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कोरोना कमांडोः दुधमुंहे बच्चे को घर में छोड़कर मां ने निभाया फर्ज और दी आइसोलेशन वार्ड में ड्यूटी
Thu, 09 Jul 2020 12:18 PM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Thu, 09 Jul 2020 12:18 PM IST
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पति और बच्चे के साथ रमन
- फोटो : अमर उजाला
घर में 6 माह का बच्चा दूध के लिए रोता रहा, लेकिन एक मां ने अपने फर्ज के रास्ते को चुनते हुए देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई। वहीं भावनात्मक रुकावटों को दरकिनार कर अस्पताल में कोरोना के मरीजों के बीच ड्यूटी करती रही। जीएमएसएच 16 की नर्सिंग ऑफिसर रमन दीप कौर ने अपनी ड्यूटी हर हाल में पूरी की।
कोरोना महामारी जिस समय पूरे विश्व में अपने पैर पसार रहा था, उस वक्त रमन अपने गोद से 6 महीने के बच्चे को उतारकर अपनी ड्यूटी करने के लिए घर से निकल पड़ी। रमन मार्च से लगातार अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में ड्यूटी कर रही हैं। शुरुआती दौर में उन्हें एक-एक महीने अपने बच्चे से दूर रहना पड़ रहा था । संक्रमण के खतरे से वह अपने परिवार से दूर रखने के लिए अस्पताल में ही रहकर ड्यूटी पूरी कर रही।
रमन ने बताया कि एक मां के लिए अपने बच्चे को खुद से दूर रखना बहुत ही मुश्किल होता है। लेकिन इस संकट की घड़ी में मुझे अपना फर्ज ज्यादा महत्वपूर्ण लगा । बच्चे की देखरेख के लिए घर में सास ससुर हैं लेकिन अस्पताल में हमारी जिम्मेदारी कोई और नहीं निभा सकता। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत चीजों को तवज्जो देकर मैं अपने फर्ज से बेईमानी नहीं कर सकती थी।
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परिवार के सहयोग से हुआ सब आसान
रमन ने बताया कि अगर उन्हें अपने परिवार का सहयोग न मिलता तो शायद उनके लिए इस संकट की घड़ी में ड्यूटी कर पाना संभव नहीं होता। रमन का कहना है कि जब मेरी सास को पता चला कि मैं ड्यूटी जॉइन कर रही हूं तो उन्होंने मुझे हिम्मत दी और कहा कि मैं निश्चित होकर अपना फर्ज निभाऊं। बच्चे की देखभाल वे कर लेगी। वही रमन की सास परमिंदर कौर का कहना है कि उनकी बहू एक बहादुर लड़की है। उन्हें पता है कि वह अपने फर्ज के लिए कुछ भी कर सकती है। इसलिए उन्होंने उसकी ड्यूटी में हर तरह से अपना सहयोग दिया। रमन के पति त्रवजोत सिंह शेट्टी का अपना बिजनेस है।
बच्चे की याद भी नहीं तोड़ पाई उनके हौसल्ले को
रमन ने बताया कि शुरुआती दौर में अस्पताल में ड्यूटी के दौरान उन्हें हर पल अपने बच्चे की याद आती थी। डिलीवरी के 6 महीने बाद ही रमन ने ड्यूटी जॉइन कर ली। रमन ने बताया कि वह चाहती तो उन्हें मैटरनिटी लीव और ज्यादा मिल सकती थी, लेकिन उनके लिए उस वक्त आराम करने की बजाय अस्पताल में मरीजों का देखभाल करना ज्यादा जरूरी था। इसलिए रमन ने अपने घर परिवार और नवजात बच्चे को खुद से अलग रख अस्पताल में कोरोना के पॉजिटिव मरीजों के बीच हिम्मत और बहादुरी से ड्यूटी की।
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कोरोना महामारी जिस समय पूरे विश्व में अपने पैर पसार रहा था, उस वक्त रमन अपने गोद से 6 महीने के बच्चे को उतारकर अपनी ड्यूटी करने के लिए घर से निकल पड़ी। रमन मार्च से लगातार अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में ड्यूटी कर रही हैं। शुरुआती दौर में उन्हें एक-एक महीने अपने बच्चे से दूर रहना पड़ रहा था । संक्रमण के खतरे से वह अपने परिवार से दूर रखने के लिए अस्पताल में ही रहकर ड्यूटी पूरी कर रही।
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रमन ने बताया कि एक मां के लिए अपने बच्चे को खुद से दूर रखना बहुत ही मुश्किल होता है। लेकिन इस संकट की घड़ी में मुझे अपना फर्ज ज्यादा महत्वपूर्ण लगा । बच्चे की देखरेख के लिए घर में सास ससुर हैं लेकिन अस्पताल में हमारी जिम्मेदारी कोई और नहीं निभा सकता। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत चीजों को तवज्जो देकर मैं अपने फर्ज से बेईमानी नहीं कर सकती थी।
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परिवार के सहयोग से हुआ सब आसान
रमन ने बताया कि अगर उन्हें अपने परिवार का सहयोग न मिलता तो शायद उनके लिए इस संकट की घड़ी में ड्यूटी कर पाना संभव नहीं होता। रमन का कहना है कि जब मेरी सास को पता चला कि मैं ड्यूटी जॉइन कर रही हूं तो उन्होंने मुझे हिम्मत दी और कहा कि मैं निश्चित होकर अपना फर्ज निभाऊं। बच्चे की देखभाल वे कर लेगी। वही रमन की सास परमिंदर कौर का कहना है कि उनकी बहू एक बहादुर लड़की है। उन्हें पता है कि वह अपने फर्ज के लिए कुछ भी कर सकती है। इसलिए उन्होंने उसकी ड्यूटी में हर तरह से अपना सहयोग दिया। रमन के पति त्रवजोत सिंह शेट्टी का अपना बिजनेस है।
बच्चे की याद भी नहीं तोड़ पाई उनके हौसल्ले को
रमन ने बताया कि शुरुआती दौर में अस्पताल में ड्यूटी के दौरान उन्हें हर पल अपने बच्चे की याद आती थी। डिलीवरी के 6 महीने बाद ही रमन ने ड्यूटी जॉइन कर ली। रमन ने बताया कि वह चाहती तो उन्हें मैटरनिटी लीव और ज्यादा मिल सकती थी, लेकिन उनके लिए उस वक्त आराम करने की बजाय अस्पताल में मरीजों का देखभाल करना ज्यादा जरूरी था। इसलिए रमन ने अपने घर परिवार और नवजात बच्चे को खुद से अलग रख अस्पताल में कोरोना के पॉजिटिव मरीजों के बीच हिम्मत और बहादुरी से ड्यूटी की।