{"_id":"6a49f8033b0e401b7902ee08","slug":"never-went-to-school-yet-became-a-doctor-teejan-bai-the-immortal-voice-of-pandavani-is-silent-forever-2026-07-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"Teejan Bai Passes Away: कभी स्कूल नहीं गईं,फिर भी बनीं डॉक्टर; पंडवानी की अमर आवाज तीजन बाई हमेशा के लिए खामोश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Teejan Bai Passes Away: कभी स्कूल नहीं गईं,फिर भी बनीं डॉक्टर; पंडवानी की अमर आवाज तीजन बाई हमेशा के लिए खामोश
Sun, 05 Jul 2026 11:52 AM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Sun, 05 Jul 2026 11:52 AM IST
सार
पंडवानी की महान साधिका और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई के निधन के साथ भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। अपने जीवन में उन्होंने यह साबित किया कि प्रतिभा और समर्पण के सामने औपचारिक शिक्षा भी छोटी पड़ जाती है।
विज्ञापन
तीजन बाई का निधन
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पंडवानी की महान साधिका और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई के निधन के साथ भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। अपने जीवन में उन्होंने यह साबित किया कि प्रतिभा और समर्पण के सामने औपचारिक शिक्षा भी छोटी पड़ जाती है। कभी स्कूल की दहलीज तक नहीं पहुंचीं तीजन बाई को उनके असाधारण योगदान के लिए विश्वविद्यालय ने मानद डी.लिट. (डॉक्टरेट) की उपाधि से सम्मानित किया था।
24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके नाना ब्रजलाल महाभारत की कथाएं गाया करते थे। तीजन बाई छिपकर उन्हें सुनतीं और याद कर लेती थीं। एक दिन नाना ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पंडवानी की शिक्षा देना शुरू किया। यही सीख आगे चलकर उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बन गई।
पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली तीजन बाई पहली महिला कलाकार बनीं। उस दौर में यह शैली केवल पुरुषों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन उन्होंने इस परंपरा को तोड़ते हुए अपनी दमदार आवाज, अभिनय और मंचीय अभिव्यक्ति से नई मिसाल कायम की। उनके हाथ का रंगीन फुंदनेदार एकतारा कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष और कभी कृष्ण का सुदर्शन चक्र बन जाता था। उनकी प्रस्तुति दर्शकों को महाभारत के घटनाक्रम में डुबो देती थी।
विज्ञापन
देश-विदेश के अनेक मंचों पर पंडवानी का परचम लहराने वाली तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान मिले। औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद उनके लोककला में अतुलनीय योगदान को देखते हुए बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. (डॉक्टरेट) की उपाधि प्रदान की।
आज उनके निधन के बाद देश उन्हें केवल एक महान लोक कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि उस प्रेरणा के रूप में याद कर रहा है, जिसने यह साबित किया कि लगन, प्रतिभा और मेहनत से दुनिया की सबसे बड़ी ऊंचाइयां हासिल की जा सकती हैं। उनकी कला और विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
विज्ञापन
24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके नाना ब्रजलाल महाभारत की कथाएं गाया करते थे। तीजन बाई छिपकर उन्हें सुनतीं और याद कर लेती थीं। एक दिन नाना ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पंडवानी की शिक्षा देना शुरू किया। यही सीख आगे चलकर उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बन गई।
विज्ञापन
पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली तीजन बाई पहली महिला कलाकार बनीं। उस दौर में यह शैली केवल पुरुषों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन उन्होंने इस परंपरा को तोड़ते हुए अपनी दमदार आवाज, अभिनय और मंचीय अभिव्यक्ति से नई मिसाल कायम की। उनके हाथ का रंगीन फुंदनेदार एकतारा कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष और कभी कृष्ण का सुदर्शन चक्र बन जाता था। उनकी प्रस्तुति दर्शकों को महाभारत के घटनाक्रम में डुबो देती थी।
विज्ञापन
देश-विदेश के अनेक मंचों पर पंडवानी का परचम लहराने वाली तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान मिले। औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद उनके लोककला में अतुलनीय योगदान को देखते हुए बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. (डॉक्टरेट) की उपाधि प्रदान की।
आज उनके निधन के बाद देश उन्हें केवल एक महान लोक कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि उस प्रेरणा के रूप में याद कर रहा है, जिसने यह साबित किया कि लगन, प्रतिभा और मेहनत से दुनिया की सबसे बड़ी ऊंचाइयां हासिल की जा सकती हैं। उनकी कला और विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।