फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chhattisgarh ›   Bijapur News ›   bans ki dharti par bujh rahi virasat : kharidaro ke abhav me majduri ko majbur huye bhopalpatnam ke shilpkar

छत्तीसगढ़: भोपालपटनम में बांस कला का संकट, पुश्तैनी हुनर पर मंडराया विलुप्ति का खतरा

Fri, 08 May 2026 11:09 AM IST
बीजापुर ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर
अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर Published by: बीजापुर ब्यूरो Updated Fri, 08 May 2026 11:09 AM IST
विज्ञापन
bans ki dharti par bujh rahi virasat : kharidaro ke abhav me majduri ko majbur huye bhopalpatnam ke shilpkar
बीजापुर न्यूज

कभी बांस शिल्प कला के लिए पहचान रखने वाला भोपालपटनम क्षेत्र आज अपनी ही पारंपरिक विरासत को बचाने की जंग लड़ रहा है। जिन हाथों ने दशकों तक बांस से तुकनी, सुपा, मुर्गी गुड़ा और घरेलू उपयोग की सामग्री बनाकर गांव-गांव पहचान बनाई, वे हाथ अब रोजी-रोटी के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। बाजार में प्लास्टिक और मशीन निर्मित सामानों की बढ़ती मांग ने पुश्तैनी बांस कला को लगभग हाशिए पर पहुंचा दिया है।

विज्ञापन


भोपालपटनम ब्लॉक के गुल्लागुड़ा, मद्देड़ और रुद्राराम गांवों में बसे बुरुड़ समाज के परिवार पिछले करीब एक सदी से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। ग्रामीण बताते हैं कि तत्कालीन जमींदारों ने महाराष्ट्र के आंकिसा गांव से इन परिवारों को यहां बसाया था ताकि स्थानीय जरूरतों के लिए बांस से घरेलू सामग्री तैयार की जा सके। उस समय इनकी कला गांवों की जरूरत थी, लेकिन अब यही हुनर बाजार के अभाव में दम तोड़ रहा है।
विज्ञापन


70 वर्षीय कोनम जगैया बताते हैं कि उन्होंने 55 वर्षों तक बांस शिल्प के सहारे परिवार चलाया। इसी काम से बच्चों का पालन-पोषण और बेटियों की शादी हुई, लेकिन अब हालात इतने बदल गए हैं कि तैयार सामान घरों में ही पड़ा रह जाता है। उम्र ढल चुकी है, आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है, फिर भी मजबूरी में काम करना पड़ रहा है क्योंकि परिवार के पास न खेती है और न कोई दूसरा सहारा।
विज्ञापन
विज्ञापन


प्ररला श्रीनिवास और उनकी पत्नी महेश्वरी भी इसी संकट से गुजर रहे हैं। महेश्वरी दिनभर मेहनत कर सुपा और टुकनी तैयार करती हैं, लेकिन खरीदार नहीं मिलने से मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। उनका कहना है कि मेहनत के मुकाबले आमदनी इतनी कम है कि अब यह काम छोड़ने की नौबत आ गई है।

सबसे ज्यादा चिंता नई पीढ़ी को लेकर है। गांव के युवा कोनम राजेंद्र बताते हैं कि वे इस कला को आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन बाजार और सरकारी सहयोग के अभाव में अब मजदूरी और छोटे-मोटे व्यवसाय की ओर जाना पड़ रहा है। उन्होंने बैंक से ऋण लेकर छोटी दुकान शुरू की है क्योंकि केवल बांस शिल्प के भरोसे परिवार चलाना संभव नहीं रहा।


विडंबना यह है कि जिस भोपालपटनम क्षेत्र से हर साल बड़ी मात्रा में बांस बाहर के बाजारों तक पहुंचता है, वहीं स्थानीय कलाकार आर्थिक संकट में जीवन बिता रहे हैं। यदि शासन स्तर पर प्रशिक्षण, आधुनिक डिजाइन, ऑनलाइन विपणन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए तो यही पारंपरिक कला क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों को रोजगार दे सकती है। फिलहाल बांस की धरती पर यह पुश्तैनी हुनर धीरे-धीरे अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।
बीजापुर न्यूज

 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed