वो बेहद अहम हैं- क्या अब भी हम सरकार पर सवाल उठाने की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं? क्या अब भी हम उन लोगों का सम्मान करते हैं जो दूसरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए खड़े होते हैं?
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दिल्ली से कोई 1500 किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के बस्तर में, यही सवाल कहीं ज़्यादा विरोधी अंदाज़ में उठते रहे हैं, ऐसे सवालों के प्रति राज्य सरकार का दमन अपने चरम पर है।
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स्थानीय कार्यकर्ता और पत्रकारों के लिए पुलिसिया पूछताछ आम बात है, लेकिन अब तो मनमानी तरीक़े से हिरासत में लेने का ख़तरा भी बढ़ गया है। स्थानीय पत्रकार संतोष यादव बीते पांच महीनों से फ़र्ज़ी आरोपों के तहत हिरासत में हैं, सितंबर, 2015 में हिरासत में लिए जाने से पहले भी पुलिस उनको प्रताड़ित किया करती थी।

एक बार तो उन्हें नंगा करके पीटा गया, क्योंकि वे इस क्षेत्र के आदिवासियों की दुर्दशा के बारे में रिपोर्टिंग किया करते थे और कइयों को उन्होंने क़ानूनी सहायता भी दिलवाई थी।

हज़ारों आदिवासियों पर नक्सली होने का आरोप लगाया जाता रहा है, इन संदिग्धों से छत्तीसगढ़ के जेल भरे हुए हैं। जगदलपुर क़ानूनी सहायता समूह के आंकड़ों की मानें तो राज्य की जेलों में 253 फ़ीसदी ज़्यादा क़ैदी बंद हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 114 फ़ीसदी का है। कांकेर में यह 428 फ़ीसदी ज़्यादा है।

वकील और पत्रकार हो चुके हैं शिकार

police harrasment Increasing in chhatisgarh

संतोष यादव की वकील ईशा खंडेलवाल ग्रामीण आदिवासियों को मुफ़्त में क़ानूनी सहायता मुहैया कराती रही हैं और अब अपने साथी शालिनी गेरा के साथ जगदलपुर क़ानूनी सहायता समूह का हिस्सा हैं।

पिछले सप्ताह इन वकीलों को उनके मकान मालिकों ने घर ख़ाली करने को कहा, क्योंकि मकान मालिक को अचानक से पुलिस ने पूछताछ के लिए बुला लिया था। इसी तरह का नोटिस मालिनी सुब्रमण्यम को भी हाल ही मिला, मालिनी बस्तर में रहने वाली राष्ट्रीय स्तर की पत्रकार हैं और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की रिपोर्टिंग करती हैं।

ये कार्यकर्ता और पत्रकार एक दूसरे के कामों की मदद करते रहे हैं, खंडेलवाल सुब्रमण्यम की तब वकील थीं जब उन्होंने सामाजिक एकता मंच के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी।

यह मंच माओवादी विरोधी समूह है जिसके राज्य पुलिस से संबंध हैं, इस मंच ने मालिनी के घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था और मालिनी को नक्सलियों का समर्थक घोषित किया था।

मालिनी सुब्रमण्यम ने संतोष यादव की गिरफ़्तारी पर भी रिपोर्टिंग की हैं, संतोष को छत्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट और ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियां निषेधात्मक क़ानून (यूएपीए) के तहत गिरफ़्तार किया गया।

जगदलपुर क़ानूनी सहायता समूह के दोनों वकील और मालिनी सुब्रमण्यम अब बस्तर से बाहर कर दिए गए हैं, दूसरी तरफ़ संतोष अभी भी जेल में है। आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी के साथ हिरासत में बलात्कार हुआ था, अपराध मुक्त घोषित होने से पहले उन्हें कई सालों तक हिरासत में रखा गया। उनपर फिर से हमला हुआ।

हमलावरों ने 20 फ़रवरी को उन पर एक ख़तरनाक काला पदार्थ फेंका और उन्हें चेतवानी दी कि अगर उन्होंने बस्तर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना जारी रखा तो उनकी बेटी पर भी हमला करेंगे।

सोनी सोरी हदामा कश्यप के परिवार की मदद कर रही थीं, कश्यप कथित तौर पर माओवादी थे और उनके परिवार वालों का दावा है कि तीन फ़रवरी को पुलिस ने फ़र्ज़ी मुठभेड़ में उन्हें मार दिया।

नक्सली के परिवार की मदद करने पर सामाजिक कार्यकर्ता पर हमला

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सोरी इस मामले की आधिकारिक तौर पर शिकायत दर्ज कराने में परिवार की मदद कर रही थीं। यह कोई संयोग नहीं है कि जिस समय वकीलों और पत्रकारों को बस्तर से बाहर किया जा रहा है, सोनी सोरी पर हमला हुआ है, उसी वक़्त सुरक्षा बलों द्वारा बड़े पैमाने पर हिंसा की ख़बरें भी हुई हैं।

पत्रकार बेला भाटिया को ख़ुद उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। उन्होंने रिपोर्ट की है कि नवंबर से लेकर अब तक तीन ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिनमें सुरक्षा बलों के द्वारा ग्रामीण आदिवासी महिलाओं के साथ गैंगरेप हुआ, यौन उत्पीड़न हुआ और उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ा है।

इन सभी मामलों में पुलिस ने शुरुआती तौर पर एफ़आईआर दर्ज करने से इनकार किया लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के दबाव के चलते उन्हें शिकायत दर्ज करनी पड़ी।

छत्तीसगढ़ पुलिस पत्रकारों को माओवादी समर्थक बताती रही है और अब तो देशद्रोही बताने का भी विकल्प है, बीते सप्ताह बस्तर में बीबीसी हिंदी के पत्रकार को धमकियों के चलते एसाइनमेंट के बीच से ही लौटना पड़ा।

इलाक़े के सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और बस्तर के आईजी ने पत्रकार को संदेश भेजा, “आप जैसे पत्रकारों के साथ अपना समय बर्बाद करने का कोई अर्थ नहीं है। मीडिया का राष्ट्रवादी और देशभक्त तबक़ा कट्टरता से मेरा समर्थन करता है, बेहतर होगा मैं उनके साथ अपना समय गुज़ारूं।”

बस्तर में दिल्ली की ही तरह किसी को देशद्रोही ठहराने का तरीक़ा सरकार के लिए नया हथियार साबित हो रहा है, जब एक बार आप देशद्रोही घोषित कर दिए गए, तो फिर आपके संविधान प्रदत अधिकार छिन जाते हैं।

तब आप सरकार की आलोचना नहीं कर सकते, आप हिंसा से अपनी सुरक्षा नहीं कर सकते हैं, अपशब्दों के ख़िलाफ़ न्याय नहीं मांग सकते। मध्यकालीन यूरोप में जिस तरह से चुड़ैलों को शिकार बनाया जाता था, उसी तर्ज़ पर बस्तर और दिल्ली में आग जला दी गई है और भीड़ तो तैयार खड़ी है।

(आकार पटेल एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं, ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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