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देखिए एक शख्स, जिसे अमेरिका से इंडिया खींच लाया भारतीय संगीत, और अब जिंदा रखने में जुटे हैं

Fri, 28 Dec 2018 02:51 PM IST
खुशबू गोयल सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर Published by: खुशबू गोयल Updated Fri, 28 Dec 2018 02:51 PM IST
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IIT Delhi Professor Kiran Seth Working to Keep Alive Indian Culture and Music
प्रोफेसर किरण सेठ
भारत की संस्कृति व संगीत को जिंदा रखने का ऐसा गजब का जनून छाया, कि एक शख्स अमेरिका छोड़कर इंडिया आ गया और एक आंदोलन में जुट गया। ये हैं खड़गपुर से पासआउट आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर किरन सेठ जिन्होंने स्पिक मैके संस्था की शुरुआत की, जो आज भारत के 500 शहरों में सफलतापूर्वक चल रही है। विदेशों में 50 शहरों में इसकी शाखाएं हैं। डॉ. किरण सेठ इन दिनों जालंधर में हैं, जो देश के कई हिस्सों से विद्यार्थियों को बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन दिखाने के लिए आए हैं।
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‘अमर उजाला’के साथ खास बातचीत में डॉ. किरण सेठ बच्चों की तरफ देखकर कहते हैं, इनमें से एक भी बच्चा भारत के पुरातन संगीत व संस्कृति का पहरेदार बन जाए तो लगेगा कि उनकी तपस्या सफल हो गई। 1976 में न्यूयॉर्क की ब्रुकलिन अकादमी ऑफ म्यूजिक के कॉन्सर्ट में डॉ. किरण ने देखा कि उनके देश की इस परंपरागत चीज को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है। यही मंशा लेकर वह भारत लौट आए और आईआईटी दिल्ली में पढ़ाने व रिसर्च करने लगे। यहीं पर उनको हमख्याली लोग मिले और स्पिक मैके की शुरुआत हो गई।
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सोसाइटी फॉर प्रोमोशन ऑफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक एंड कल्चर अमंग यूथ (स्पिक मैके) के संस्थापक डॉ. किरण को 2009 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। स्पिक मैके साल भर में 5000 से ज्यादा प्रोग्राम आयोजित कराता है, जिसमें 300 चैप्टर इंडिया में होते हैं और 20 देश से बाहर। स्पिक मैके की वेबसाइट के मुताबिक, 2012-13 में संस्था ने भारत के 800 शहरों के 1500 इंस्टीट्यूट्स में 7500 से ज्यादा प्रोग्राम कराए थे, जिसमें 30 लाख स्टूडेंट शामिल हुए। साथ ही, 50 विदेशी शहरों में भी इवेंट कराए गए। अपने इवेंट के लिए स्पिक मैके आश्रम जैसा माहौल तैयार कराता है, ताकि भाग लेने वाले लोग असल भारत के माहौल में इसके असल हुनर को एन्जॉय कर सकें।
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आज के समय में लोग कानसेन बन रहे हैं तानसेन नहीं

डॉ. किरण सेठ बताते हैं कि मौजूदा समय चुनौती भरा है और इसमें पुरातन व क्लासिकल संगीत को जिंदा रखना जरूरी है। आज के दौर में भांगड़ा, गिद्दा, सूफी गायकी लुप्त होती जा रही है। पूरा देश व्यापारीकरण के दौर से निकल रहा है, लेकिन मैं यकीन से कह सकता हूं कि स्पिक मैके एक संस्था नहीं आंदोलन है, जो धीरे धीरे गति जरूर पकड़ेगा। आज के समय में लोग कानसेन बन रहे हैं तानसेन नहीं।

स्पिक मैके की आस्था व सुषमा के साथ जालंधर में डॉ. किरण सेठ ने कहा कि वैज्ञानिक भी इस आंदोलन का हिस्सा बन सकते हैं। वह आईआईटी पासआउट हैं, इसलिए दावे से कह सकते हैं कि अगर वैज्ञानिक पुरातन संस्कृति व संगीत के पहरेदार बन जाएं तो निश्चित ही देश में बदलाव संभव है। जैसे आइंस्टाइन कई घंटे वायलन बजाता था। यही नहीं, गणित में सबसे बड़ा पद फील्ड मैडल लेने वाले प्रोफेसर मंजुल तबला वादक थे। वह अकसर कहा करते थे कि जब मैं मैथ में अटक जाता हूं तो तबला बजाने लगता हूं और जब तबले पर अटकता हूं तो मैथ के सवाल निकालने लगता हूं।

जालंधर में तीन दिन और चलेगी संगीत की शिक्षा
डॉ. किरण सेठ के अनुसार जालंधर के देवी तालाब मंदिर के हाल नंबर 329 में 27 से 30 दिसंबर तक दोपहर 2 बजे से शाम छह बजे तक विद्यार्थियों को पुरातन संगीत व संस्कृति की शिक्षा स्पिक मैके की तरफ से दी जा रही है। यह आगामी तीन दिन तक और चलेगी। उन्होंने कहा कि बस एक चिराग जलाया है, इससे रोशनी पूरे देश में फैलानी है, यही उनका टारगेट है।
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