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CG News: छत्तीसगढ़ में संपत्ति की गाइडलाइन तय करने के नियमों में बड़ा सुधार, 25 साल पुराना प्रावधान बदला
Sun, 09 Nov 2025 01:59 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Sun, 09 Nov 2025 01:59 PM IST
सार
संपत्ति और जमीन से जुड़ी गाइडलाइन तय करने के नियमों में 25 साल बाद बड़ा बदलाव किया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल पर पंजीयन विभाग ने पुराने, जटिल और भ्रमित करने वाले नियमों को संशोधित करते हुए नई गाइडलाइन प्रणाली जारी की है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
छत्तीसगढ़ सरकार ने संपत्ति और जमीन से जुड़ी गाइडलाइन तय करने के नियमों में 25 साल बाद बड़ा बदलाव किया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल पर पंजीयन विभाग ने पुराने, जटिल और भ्रमित करने वाले नियमों को संशोधित करते हुए नई गाइडलाइन प्रणाली जारी की है। इन बदलावों से रजिस्ट्री की प्रक्रिया अब अधिक पारदर्शी और सरल होगी। साथ ही, अतिरिक्त शुल्क और तकनीकी विसंगतियों से आम लोगों को राहत मिलेगी।
पंजीयन मंत्री ओपी चौधरी ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वर्तमान नियमों को आम जनता की समझ के अनुरूप बनाया जाए। उनका कहना था कि अब तक प्रचलित नियम इतने जटिल थे कि जमीन के गाइडलाइन मूल्य निर्धारण को लेकर लोगों में लगातार भ्रम की स्थिति रहती थी। वर्ष 2000 से लागू पुराने प्रावधानों में कभी कोई संशोधन नहीं हुआ था, जिसके कारण बाजार मूल्य का वास्तविक आकलन संभव नहीं हो पाता था।
गाइडलाइन की गणना में बड़ा बदलाव
नई गाइडलाइन के तहत जमीन के मूल्य का निर्धारण अब पहले की तुलना में काफी सरल और तार्किक तरीके से होगा। जहां पहले 77 प्रकार के निर्धारण प्रावधान थे, वहीं अब केवल 14 स्पष्ट प्रावधान रखे गए हैं। पहले नगरीय निकायों में कृषि, नजूल और डायवर्टेड भूमि के लिए अलग-अलग गणना की जाती थी, लेकिन अब सभी वर्गों की भूमि के लिए एक समान मानक लागू होगा। अब हेक्टेयर दर की सीमा 0.14 हेक्टेयर तय की गई है। इसके अलावा निर्मित संरचनाओं के लिए केवल 8 दरें निर्धारित की गई हैं। कृषि, नजूल और डायवर्टेड भूमि के अलग-अलग मूल्यांकन को समाप्त कर दिया गया है, जिससे भ्रम और त्रुटियों की संभावना खत्म होगी।
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हटे पुराने जटिल प्रावधान
नई व्यवस्था में दो फसली भूमि या नलकूप-ट्यूबवेल जैसी अतिरिक्त सुविधाओं के लिए मूल्य बढ़ाने वाले प्रावधानों को समाप्त किया गया है। इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा। अब जब किसी क्षेत्र में नई कॉलोनी या परियोजना विकसित होगी, तो उसके लिए अलग से गाइडलाइन दर तय की जाएगी, जिससे पारदर्शिता बनी रहेगी।
उधर, राज्य में जमीन की कलेक्टर गाइडलाइन दरों में वृद्धि का प्रस्ताव फिलहाल अटका हुआ है। विभाग ने करीब आठ महीने पहले गाइडलाइन दरों को डेढ़ से दो गुना बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन अब तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। जबकि संबंधित जिलों में सर्वे पूरा कर लिया गया है। निर्णय लंबित रहने के कारण वर्तमान में 7 साल पुरानी दरें ही लागू हैं।
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पंजीयन मंत्री ओपी चौधरी ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वर्तमान नियमों को आम जनता की समझ के अनुरूप बनाया जाए। उनका कहना था कि अब तक प्रचलित नियम इतने जटिल थे कि जमीन के गाइडलाइन मूल्य निर्धारण को लेकर लोगों में लगातार भ्रम की स्थिति रहती थी। वर्ष 2000 से लागू पुराने प्रावधानों में कभी कोई संशोधन नहीं हुआ था, जिसके कारण बाजार मूल्य का वास्तविक आकलन संभव नहीं हो पाता था।
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गाइडलाइन की गणना में बड़ा बदलाव
नई गाइडलाइन के तहत जमीन के मूल्य का निर्धारण अब पहले की तुलना में काफी सरल और तार्किक तरीके से होगा। जहां पहले 77 प्रकार के निर्धारण प्रावधान थे, वहीं अब केवल 14 स्पष्ट प्रावधान रखे गए हैं। पहले नगरीय निकायों में कृषि, नजूल और डायवर्टेड भूमि के लिए अलग-अलग गणना की जाती थी, लेकिन अब सभी वर्गों की भूमि के लिए एक समान मानक लागू होगा। अब हेक्टेयर दर की सीमा 0.14 हेक्टेयर तय की गई है। इसके अलावा निर्मित संरचनाओं के लिए केवल 8 दरें निर्धारित की गई हैं। कृषि, नजूल और डायवर्टेड भूमि के अलग-अलग मूल्यांकन को समाप्त कर दिया गया है, जिससे भ्रम और त्रुटियों की संभावना खत्म होगी।
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हटे पुराने जटिल प्रावधान
नई व्यवस्था में दो फसली भूमि या नलकूप-ट्यूबवेल जैसी अतिरिक्त सुविधाओं के लिए मूल्य बढ़ाने वाले प्रावधानों को समाप्त किया गया है। इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा। अब जब किसी क्षेत्र में नई कॉलोनी या परियोजना विकसित होगी, तो उसके लिए अलग से गाइडलाइन दर तय की जाएगी, जिससे पारदर्शिता बनी रहेगी।
उधर, राज्य में जमीन की कलेक्टर गाइडलाइन दरों में वृद्धि का प्रस्ताव फिलहाल अटका हुआ है। विभाग ने करीब आठ महीने पहले गाइडलाइन दरों को डेढ़ से दो गुना बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन अब तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। जबकि संबंधित जिलों में सर्वे पूरा कर लिया गया है। निर्णय लंबित रहने के कारण वर्तमान में 7 साल पुरानी दरें ही लागू हैं।