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छत्तीसगढ़: हाईकोर्ट से फर्जी अंकसूची पर नौकरी पाने वाले लोको पायलट को झटका, याचिका खारिज

Sat, 10 Oct 2026 03:05 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: अमन कोशले Updated Sat, 10 Oct 2026 03:05 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने फर्जी आईटीआई अंकसूची के जरिए रेलवे में नौकरी पाने वाले लोको पायलट मुकेश कुमार शर्मा की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश को बरकरार रखा।

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No relief from High Court for loco pilot who got job with fake marksheet in Chhattisgarh
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पीपी साहू और न्यायाधीश सचिन सिंह राजपूत की खंडपीठ ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में फर्जी अंकसूची के जरिये नौकरी हासिल करने वाले लोको पायलट को किसी भी प्रकार की राहत देने से इन्कार कर दिया है। उच्च न्यायालय ने आरोपी रेल कर्मचारी की याचिका को खारिज करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के पूर्व आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने रेलवे प्रशासन द्वारा कर्मचारी के दंड को बढ़ाने के उद्देश्य से की गई कार्रवाई को पूरी तरह उचित माना है।
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फर्जी अंकसूची से हासिल की नौकरी
मामला दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मंडल का है, जहां मुकेश कुमार शर्मा मालगाड़ी के लोको पायलट के रूप में कार्यरत था। विभागीय जांच में यह तथ्य सामने आया कि उसने रेलवे में नियुक्ति पाने के उद्देश्य से औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के इलेक्ट्रीशियन ट्रेड की फर्जी अंकसूची जमा की थी। जांच के दौरान जब संबंधित संस्थान से संपर्क किया गया तो वहां के प्राचार्य ने कर्मचारी के संस्थान में प्रशिक्षण लेने और अंकसूची जारी होने की बात से इन्कार कर दिया। इसके पश्चात रेलवे प्रशासन ने 1 मई 2019 को अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उसके वेतन में पांच साल तक कटौती करने का दंड सुनाया था।
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महाप्रबंधक ने जारी किया नया नोटिस
इसके बाद दंड की अवधि में बढ़ोतरी करने के लिए मंडल रेल प्रबंधक ने 29 जून, 2021 को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। फिर महाप्रबंधक ने 20 अक्तूबर, 2021 को नया नोटिस जारी किया और आरोपी कर्मचारी के विरुद्ध आपराधिक मामला भी दर्ज करवा दिया। आरोपी लोको पायलट ने रेलवे सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम 1968 के तहत छह महीने की समय-सीमा का हवाला देते हुए इस कार्रवाई को चुनौती दी थी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण से राहत न मिलने पर उसने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
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