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अडानी समूह को बड़ा झटका, खनन रुका

Fri, 28 Mar 2014 10:23 AM IST
Updated Fri, 28 Mar 2014 10:23 AM IST
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chhattisgarh adani coal block

छत्तीसगढ़ में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अडानी समूह को आवंटित कोल ब्लॉक पर रोक लगा दी है। इस कोल ब्लॉक में राजस्थान सरकार, अदानी समूह के साथ मिलकर खनन का काम कर रही थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के इस फ़ैसले से राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकार के अलावा अडानी समूह को गहरा झटका लगा है।

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सोमवार को बिलासपुर के अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव की अपील पर फ़ैसला सुनाते हुये नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर 23 जून 2011 के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की पर्यावरण स्वीकृति और 28 मार्च 2012 के राज्य सरकार की स्वीकृति को रोक दिया है। भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटारे के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का गठन किया था।
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ग्रीन ट्रिब्यूनल के इस फ़ैसले पर राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक एनएच माथुर ने बीबीसी से कहा, “यह एक बड़ा मामला है और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड स्वायत्त संस्था होने के बाद भी इस मामले में राजस्थान सरकार के दिशा-निर्देश के बिना कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। फ़िलहाल हम इस फ़ैसले की समीक्षा कर रहे हैं।”
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छत्तीसगढ़ के दक्षिण सरगुजा के हसदेव-अरण्य कोल फिल्ड्स के परसा ईस्ट और केते बासन में आवंटित कोल ब्लॉक की इस परियोजना में 74 फ़ीसदी की साझेदारी अडानी समूह का है। शेष 26 प्रतिशत का हिस्सा राजस्थान सरकार के पास है।

अंधाधुंध खनन

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ताज़ा फ़ैसले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने खनन कंपनी को दो सप्ताह के भीतर मौक़े पर निकाले गये कोयले को हटाने का निर्देश देते हुये वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को कई बिंदुओं पर जांच के आदेश दिये हैं।

ट्रिब्यूनल ने अगले आदेश तक कोल ब्लॉक के इलाक़े में पादप व प्राणी जगत के संरक्षण को छोड़ कर सभी तरह की गतिविधियों पर रोक लगा दी है।

इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुये सुदीप श्रीवास्तव ने कहा, “यह फ़ैसला देश भर में मनमाने तरीके से अंधाधुंध खनन को रोकने की दिशा में एक पहल है और हम इस मसले पर लड़ाई के लिये आगे भी तैयार हैं।”

वन जीवों को राहत

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'हसदेव अरण्य बचाओ' संघर्ष समिति के आलोक शुक्ला ने इस फ़ैसले का स्वागत करते हुये कहा है कि यह फ़ैसला उन तमाम संघर्षों को मज़बूत करने वाला है, जो इस तरह की ग़ैरक़ानूनी खनन की कार्रवाई के ख़िलाफ़ देश भर में चल रही है।

आलोक शुक्ला ने कहा, “परसा ईस्ट और केते बासन का कोल आवंटन पूरी तरह से फ़र्ज़ी दस्तावेजों के आधार पर और ग़ैरक़ानूनी तरीके से किया गया था और इस पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकार के कई बड़े अधिकारी लिप्त थे।”

'कंजर्वेशन कोर सोसायटी' से जुड़ी वन जीव विशेषज्ञ मीतू गुप्ता ने इस फ़ैसले पर संतोष जताते हुये कहा है कि इस फ़ैसले से इलाक़े के सैकड़ों हाथियों और वन जीवों को राहत मिल सकेगी। मीतू ने आगे कहा कि इन वन्य जीवों की अनदेखी करते हुये पर्यावरण स्वीकृति दी गई थी।

आवागमन और रहवास

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ग़ौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के दक्षिण सरगुजा के हसदेव-अरण्य कोल फिल्ड्स के परसा ईस्ट और केते बासन में 2711 हेक्टेयर का हिस्सा राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित किया गया था। इस कोल ब्लॉक में 1898 हेक्टेयर हिस्सा वन भूमि है।

दो साल पहले इस इलाक़े में कोयला खनन का काम शुरु किया गया था, जिसको लेकर लगातार आपत्ति दर्ज की गई थी।

यह इलाक़ा हाथियों के आवागमन और रहवास का इलाक़ा है। इसके अलावा क्षेत्र में बड़ी संख्या में भालू और तेंदुआ समेत दूसरे जानवर रहते हैं। ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष इस तथ्य को गंभीरता से रखा गया।

अपने फ़ैसले में ग्रीन ट्रिब्यूनल ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को आदेश दिया है कि वह वन सलाहकार समिति से इस कोल ब्लॉक की पर्यावरण की स्थिति की जांच करे।

गतिविधियों पर रोक

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ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा है कि वन सलाहकार समिति आवंटन की तारीख में उस इलाक़े में पादप व प्राणियों की स्थिति, आवंटित इलाक़े में विलुप्त प्रजातियों के रहवास व वन प्राणियों के प्राकृतिक आवागमन के हिस्से जैसे बिंदुओं पर अपनी राय दे।

इसके लिये वन सलाहकार समिति को 'इंडियन काउंसिल ऑफ फारेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन', देहरादून व 'वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' समेत किसी भी विषय विशेषज्ञ की मदद लेने की छूट दी गई है।

ग्रीन ट्रिब्यूनल ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को वन सलाहकार समिति के सुझावों को ध्यान में रखते हुये सकारण क़ानूनी आदेश पारित करने के लिये कहा है।

इस आदेश के पारित होने तक आवंटित कोल ब्लॉक के इलाक़े में बचे हुये पादप व प्राणी संरक्षण के काम को छोड़ कर सभी तरह की गतिविधियों पर ग्रीन ट्रिब्यूनल ने रोक लगा दी है।

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