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Bijapur: तेंदूपत्ता संग्रहण में गिरावट, ठेकेदारी प्रथा खत्म होते ही सवालों के घेरे में वन विभाग की कार्यशैली
Sun, 25 May 2025 08:57 PM IST
Digvijay Singh
अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर
अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर
Published by: Digvijay Singh
Updated Sun, 25 May 2025 08:57 PM IST
सार
इस वर्ष बीजापुर में तेंदूपत्ता संग्रहण के आंकड़े चौंकाने वाले रहे हैं, जहां अन्य जिलों में तेंदूपत्ता संग्रहण का प्रतिशत अपेक्षाकृत रहा है। वही बीजापुर वनमंडल में 12 हजार 226 बोरा तेंदूपत्ता यानी महज 10 प्रतिशत संग्रहण ही हो पाया है।
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तेंदूपत्ता संग्रहण में गिरावट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इस वर्ष बीजापुर में तेंदूपत्ता संग्रहण के आंकड़े चौंकाने वाले रहे हैं, जहां अन्य जिलों में तेंदूपत्ता संग्रहण का प्रतिशत अपेक्षाकृत रहा है। वही बीजापुर वनमंडल में 12 हजार 226 बोरा तेंदूपत्ता यानी महज 10 प्रतिशत संग्रहण ही हो पाया है। यह आंकड़ा बीते वर्ष के मुकाबले बेहद निराशाजनक है, जब जिले में 81 प्रतिशत तेंदूपत्ता संग्रहण हुआ था। ठेकेदारी प्रथा खत्म होने के बाद वन विभाग को तेंदूपत्ता संग्रहण की जिम्मेदारी खुद निभानी थी, लेकिन अफसरों की लापरवाही और ढुलमुल रवैये के चलते सरकार की मंशा पर पानी फिरता नजर आ रहा है।
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मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बीजापुर जिले के लिए विशेष सहूलियतें देते हुए तेंदूपत्ता तोड़ाई की समयसीमा बढ़ाई थी। साथ ही, इस साल तेंदूपत्ता संग्रहण दर को भी बढ़ाकर 5500 रुपये प्रति मानक बोरा कर दिया गया, जो पिछली दर 4000 से डेढ़ हजार रुपये अधिक है। इसके बावजूद उसूर और बीजापुर की समितियों में तेंदूपत्ता संग्रहण शुरू ही नहीं हो सका। मुख्यमंत्री की स्पष्ट चेतावनी और विशेष रियायतों के बाद भी वन विभाग के अफसरों ने न तो समय पर तैयारी की और न ही वनवासियों के साथ समुचित संवाद स्थापित किया।
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बीजापुर डीएफओ आर. रामकृष्णा का बयान स्थिति की गंभीरता को उजागर करता है। उन्होंने कहा, "हम कुछ स्थानों पर गए थे, लेकिन ग्रामीणों ने पत्ता तोड़ाई में रुचि नहीं दिखाई। अब अगर कम खरीदी हुई है तो क्या मैं खुद जाकर पत्ता तोड़ूं?" उनका यह बयान न केवल गैरजिम्मेदाराना प्रतीत होता है, बल्कि सरकार की योजनाओं के प्रति उदासीनता भी दर्शाता है। जानकारों का मानना है कि वन विभाग के पास न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की कार्यकुशलता। बीते दिनों विभाग को इसी का खामियाजा उठाना पड़ा और लाखों रुपये का पत्ता बारिश के पानी मे बहे गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार इस विफलता की जिम्मेदारी तय करेगी? क्या संबंधित अफसरों पर कार्रवाई होगी? और सबसे अहम, क्या अगले सीजन में ऐसा दोबारा न हो, इसके लिए कोई ठोस रणनीति बनाई जाएगी? इस वर्ष की असफलता ने वन उपज से आजीविका चलाने वाले हजारों वनवासियों की कमर तोड़ दी है। अब जरूरत है कि सरकार इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कदम उठाए।
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