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छत्तीसगढ बीजेपी का गरीबी बनाये रखने का घोषणा पत्र
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Thu, 07 Nov 2013 12:35 PM IST
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छत्तीसगढ भाजपा का चुनावी घोषणा पत्र प्रदेश में गरीबी बनाये रखने का ऐलान करता नजर आ रहा है। सीजीखबर के मुताबिक राज्य में गरीबी कम करने के बजाये गरीबों को 2 रुपये के स्थान पर 1 रुपये की दर से 35 किलो चावल देने की घोषणा की गई है।
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वर्ष 1993-1994 में गावों में 50 फीसदी लोग गरीब थे जो 2011-12 में बढकर 65 प्रतिशत का हो गया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी 2012-13 के वार्षिक रिपोर्ट से तथ्य उजागार हुआ है।
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यदि भाजपा गरीबी की संख्या को कम करना चाहती है तो फिर क्यों इसके उलट बीपीएल परिवारों की संख्या में इजाफा हो रहा है। छत्तीसगढ में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का प्रतिशत बढता ही जा रहा है। आज की तारीख में छत्तीसगढ की 40.1 प्रतिशत जनसंख्या रेखा के नीचे वास करती है। यह तब है, जब छत्तीसगढ वन संपदा तथा प्राकृतिक संशाधनो से भरा पडा है।
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गरीबी को कम करने के लिये रोजगार मुहैया करवाने की जरूरत है। वास्तव में यदि गांवों में लोगों को रोजगार देना है तो इसमें कुछ हद तक मनरेगा मदद कर सकता है।
मनरेगा के आकडे बयां करते हैं कि छत्तीसगढ में 100 दिनों के बजाये केवल 31 दिनों का रोजगार ही साल भर में मिल पाता है। उम्मीद की जा रही थी कि मनरेगा में 100 दिनों का काम एक वर्ष में मिल सके इसके लिये ठोस योजना इस घोषणा पत्र के माध्यम से की जायेगी। जिसका की पूर्णतः अभाव है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय के आकडे बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में छत्तीसगढ के 22लाख 03हजार 300 44 परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार मांगा था। जिसमें से 21 लाख 97000 8स00 57 परिवारों को औसतन 31 दिनों का रोजगार मिल पाया।
100 दिनों का रोजगार तो केवल 44 हजार 900 33 परिवारों को ही मिल पाया है जो कि 2.04 फीसदी है। जब छत्तीसगढ में रोजगार मुहैया करवाने वाली योजनाओं को ठीक से लागू ही नही किया गया है तो गरीबी कैसे दूर होगी।
छत्तीसगढ में 2001 की जनगणना में जहां कुल कामकाजी लोगों में किसानों की जनसंख्या 44.54 प्रतिशत थी, वह 2011 में घट कर 32.88 प्रतिशत रह गई है। इसके उलट खेतिहर मजदूरों की जनसंख्या आश्चचर्यजनक रुप से बढ गई है।
2001 में कुल कार्मिकों में 31.94 प्रतिशत जनसंख्या खेतिहर मजदूरों की थी। 2011 में इसमें चिंताजनक बढोत्तरी हुई है और यह 41.80 प्रतिशत तक जा पहुंची है।
किसानों को खेतिहर मजदूर में तब्दील होने से रोकने का उपाय कौन करेगा। छत्तीसगढ के सबसे बडी चुनौती यही है कि किसानों को खेतिहर मजदूर बनने से रोका जाये।
भाजपा चूंकि वर्तमान में शासन में है इसलिये यह उम्मीद करना गलत नही होगा कि उसके पास अगले 5 वर्षो में छत्तीसगढ के वास्तविक विकास के लिये क्या किया जाना चाहिये उसके लिये ठोस योजना हो।
जब गांव के किसानों खेतिहर मजदूरों में तब्दील होने से नही रोका जा सका है तो उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिये न्यूनतम वेतन की घोषणा तो अवश्य करनी चाहिये थी। घोषणा के अनुरूप केवल उनका शत प्रतिशत बीमा करवा देना गरीबी को दूर करने के लिये कोई मदद नही करता सकता है।
किसानों को ऋणमुक्त कर्ज के स्थान पर भूमि सुधार किये जाने की जरूरत है जिससे फालतू जमीन किसानों में बांट दी जाती है। इससे किसानी का रकबा भी बढेगा तथा पैदावार, जो किसानों को गरीबी की रेखा से ऊपर आने में मदद करेगा।
छात्रो को लैपटाप तथा टैबलेट जैसे उच्च संचार के साधन मुफ्त में दिये जाने से जरूरी है कि उनके लिये रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाये जाये। घोषणा पत्र में छत्तीसगढ में रोजगार के अवसर बढाने के बजाये, उद्योगो तथा निजी नौकरी में आरक्षण देने की बात कही गई है। लाख टके का सवाल यह है कि जब रोजगार के अवसर ही न बढाये जाये तब उसमें आरक्षण किस काम का है।
इतना जरूर है कि सामाजिक सुरक्षा में बढोतरी करने का वादा यह घोषणा पत्र करता है। जिसके तहत स्मार्ट कार्ड में पचास हजार रूपये तक का इलाज एवं निराश्रित पेंशन दुगना किया जाना है।
पहले स्मार्ट कार्ड में 30 हजार रुपये मिलते थे जिसे बढाने की बात हो रही है लेकिन छत्तीसगढ की जनता को गर्भाशय कांड जरूर याद होगा जिसमें सरकारी पैसे पर महिलाओं के गर्भाशय अनावश्यक रूप से आपरेस कर निकाल दिये गये थे। ऐसी घटना की पुनरावृत्ति फिर न हो इस पर घोषणा पत्र खामोश है।
कुल मिलाकर भाजपा छत्तीसगढ चुनाव के लिये जारी घोषणा पत्र लोकलुभावनें घोषणाओं से भरा है जिससे वास्तव में छत्तीसगढ का भला होने नही जा रहा है।