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Hindi News ›   Chhattisgarh ›   Bastar Dussehra: Pihu Das will perform the Kachnagadi ritual by swinging on a swing of thorns.

बस्तर दशहरा: कांटों के झूले पर झूलकर पीहू दास निभाएंगी काछनगादी की रस्म

Sat, 10 Oct 2026 04:14 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Sat, 10 Oct 2026 04:14 PM IST
सार

बस्तर दशहरा की 618 साल पुरानी परंपरा के तहत जगदलपुर में काछनगादी की रस्म निभाई जाएगी। 12 वर्षीय पीहू दास बेल के कांटों के झूले पर झूलेंगी और काछनदेवी से दशहरा आयोजन की अनुमति लेने का विधान पूरा होगा।

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Bastar Dussehra: Pihu Das will perform the Kachnagadi ritual by swinging on a swing of thorns.
कांटों के झूले पर झूलकर पीहू दास निभाएंगी काछनगादी की रस्म - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बस्तर दशहरा पर्व मनाने की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए 618 वर्ष पुरानी परंपरा के अनुसार शनिवार देर शाम जगदलपुर स्थित भंगाराम चौक के काछनगुड़ी में काछनगादी की विशेष रस्म निभाएंगे। बस्तर दशहरा समिति के आधिकारिक विवरण के अनुसार इस धार्मिक विधान के दौरान पनका समाज की 12 वर्ष की बालिका पीहू दास पर काछनदेवी सवार होंगी। इसके उपरांत देवी बेल के तीखे कांटों से बने विशेष झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा आयोजन को सहर्ष अनुमति प्रदान करेंगी।
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अनुष्ठान और पीहू दास की तैयारी
काछनगादी की मुख्य जिम्मेदारी निभा रही बालिका पीहू दास वर्तमान में पांचवीं कक्षा में अध्ययनरत हैं। इस पवित्र अनुष्ठान से पूर्व उन्होंने लगातार नौ दिनों तक देवी की विशेष आराधना की और नियमपूर्वक उपवास रखा। पीहू चौथी बार इस पारंपरिक धार्मिक आयोजन में सम्मिलित हो रही हैं। उनसे पूर्व पनका समाज की अनुराधा ने लगभग पांच से छह साल तक इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन किया था। बस्तर दशहरा में अलग-अलग समुदायों और ग्रामीण अंचलों के निवासियों को विशेष दायित्व सौंपे गए हैं। इसमें झारउमर और बेड़ाउमर गांव के ग्रामीण विशाल रथ बनाने का कार्य संभालते हैं, जबकि काछनगादी की रस्म पनका समाज की कन्या ही संपन्न करती है। यह व्यवस्था कई पीढ़ियों से लगातार चली आ रही है।
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कांटों के झूले का 22 पीढ़ियों का इतिहास
काछनगादी की रस्म में प्रयुक्त होने वाले बेल के कांटों के विशेष झूले का अपना विशिष्ट महत्व है। लामनी गांव के निवासी जगत राम नेताम का परिवार लगभग 22 पीढ़ियों से इस झूले को तैयार करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहा है। परिवार के सदस्य स्वयं जंगल जाकर बेल की कांटेदार डालियां चुनकर लाते हैं और पूरी श्रद्धा से झूला निर्मित करते हैं। इस अनुष्ठान के दौरान परिवार अपने घर में नौ दिनों तक अखंड दीपक प्रज्वलित रखता है। पीढ़ियों के बदलने के बाद भी परिवार के सदस्यों ने अपनी इस परंपरा को निष्ठापूर्वक निभाया है और इसे आगे भी जारी रखने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया है।
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अनुमति प्रक्रिया और आगामी धार्मिक विधान
बस्तर दशहरा की चौथी प्रमुख रस्म मानी जाने वाली काछनगादी का आयोजन प्रतिवर्ष नवरात्र के प्रारंभ से ठीक एक दिन पूर्व किया जाता है। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के वरिष्ठ सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर विधि-विधान के साथ देवी से उत्सव मनाने की अनुमति मांगते हैं। अनुमति मिलते ही लोग आतिशबाजी करके अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। श्रद्धालु काछनदेवी को रण की देवी के रूप में पूजते हैं। इस आयोजन के समय पनका समाज की महिलाएं धनकुल वादन की गूंज के साथ सुरीले पारंपरिक गीत गाती हैं।


इसके अतिरिक्त, काछनगादी की रस्म के उपरांत शनिवार शाम जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा का विधान रखा है। इस सांस्कृतिक व धार्मिक परंपरा को देखने के लिए बस्तर संभाग के अतिरिक्त अन्य राज्यों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। काछनदेवी से अनुमति प्राप्त होने के बाद रविवार को श्रद्धालु कलश स्थापना के साथ जोगी बिठाई की रस्म निभाएंगे। इसके पश्चात ही बस्तर दशहरा के अगले सभी धार्मिक कार्यक्रम आरंभ होंगे। ये सभी रस्में विभिन्न समुदायों, गांवों और परिवारों की आस्था से जुड़ी हैं, जिन्हें लोग पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं।
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