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नवरात्रि: देवी मंदिरों का गढ़ है रायपुर; सुबह से देर रात तक लगता है श्रद्धालुओं का तांता, हर धाम की रोचक कहानी
Mon, 12 Oct 2026 08:19 AM IST
Lalit Kumar Singh
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: Lalit Kumar Singh
Updated Mon, 12 Oct 2026 08:19 AM IST
सार
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर देवी मंदिरों का गढ़ कहा जाता है। यहां का पुरानी बस्ती क्षेत्र देवी मंदिरों का गढ़ है। महज दो किलोमीटर की दूरी में पांच प्रख्यात शक्ति मंदिरों में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं। हर मंदिर का एतिहासिक महत्व है। रोचक कहानी है। सभी मंदिर 200 साल से लेकर पांच हजार वर्ष प्राचीन है।
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महामाया देवी रायपुर
- फोटो : Amar Ujala Digital
विस्तार
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर देवी मंदिरों का गढ़ कहा जाता है। यहां का पुरानी बस्ती क्षेत्र देवी मंदिरों का गढ़ है। महज दो किलोमीटर की दूरी में पांच प्रख्यात शक्ति मंदिरों में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं। हर मंदिर का एतिहासिक महत्व है। रोचक कहानी है। सभी मंदिर 200 साल से लेकर पांच हजार वर्ष प्राचीन है।
पुरानी बस्ती में रायपुर शहर सबसे प्रसिद्ध मंदिर मां महामाया देवी का है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह मंदिर पांच हजार साल से अधिक पुराना है। यहीं के अमीनपारा थाना के समीप 250 साल पुराना शीतला माता मंदिर भी है। मंदिरों का प्राचीन इतिहास संबंधित पुस्तक के अनुसार राजा मोरध्वज अपनी रानी कुमुददेवी के साथ भ्रमण करते हुए खारुन नदी तट पर पहुंचे थे। नदी में एक काले रंग का पत्थर था, जिस पर नाग फन काढ़े हुए थे।
राजा ने पत्थर को नदी से निकलवा। पत्थर को नदी से निकालते ही आकाशवाणी हुई कि राजन मुझे कंधे पर उठाकर ले चलो और नदी से दूर स्थापित करो। राजा ने प्रतिमा को कंधे पर उठाया और पुरानी बस्ती की ओर चल पड़े। एक जगह राजा थक गए और मूर्ति को नीचे रख दिया। इसके बाद मूर्ति को हटाने की कोशिश की गई, तो वह नहीं हिली। राजा ने मूर्ति को वहीं पर प्रतिष्ठित कराया। कालांतर में चलकर यह मंदिर महामाया देवी के रूप में विख्यात हुआ
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दंतेश्वरी माता मंदिर
पुरानी बस्ती के कुशालपुर चौक पर 200 साल पुराना मां दंतेश्वरी मंदिर का प्रसिद्ध मंदिर है। देखने को मिलता है कि अधिकतर देवी मंदिरों में ब्राह्मण ही पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां यादव जाति के लोग पूजा करते हैं। कहा जाता है कि वर्षों पहले घनघोर जंगल में यादव समाज के लोग गाय चराने जाते थे। एक ग्वालिन गणेशिया बाई ने देखा कि एक पत्थर पर गाय खड़ी है और गाय के थन से दूध गिर रहा है। ग्वालिन ने अपने साथ गाय चराने आए अन्य लोगों को बताया। वह पत्थर देवी की प्रतिमा थाी। इसके बाद छोटा सा मंदिर बनवाकर प्रतिमा को प्राण प्रतिष्ठित किया गया। तब से इस मंदिर में यादव जाति के लोग ही पूजा अर्चना करते हैं।
कंकाली माता मंदिर
पुरानी बस्ती से ही लगे ब्राह्मणपारा में नागा साधुओं ने लगभग 600 साल पहले कंकाली मठ की स्थापना की थी। मठ में देवी माता की प्रतिमा है। माना जाता है कि यह इलाका श्मशानघाट था और कंकाल वाले इलाके के बीच प्रतिमा स्थापित होने से इसका नाम कंकाली पड़ गया। कालांतर में मठ की प्रतिमा को थोड़ी ही दूर मंदिर बनवाकर स्थानांतरित किया गया। यह मठ पूरे साल बंद रहता है, लेकिन साल में एक बार दशहरा के दिन खोलकर पूजा-अर्चना की जाती है। मठ में प्राचीन अस्त्र-शस्त्र रखे गए हैं। यहां पहले नागा साधु पूजा अचर्ना करते थे। मंदिर के सामने तालाब है जहां घर-घर में बोए गए जंवारा जोत का विसर्जन किया जाता है।
शीतला माता मंदिर
पुरानी बस्ती के अमीनपारा थाना के समीप 250 साल पुराना शीतला माता मंदिर है। इस मंदिर में प्रतिमा का कोई आकार नहीं है, पत्थर रूपी पिंड की पूजा की जाती है। माता को ठंडा भोजन, मिठाई का भोग लगाया जाता है। मंदिर में बरसों से एक ही परिवार के द्वारा पूजा की जा रही है। कहा जाता है कि पत्थर रूपी पिंड जमीन से प्रकट हुआ, तबसे उसी रूप में पूजा की जाती है।
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पुरानी बस्ती में रायपुर शहर सबसे प्रसिद्ध मंदिर मां महामाया देवी का है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह मंदिर पांच हजार साल से अधिक पुराना है। यहीं के अमीनपारा थाना के समीप 250 साल पुराना शीतला माता मंदिर भी है। मंदिरों का प्राचीन इतिहास संबंधित पुस्तक के अनुसार राजा मोरध्वज अपनी रानी कुमुददेवी के साथ भ्रमण करते हुए खारुन नदी तट पर पहुंचे थे। नदी में एक काले रंग का पत्थर था, जिस पर नाग फन काढ़े हुए थे।
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राजा ने पत्थर को नदी से निकलवा। पत्थर को नदी से निकालते ही आकाशवाणी हुई कि राजन मुझे कंधे पर उठाकर ले चलो और नदी से दूर स्थापित करो। राजा ने प्रतिमा को कंधे पर उठाया और पुरानी बस्ती की ओर चल पड़े। एक जगह राजा थक गए और मूर्ति को नीचे रख दिया। इसके बाद मूर्ति को हटाने की कोशिश की गई, तो वह नहीं हिली। राजा ने मूर्ति को वहीं पर प्रतिष्ठित कराया। कालांतर में चलकर यह मंदिर महामाया देवी के रूप में विख्यात हुआ
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दंतेश्वरी माता मंदिर
पुरानी बस्ती के कुशालपुर चौक पर 200 साल पुराना मां दंतेश्वरी मंदिर का प्रसिद्ध मंदिर है। देखने को मिलता है कि अधिकतर देवी मंदिरों में ब्राह्मण ही पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां यादव जाति के लोग पूजा करते हैं। कहा जाता है कि वर्षों पहले घनघोर जंगल में यादव समाज के लोग गाय चराने जाते थे। एक ग्वालिन गणेशिया बाई ने देखा कि एक पत्थर पर गाय खड़ी है और गाय के थन से दूध गिर रहा है। ग्वालिन ने अपने साथ गाय चराने आए अन्य लोगों को बताया। वह पत्थर देवी की प्रतिमा थाी। इसके बाद छोटा सा मंदिर बनवाकर प्रतिमा को प्राण प्रतिष्ठित किया गया। तब से इस मंदिर में यादव जाति के लोग ही पूजा अर्चना करते हैं।
कंकाली माता मंदिर
पुरानी बस्ती से ही लगे ब्राह्मणपारा में नागा साधुओं ने लगभग 600 साल पहले कंकाली मठ की स्थापना की थी। मठ में देवी माता की प्रतिमा है। माना जाता है कि यह इलाका श्मशानघाट था और कंकाल वाले इलाके के बीच प्रतिमा स्थापित होने से इसका नाम कंकाली पड़ गया। कालांतर में मठ की प्रतिमा को थोड़ी ही दूर मंदिर बनवाकर स्थानांतरित किया गया। यह मठ पूरे साल बंद रहता है, लेकिन साल में एक बार दशहरा के दिन खोलकर पूजा-अर्चना की जाती है। मठ में प्राचीन अस्त्र-शस्त्र रखे गए हैं। यहां पहले नागा साधु पूजा अचर्ना करते थे। मंदिर के सामने तालाब है जहां घर-घर में बोए गए जंवारा जोत का विसर्जन किया जाता है।
शीतला माता मंदिर
पुरानी बस्ती के अमीनपारा थाना के समीप 250 साल पुराना शीतला माता मंदिर है। इस मंदिर में प्रतिमा का कोई आकार नहीं है, पत्थर रूपी पिंड की पूजा की जाती है। माता को ठंडा भोजन, मिठाई का भोग लगाया जाता है। मंदिर में बरसों से एक ही परिवार के द्वारा पूजा की जा रही है। कहा जाता है कि पत्थर रूपी पिंड जमीन से प्रकट हुआ, तबसे उसी रूप में पूजा की जाती है।