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कहानी उस अफसर की, जो गोलीबारी के साए में पढ़ा और आईएएस बना, नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया

Tue, 25 Jun 2019 06:28 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Tue, 25 Jun 2019 06:28 PM IST
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Success story of IAS officer BL sharma
BL sharma - फोटो : अमर उजाला

मैं लोहे को फौलाद बना दूंगा,

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मैं फाख्ता (घुघु) को शाहीं (बाज) से लड़ा दूंगा।
नवाजूंगा गरीबों को इल्म की दौलत से,
फतह हो जिनके कदमों में वो लश्कर बना दूंगा॥

यह पंक्तियां चंडीगढ़ के एजुकेशन सेक्रेटरी बीएल शर्मा ने डिपार्टमेंट के टीचर्स का हौसला बढ़ाने को लिखीं हैं। किसान परिवार से संबंध रखने वाले बीएल शर्मा का जीवन काफी संघर्ष वाला रहा है। बचपन पाकिस्तान बॉर्डर से सटे जम्मू कश्मीर के पुंछ में गुजरा। जहां गोलाबारी रोजमर्रा की बात है।

माता-पिता अशिक्षित थे, गाइड करने वाला कोई नहीं था। बावजूद इसके सभी मुश्किलों को पार कर वह आईएएस ऑफिसर बनें। करियर भी आसान नहीं रहा। 32 साल के करियर में 20 के करीब ट्रांसफर हुए। कई बार मुख्यमंत्री से ठनी तो ट्रांसफर कर दिया गया लेकिन समझौता कभी नहीं किया। शर्मा उर्दू-पर्शियन और पंजाबी में कविताएं भी लिखते हैं। पेश है बातचीत के कुछ अंश...
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सवाल: किन परिस्थितियों से गुजर कर पढ़ाई की और यह मुकाम हासिल किया?
जवाब: मैं जम्मू के पुंछ जिले से हूं। वहां माहौल काफी तनावपूर्ण रहते थे। माता-पिता अशिक्षित थे। पिता खेती करते थे। ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई जम्मू में ही की। ग्रेजुएशन तक 6 किमी पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था। स्कूल लकड़ी का बना हुआ था। पानी पीने के लिए भी एक किमी दूर जाना पड़ता था।
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स्कूल से आने के बाद पिता के साथ खेती में हाथ बंटाता था। ऐसे ही दिन गुजरता था। मैं आज जो कुछ भी हूं, अपनी मां की वजह से हूं। उन्होंने मेरा हर कदम पर साथ दिया। मेरी पूरी जिंदगी काफी जद्दोजहद में गुजरी है लेकिन हर मुश्किल समय में मेरी मां, पत्नी और बेटे साथ खड़े रहे।

सवाल: बचपन से क्या बनना चाहते थे? क्या आईएएस ऑफिसर बनना की लक्ष्य था?

जवाब: बचपन से ही पढ़ाई के प्रति गजब का जुनून था इसलिए प्रोफेसर बनना चाहता था। फिर किसी ने सिविल सर्विसेज की तैयारी करने की सलाह दी। मैंने पोस्ट ग्रेजुएशन तक लगातार टॉप किया।

मेरी ग्रामर के साथ अंग्रेजी की वोकेब्लरी इतनी अच्छी थी कि एक बार एक शब्द की स्पेलिंग को लेकर टीचर से शर्त लग गई। उन्होंने तुरंत ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी मंगाई और उसमें मेरी स्पेलिंग सही निकली।

12वीं कक्षा में टॉप किया तो उस समय रेडियो पर टॉपर्स के नाम अनाउंस किए जाते थे। मेरा नाम सबसे पहले बोला गया। वह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात थी। ग्रेजुएशन में गोल्ड मेडलिस्ट भी रह चुका हूं। ग्रेजुएट तक पर्शियन सब्जेक्ट की पढ़ाई की और इस सब्जेक्ट में सबसे ज्यादा नंबर लाने का रिकॉर्ड आज तक मेरे नाम है।

सवाल: आपके समय के एजुकेशन और अब में कितना बदलाव आया है?
जवाब: पढ़ने और पढ़ाने का तरीका बिल्कुल बदल गया है। हमारे समय में ग्रेजुएशन तक पता ही नहीं होता था कि करना क्या है। लेकिन आज 9-10वीं कक्षा के छात्र को पता है कि उसे क्या करना है।

पहले एजुकेशन के प्रति इस कदर जागरूकता नहीं थी। सिंपल किताबें और सिलेबस होते थे लेकिन अब किताबों में वॉल्यूम हो गए हैं। स्कूलों में एक्टिविटी काफी बढ़ गई हैं। सीबीएसई ने भी पिछले एक-दो साल में बहुत से बदलाव किए है, जिनके दूरगामी परिणाम साबित होंगे।

सवाल: वर्तमान शिक्षा प्रणाली कितनी प्रभावी है, क्या बदलाव संभव है?

जवाब: वर्तमान शिक्षा प्रणाली बहुत कारगर है। यह अच्छी बात है कि शिक्षा विभाग को चंडीगढ़ में प्रशासक और एडवाइजर से पूरा सपोर्ट मिला है। इस सपोर्ट की वजह से ही विभाग ने 10वीं के रिजल्ट में 26.76 प्रतिशत का सुधार किया है।

12वीं का नतीजा भी सुधरा हैं। पीसा 2021 के लिए पूरे देश की नजरें चंडीगढ़ पर टिकी हुई हैं। नई एजुकेशन पॉलिसी से भी बहुत फायदा होने वाला है। यह पॉलिसी ग्लोबल इकोनॉमी और भविष्य की जरूरत को देखते हुए बनाई गई है।

सवाल: ऑफिसर बनने के बाद का सफर कैसा रहा?
जवाब: मैंने 1986 में परीक्षा दी और 1987 में सिलेक्शन के बाद ज्वाइन कर लिया। 32 साल के करियर में कई डिपार्टमेंट्स संभाले। कभी किसी के साथ गलत नहीं होने दिया। कई बार इसका नुकसान झेला है। शायद यही कारण रहे कि 32 साल में मेरे 20 के करीब ट्रांसफर हुए हैं। मैंने कभी अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया।

मेरी कमजोरी है कि मैं किसी के साथ गलत होता नहीं देख सकता। दिल्ली में विभिन्न पदों पर 27 साल काम किया। इसके अलावा अंडमान और निकोबार प्रशासन में 3 साल सेक्रेटरी फाइनेंस एंड प्लैनिंग के पद पर रहा। चंडीगढ़ में जुलाई 2017 में एजुकेशन सेक्रेटरी के पद पर ज्वाइन किया है।

सवाल: रिटायरमेंट के बाद क्या प्लान हैं?
जवाब: अभी सोचा नहीं है लेकिन मैं खाली नहीं बैठ सकता। मशरूफ रहना मेरी आदत है। कहीं भी रहूं तो क्रिएटिव काम करता रहूंगा। मुझे किताबें पढ़ने का शौक है। रिटायरमेंट के बाद खुद को पढ़ने और किताबें पढ़ने में बिजी रखूंगा। 

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