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विदेशों में गूंजती हैं सुरेंद्र दुबे की कवितायें: सबकी जुबां पर है 'एला कहिथे छत्तीसगढ़', जब BJP में गये तो...

Thu, 26 Jun 2025 10:11 PM IST
ललित कुमार सिंह अमर उजाला ब्यूरो, रायपुर
अमर उजाला ब्यूरो, रायपुर Published by: ललित कुमार सिंह Updated Thu, 26 Jun 2025 10:11 PM IST
सार

Poet PadmaShri Dr. Surendra Dubey: छत्तीसगढ़ के गौरव, विख्यात हास्य कवि और व्यंग्यकार पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे की कवितायें न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि सात समुंदर पार विदेशों में भी गूंजती थी।

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Poet PadmaShri Dr. Surendra Dubey golden Memorable Moments, Surendra Dubey poems
छत्तीसगढ़ के गौरव, विख्यात हास्य कवि और व्यंग्यकार पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

Poet PadmaShri Dr. Surendra Dubey: छत्तीसगढ़ के गौरव, विख्यात हास्य कवि और व्यंग्यकार पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे की कवितायें न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि सात समुंदर पार विदेशों में भी गूंजती हैं। अमेरिका दौरे के दौरान कही गई उनकी कवितायें खासकर... 'दु के पहाड़ा ल चार बार पढ़,एला कहिथे छत्तीसगढ़..., 'टाइगर अभी जिंदा है...',  ' पीएम मोदी के आने से फर्क पड़ा है...' अभी भी लोगों की जुबां पर है। बड़ों से लेकर बच्चों की जुबां पर भी ये कवितायें रटी रटाई है। प्रदेश के कोने-कोने में ये कवितायें अक्सर सुनने को मिलती हैं। अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय भी उन्होंने एक कविता 'पाँच अगस्त का सूरज राघव को लाने वाला है, राम भक्त जयघोष करो मंदिर बनने वाला है...' लिखी थी। 
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साल 2010 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। वे छत्तीसगढ़ी भाषा, छत्तीसगढ़ी शैली, छत्तीसगढ़ी हास्य साहित्य के अग्रणी स्तंभ थे। उन्होंने पाँच पुस्तकें लिखीं । अपनी कविताओं से देश–विदेश के मंचों और टीवी शो पर लोगों को खूब गुदगुदाया। अपने विलक्षण हास्य, तीक्ष्ण व्यंग्य और अनूठी रचनात्मकता के माध्यम से डॉ. दुबे ने न केवल देश-विदेश के मंचों को गौरवान्वित किया, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा को वैश्विक पहचान दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई। जीवनपर्यंत उन्होंने समाज को हँसी का उजास दिया। वो 1980 में पहली बार अमेरिका गये थे। विश्व के 11 देशों में कविता पाठ किये थे। अमेरिका के 52 शहरों में कविता सुनाई थी।
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साल 2018 में विधानसभा चुनाव के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा का दामन थामा। जब उन्होंने जब बीजेपी का दामन थामा, तो कांग्रेस ने उनसे दूरी बना ली। अपने सभी सरकारी कार्यक्रमों से उन्हें दूर रखा। यहां तक कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उन्हें मौका नहीं दिया गया। जिसका वो गाहे-बगाहे मंच से अपनी व्यंग्य के माध्यम से पीड़ा बयां करते रहे।  




8 जनवरी 1953 को बेमेतरा (तत्कालीन दुर्ग) में उनका जन्म हुआ था। वे मूलतः एक आयुर्वेदिक डॉक्टर थे, पर हास्य और व्यंग्य कविताओं के माध्यम से उन्होंने अपनी एक अलग खास पहचान बनाई थी। हास्य एवं व्यंग्य साहित्य में उनकी एक अनूठी पकड़ थी। उनकी विशेण शैली ने छत्तीसगढ़ी भाषा को ऊंचाई दी। उन्होंने छत्तीसगढ़ी बोली, क्षेत्रीय भाषा को देश-विदेश में पहचान दिलाई। साहित्यिक सेवा के साथ ही डॉक्टरी पेशे में भी उन्होंने महत्वपू्र्ण योगदान दिया।  




उनकी कवितायें कविताएं गुदगुदाती तो थी हीं लोगों को अपने भीतर झाँकने तक को मजबूर कर देती थीं। उनका फुल आत्मविश्वास,भावपूर्ण प्रस्तुति शैली और क्षेत्रीय शब्दावली श्रोताओं को बाँध बांधे रखती थी। देश -विदेश में उनकी कवितायें देखी और सुनी जाती हैं। दूरदर्शन समेत लोकल चैनलों ने भी उनकी कविताओं को घर-घर पहुँचाया। इस वजह से उन्हें साल 2008 में 'काका हाथरसी हास्य रत्न पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।



साल 2018 में उड़ी थी मौत की झूठी खबर
साल 2018 में राजस्थान के कवि जिनका नाम भी सुरेंद्र दुबे ही था। जब उनका निधन हुआ तो उस समय इंटरनेट पर छत्तीसगढ़ के सुरेंद्र दुबे के मौत की खबर तेजी से फैल गई। इस घटना को सुरेंद्र दुबे ने एक कविता बनाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुनाकर लोगों को खूब लोट-पोट करते रहे।





सम्मान और पुरस्कार
  • साल 2008 में 'काका हाथरसी हास्य रत्न पुरस्कार' से सम्मानित 
  • साल 2010 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री सम्मान
  • वर्ष 2012 में पंडित सुंदरलाल शर्मा सम्मान, अट्टहास सम्मान
  •  संयुक्त राज्य अमेरिका में लीडिंग पोएट ऑफ इंडिया सम्मान 
  • अमेरिका के वाशिंगटन में हास्य शिरोमणि सम्मान 2019 से सम्मानित 
  • उनकी रचनाओं पर देश के तीन विश्वविद्यालयों ने पीएचडी की उपाधि भी प्रदान की है।
  • हास्य-व्यंग्य साहित्य की पांच पुस्तकें लिखीं
  • साहित्यिक योगदान के लिये देश-विदेश में सम्मानित


बता दें कि पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे का गुरुवार को रायपुर के एसीआई अस्पताल में हार्ट अटैक से निधन हो गया। उन्हें शाम साढ़े चार बजे के आसपास उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार 27 जून के सुबह साढ़े दस बजे मारवाड़ी श्मशान घाट में किया जायेगा। उनकी अंतिम यात्रा निवास स्थान अशोका प्लेटिनम बंगला नंबर-25 मारवाड़ी श्मशान घाट के लिये निकलेगी। 


कुछ प्रमुख कवितायें...

दु के पहाड़ा ल चार बार पढ़,
आमटहा भाटा ला 
खा के मुनगा ल चिचोर,
राजिम में नहा के
डोंगरगढ़ म चढ़,
एला कहिथे
छत्तीसगढ़ ।।

'मोदी जी कहते हैं काला धन जब्त हो'

लॉदेन मरा कैसे....

'मोदी के आने से बहुत फर्क पड़ा है...'

नेता चल...




'पाँच अगस्त का सूरज राघव को लाने वाला है,राम भक्त जयघोष करो मंदिर बनने वाला है...' 

अपनी मौत की अफवाह पर कविता लिखी-
ये थीं मौत की झूठी खबर पर लिखी खुद सुरेंद्र दुबे की कविता की पंक्तियां
मेरे दरवाजे पर लोग आ गए
यह कहते हुए की दुबे जी निपट गे भैया
बहुत हंसात रिहीस..
मैं निकला बोला- अरे चुप यह हास्य का कोकड़ा है, ठहाके का परिंदा है
टेंशन में मत रहना बाबू टाइगर अभी जिंदा है.
मेरी पत्नी को एक आदमी ने फोन किया
वो बोला- दुबे जी निपट गे,
मेरी पत्नी बोली ऐसे हमारे भाग्य कहां है
रात को आए हैं पनीर खाए हैं
पिज़्ज़ा उनका पसंदीदा है
टेंशन में तो मैं हूं कि टाइगर अभी जिंदा है.
एक आदमी उदास दिखा मैंने पूछा तो बोला मरघट की लकड़ी वाला हूं
बोला वहां की लकड़ी वापस नहीं हो सकती आपको तो मरना पड़ेगा
नहीं तो मेरे 1600 रुपए का नुकसान हो जाएगा
मैंने कहा- अरे टेंशन में मत रह पगले टाइगर अभी जिंदा है.

कोरोना के “शोले” से बचकर..
कोरोना की “दिवार” गिराकर..
कोरोना की “ज़ंजीर” तोड़कर..
वो “मुक़द्दर का सिकंदर”..
फिर “शहंशाह” बनेगा ।।

कवि डॉक्टर सुरेंद्र दुबे
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