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मिलिए उस शख्स से, जिसका एक फॉर्मूला देश की फार्मा इंडस्ट्री में बूम लाया, रैनबैक्सी का ऑफर ठुकराया
Sat, 22 Dec 2018 01:53 PM IST
खुशबू गोयल
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 22 Dec 2018 01:53 PM IST
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प्रोफेसर भूपेंद्र सिंह भूप
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उस शख्स से मिलिए, जिसने एक ऐसा फॉर्मूला दिया, जिससे देश की फार्मा इंडस्ट्री दुनिया भर में चौथे नंबर पर पहुंच गई। इन्होंने टीचिंग के लिए रैनबैक्सी का ऑफर ठुकरा दिया था। देश की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री दुनिया भर में चौथे स्थान पर आती है। इसे गति देने के लिए पीयू के फार्मास्युटिकल साइंस के प्रोफेसर भूपेंद्र सिंह भूप का भी बड़ा योगदान है। उन्होंने वर्ष 1996 में अपने आप फैक्टोप सॉफ्टवेयर तैयार कर फार्मा इंडस्ट्री में पैमाने को सुनियोजित करने का फार्मूला तैयार कर दिया जो वर्ष 2010 के बाद इंडिया की फार्मा इंडस्ट्री के लिए रामबाण साबित हुआ।
वर्ष 2010 में अमेरिका ने फरमान जारी कर दिया था कि क्वालिटी बाई डिजाइन से जब तक दवाएं पास नहीं होंगी उन्हें वह स्वीकार नहीं करेगा। इससे फार्मा इंडस्ट्री में भूचाल आ गया। कंपनियों ने नेट के जरिये साइंटिस्ट तलाशे, उसमें केवल प्रो. भूप का ही नाम मिला। फार्मा की बड़ी कंपनी रैनबैक्सी के वाइस प्रेसीडेंट हिमाद्री सिंह पीयू उनके पास पहुंचे। उन्होंने सीधा प्रस्ताव रखा कि वह फार्मूला सीखने नहीं आए हैं उन्हें नौकरी के लिए लेने आए हैं। प्रस्ताव रखा कि उन्हें कंपनी की ग्रुप लीडरशिप में रखा जाएगा, जो कई पदों से ऊपर थी। पीयू से दस गुना सेलरी भी ऑफर की।
इस ऑफर का प्रो. भूप ने स्वागत किया, लेकिन उन्हें टीचिंग से अटूट प्रेम था। वह अपने जैसे ही साइंटिस्ट तैयार कर उनकी फौज देश सेवा में लगाना चाहते थे। इसी के चलते उन्होंने रैनबैक्सी का प्रस्ताव ठुकरा दिया और आज 100 से अधिक फार्मा साइंटिस्ट तैयार कर दिए जो देश की सेवा में योगदान कर रहे हैं। अब वह आठ जनवरी को चीन की फार्मा इंडस्ट्री के फार्मूलेशन को सुनियोजित करने के तरीके बताने जा रहे हैं। प्रो. भूप को एक बड़ा सम्मान 22 दिसंबर को इंडिया फार्मास्युटिकल एसोसिएशन फेलोशिप का सम्मान देने जा रही है।
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वर्ष 2010 में अमेरिका ने फरमान जारी कर दिया था कि क्वालिटी बाई डिजाइन से जब तक दवाएं पास नहीं होंगी उन्हें वह स्वीकार नहीं करेगा। इससे फार्मा इंडस्ट्री में भूचाल आ गया। कंपनियों ने नेट के जरिये साइंटिस्ट तलाशे, उसमें केवल प्रो. भूप का ही नाम मिला। फार्मा की बड़ी कंपनी रैनबैक्सी के वाइस प्रेसीडेंट हिमाद्री सिंह पीयू उनके पास पहुंचे। उन्होंने सीधा प्रस्ताव रखा कि वह फार्मूला सीखने नहीं आए हैं उन्हें नौकरी के लिए लेने आए हैं। प्रस्ताव रखा कि उन्हें कंपनी की ग्रुप लीडरशिप में रखा जाएगा, जो कई पदों से ऊपर थी। पीयू से दस गुना सेलरी भी ऑफर की।
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इस ऑफर का प्रो. भूप ने स्वागत किया, लेकिन उन्हें टीचिंग से अटूट प्रेम था। वह अपने जैसे ही साइंटिस्ट तैयार कर उनकी फौज देश सेवा में लगाना चाहते थे। इसी के चलते उन्होंने रैनबैक्सी का प्रस्ताव ठुकरा दिया और आज 100 से अधिक फार्मा साइंटिस्ट तैयार कर दिए जो देश की सेवा में योगदान कर रहे हैं। अब वह आठ जनवरी को चीन की फार्मा इंडस्ट्री के फार्मूलेशन को सुनियोजित करने के तरीके बताने जा रहे हैं। प्रो. भूप को एक बड़ा सम्मान 22 दिसंबर को इंडिया फार्मास्युटिकल एसोसिएशन फेलोशिप का सम्मान देने जा रही है।
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पेश है उनसे बातचीत के अंश-
सवाल : मेडिकल कॉलेज पटियाला में आपका दाखिला एमबीबीएस के लिए हो गया था, लेकिन आपने पीयू में फार्मेसी में दाखिला क्यों लिया।
जवाब : मेरा दाखिला एमबीबीएस में एग्जाम के आधार पर हो गया, लेकिन फीस अधिक थी। पिता को कर्ज आदि लेना पड़ता इसलिए उन्हें विश्वास में लेकर पीयू में फार्मेसी में 1974 में दाखिला ले लिया। पीयू से पीएचडी की। फेलोशिप मिली और सिंतबर 1980 में एडहॉक पर पीयू में नौकरी शुरू की। 1984 में यहां परमानेंट लेक्चरर बन गया।
सवाल : आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही।
जवाब : फार्मा इंडस्ट्री में फार्मूलेशन नाम की कोई चीज नहीं थी। तुक्के या अनुभव के आधार पर दवाएं आदि बनती थीं। मुझे इंडस्ट्री में फार्मूलेशन को सिस्टेमेटिक करना था जो पूरा हुआ। 1996 में इसका मजाक भी उड़ा गया, लेकिन वर्ष 2010 में इसका महत्व समझ में आया। अमेरिका के यूएसएएफडीए के नियमों को फोलो करने के लिए मैंने अधिकांश फार्मा इंडस्ट्री को इस फार्मूलेशन के लिए ट्रेंड किया। उसके बाद इंडस्ट्री से तैयार दवाएं क्वालिटी बाई डिजाइन पर खरी उतरी। इस दौरान रैनबैक्सी से बड़ी नौकरी का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन मुझे एकेडमिक में रुचि थी।
सवाल : आपने कई सम्मान पाए। खबर है कि आप अब चीन की फार्मा इंडस्ट्री को प्रशिक्षण देने जा रहे हैं।
जवाब : 13 से अधिक अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। दो दर्जन से अधिक नेशनल अवार्ड मिले। इन अवार्ड ने मनोबल बढ़ाया और मैं काम करता चला गया।
सवाल : 36 साल से आप इस कार्य में लगे हैं। वर्तमान में आप किस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। सेवानिवृत होने के बाद कहां सेवाएं देंगे।
जवाब : कैंसर, स्कीन, दिमागी मलेरिया, एल्जाइमर्स आदि बीमारियों पर काम किया जा रहा है। रिटायरमेंट के बाद भी मैं इस इंडस्ट्री में आने वाले युवाओं का मनोबल बढ़ाऊंगा। शिक्षण संस्थानों में लेक्चर आदि देने का काम करुंगा।
जवाब : मेरा दाखिला एमबीबीएस में एग्जाम के आधार पर हो गया, लेकिन फीस अधिक थी। पिता को कर्ज आदि लेना पड़ता इसलिए उन्हें विश्वास में लेकर पीयू में फार्मेसी में 1974 में दाखिला ले लिया। पीयू से पीएचडी की। फेलोशिप मिली और सिंतबर 1980 में एडहॉक पर पीयू में नौकरी शुरू की। 1984 में यहां परमानेंट लेक्चरर बन गया।
सवाल : आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही।
जवाब : फार्मा इंडस्ट्री में फार्मूलेशन नाम की कोई चीज नहीं थी। तुक्के या अनुभव के आधार पर दवाएं आदि बनती थीं। मुझे इंडस्ट्री में फार्मूलेशन को सिस्टेमेटिक करना था जो पूरा हुआ। 1996 में इसका मजाक भी उड़ा गया, लेकिन वर्ष 2010 में इसका महत्व समझ में आया। अमेरिका के यूएसएएफडीए के नियमों को फोलो करने के लिए मैंने अधिकांश फार्मा इंडस्ट्री को इस फार्मूलेशन के लिए ट्रेंड किया। उसके बाद इंडस्ट्री से तैयार दवाएं क्वालिटी बाई डिजाइन पर खरी उतरी। इस दौरान रैनबैक्सी से बड़ी नौकरी का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन मुझे एकेडमिक में रुचि थी।
सवाल : आपने कई सम्मान पाए। खबर है कि आप अब चीन की फार्मा इंडस्ट्री को प्रशिक्षण देने जा रहे हैं।
जवाब : 13 से अधिक अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। दो दर्जन से अधिक नेशनल अवार्ड मिले। इन अवार्ड ने मनोबल बढ़ाया और मैं काम करता चला गया।
सवाल : 36 साल से आप इस कार्य में लगे हैं। वर्तमान में आप किस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। सेवानिवृत होने के बाद कहां सेवाएं देंगे।
जवाब : कैंसर, स्कीन, दिमागी मलेरिया, एल्जाइमर्स आदि बीमारियों पर काम किया जा रहा है। रिटायरमेंट के बाद भी मैं इस इंडस्ट्री में आने वाले युवाओं का मनोबल बढ़ाऊंगा। शिक्षण संस्थानों में लेक्चर आदि देने का काम करुंगा।