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हरियाली बचाने को आधी सैलरी देता है ये पुलिसवाला, 5 साल में लगाए 16 हजार पौधे

Tue, 23 Aug 2016 02:15 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 23 Aug 2016 02:15 AM IST
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Chandigarh police constable give half salary to keep greenary
कांस्टेबल देवेंद्र - फोटो : Amar ujala
एक ऐसी भी देश सेवा...हर महीने की आधी सैलरी हरियाली बचाने के नाम, 5 साल में लगा दिए16 हजार पौधे। चंडीगढ़ पुलिस का एक कांस्टेबल अपनी आधी सैलरी पर्यावरण संरक्षण के लिए ही खर्च कर रहा है। गृह सचिव अनुराग अग्रवाल की एस्कार्ट में तैनात कांस्टेबल देवेंद्र का पेड़ों के प्रति कुछ खास लगाव है।
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इसी लगाव का नतीजा है कि वह साढ़े 16 हजार पौधे लगवा चुके हैं। इनमें तीन हजार से अधिक पौधे तो पेड़ का रूप ले चुके हैं। जो 25 से 30 फुट के होकर लोगों को छाया और शहर को खूबसूरती प्रदान कर रहे हैं। 
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देवेंद्र के लिए खुशी का मतलब है पौधरोपण। अपने पैसों से पौधे लाकर दोस्तों और जानकारों से उनके जन्मदिन, शादी, शादी की सालगिरह और बच्चे के जन्म पर उन्होंने पौधे लगवाने शुरू किए थे और अब इस मुहिम से सैकड़ों लोग जुड़ चुके हैं।
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पर्यावरण को नुकसान न हो, इसलिए नहीं लिया कोई वाहन

Chandigarh police constable give half salary to keep greenary
कांस्टेबल देवेंद्र - फोटो : Amar ujala
देवेंद्र ने बताया कि पर्यावरण को नुकसान न हो, इसलिए उन्होंने आज तक अपना वाहन तक नहीं लिया। कभी आपात स्थिति में ही मोटराइज्ड व्हीकल का इस्तेमाल करते हैं, नहीं तो नियमित तौर पर साइकिल से ही चलते हैं। चंडीगढ़ में भी अपने घर से सचिवालय साइकिल से ही आते-जाते हैं। देवेंद्र ने साइकिल पर पर्यावरण बचाओ का बोर्ड लगा रखा है।

अपने गांव से किया मुहिम का आगाज़
सावन के महीने में देवेंद्र ने अपनी 24 छुट्टियां लेकर दोस्तों के साथ साढ़े 7 हजार पेड़ लगाए। देवेंद्र ने बताया कि चंडीगढ़ पुलिस ज्वाइन करने के लिए 2011 में वह चंडीगढ़ आया। यहां की हरियाली से इतना प्रभावित हुआ कि अपने शहर सोनीपत को हरा-भरा बनाने का प्रण ले लिया। इसकी शुरुआत अपने गांव जागसी सूरा से की। देवेंद्र ने बताया कि उसने पौधे लगाने की मुहिम कुछ अलग अंदाज में छेड़ी। अब सोनीपत का शायद ही कोई ऐसा स्कूल, कॉलेज और चिकित्सालय होगा जहां उसने पौधे न लगवाए हों। देवेंद्र ने बताया कि ईंट भट्टों पर उनके बच्चों से वह पौधे लगवाते हैं।

गायों के लिए चलाई ई-रिक्शा
देवेंद्र ने बताया कि गायों के लिए रोटी निकालने की प्रवृति लगभग खत्म हो गई है। शहरों में रोटी या आटा बचने पर उसे सीधा कूड़ेदान में डाल दिया जाता है। जिस कारण गायें कूड़ेदान पर ही मंडराती दिखती हैं। इस प्रवृति को बचाने के लिए उन्होंने अपने खर्च पर ई-रिक्शा शुरू करवाई। जो फेरी लगाकर गऊशाला के लिए घरों से रोटी और आटा जुटाती है। देवेंद्र ने बताया कि ई-रिक्शा में जगह कम होती है और चलाने में भी मेहनत अधिक लगती है इसलिए अब वह इस काम केलिए बैलगाड़ी लगाने की सोच रहे हैं। ताकि उस पर हर चीज के लिए अलग ड्रम भी रखा जा सके।
 
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