{"_id":"5ddba5db8ebc3e54c20b8adc","slug":"success-story-of-punjab-university-urdu-department-first-phd-scholar-hk-lal","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"जज्बे को सलामः उम्र 83 साल, लेकिन पढ़ाने का जुनून ऐसा कि हजारों लोगों को सिखा रहे हैं उर्दू","category":{"title":"Bashindey","title_hn":"बाशिंदे ","slug":"bashindey"}}
जज्बे को सलामः उम्र 83 साल, लेकिन पढ़ाने का जुनून ऐसा कि हजारों लोगों को सिखा रहे हैं उर्दू
Mon, 25 Nov 2019 03:28 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 25 Nov 2019 03:28 PM IST
विज्ञापन
डॉ. लाल
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पंजाब यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग से पहली पीएचडी करने वाले 83 वर्षीय शिक्षक डॉ. एचके लाल के शिष्यों की संख्या आज 15000 से अधिक है। इस उम्र में भी वह थके नहीं हैं। वह लगातार आईएएस, बिग्रेडियर, इंजीनियर्स आदि को उर्दू का प्रशिक्षण दे रहे हैं। पंजाब के दस जिलों में उर्दू के शिक्षकों की कमी को वह खुद पूरा कर रहे हैं।
वे कहते हैं, अब चंडीगढ़ को मैं सिटी ब्यूटीफुल मानने को तैयार नहीं हूं। चंडीगढ़ को नो स्मॉक सिटी का अवार्ड मिला था, लेकिन आज यहां सबसे अधिक धुआं सिगरेट से निकल रहा है। युवा नशीली सिगरेट का सेवन कर रहे हैं। कॉलोनियों में सफाई अधिक नहीं है। यातायात व्यवस्था भी पूरी तरह ठीक नहीं है। इन सब पर ध्यान देने की जरूरत है, तभी चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल रहेगा।
पीयू के उर्दू विभाग में भी डॉ. एचके लाल ने दो साल तक विद्यार्थियों को शिक्षा दी। कहते हैं कि वह उर्दू के साथ ही जीते हैं। उम्र को कोई बाधा नहीं मानते। उर्दू को लेकर उनमें जुनून है। डॉ. एचके लाल को कई पुरस्कार मिले। हरियाणा उर्दू अकादमी ने भी उन्हें सम्मान दिया। उनका कहना है कि जब तक सांसें चलती रहेंगी वह उर्दू पढ़ाते रहेंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
वे कहते हैं, अब चंडीगढ़ को मैं सिटी ब्यूटीफुल मानने को तैयार नहीं हूं। चंडीगढ़ को नो स्मॉक सिटी का अवार्ड मिला था, लेकिन आज यहां सबसे अधिक धुआं सिगरेट से निकल रहा है। युवा नशीली सिगरेट का सेवन कर रहे हैं। कॉलोनियों में सफाई अधिक नहीं है। यातायात व्यवस्था भी पूरी तरह ठीक नहीं है। इन सब पर ध्यान देने की जरूरत है, तभी चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल रहेगा।
विज्ञापन
पीयू के उर्दू विभाग में भी डॉ. एचके लाल ने दो साल तक विद्यार्थियों को शिक्षा दी। कहते हैं कि वह उर्दू के साथ ही जीते हैं। उम्र को कोई बाधा नहीं मानते। उर्दू को लेकर उनमें जुनून है। डॉ. एचके लाल को कई पुरस्कार मिले। हरियाणा उर्दू अकादमी ने भी उन्हें सम्मान दिया। उनका कहना है कि जब तक सांसें चलती रहेंगी वह उर्दू पढ़ाते रहेंगे।
विज्ञापन
पाकिस्तान में लिया जन्म, पंजाब सिंचाई विभाग में की नौकरी
डॉ. एचके लाल का जन्म 1937 में पाकिस्तान में हुआ था। उसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से हाईस्कूल पास की। उस दौरान दसवीं के लिए बोर्ड नहीं था। पीयू के उर्दू विभाग में 1984 से पीएचडी शुरू हुई। सबसे पहले उन्होंने 1989 में यहां से पीएचडी की उपाधि मिली। पीएचडी के साथ पंजाब सिंचाई विभाग में नौकरी की और अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए।
नौकरी के साथ ही शाम पांच बजे के बाद पंजाब सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ लैंग्वेज में उर्दू पढ़ाना शुरू कर दिया। पंजाब के 10 जिलों में उर्दू के शिक्षक कम हैं। 45 वर्ष से वह नौकरीपेशा लोगों को उर्दू पढ़ा रहे हैं। यह सेंटर चंडीगढ़ में संचालित है। पहला मेहनताना 100 रुपये मिला था। उन्होंने 50 साल तक किराये के मकान में जीवनयापन किया।
अब चंडीगढ़ में खुलकर नहीं ले पाते सांस
चंडीगढ़ जब बसा था तो लोग खुलकर सांस लेते थे। यहां की हरियाली दुनिया में प्रसिद्ध थी। आबादी भी अधिक नहीं थी। यातायात व्यवस्था भी बेहतर चल रही थी, लेकिन धीरे धीरे व्यवस्थाएं बेपटरी होती गईं। आज सफाई व्यवस्था नहीं हो पा रही है। इसके कारण लोगों को दिक्कतें हो रही हैं।
उन्होंने कहा, जनता की मांगों को देखते हुए निर्णय लेने होंगे। चंडीगढ़ को पुराने स्वरूप में लाना होगा। इसके लिए सरकार, अधिकारी ही नहीं जनता को भी साथ देना होगा। जहां जनता की भागीदारी ठीक होगी वहां व्यवस्थाएं और बेहतर होती चली जाएंगी।
नौकरी के साथ ही शाम पांच बजे के बाद पंजाब सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ लैंग्वेज में उर्दू पढ़ाना शुरू कर दिया। पंजाब के 10 जिलों में उर्दू के शिक्षक कम हैं। 45 वर्ष से वह नौकरीपेशा लोगों को उर्दू पढ़ा रहे हैं। यह सेंटर चंडीगढ़ में संचालित है। पहला मेहनताना 100 रुपये मिला था। उन्होंने 50 साल तक किराये के मकान में जीवनयापन किया।
अब चंडीगढ़ में खुलकर नहीं ले पाते सांस
चंडीगढ़ जब बसा था तो लोग खुलकर सांस लेते थे। यहां की हरियाली दुनिया में प्रसिद्ध थी। आबादी भी अधिक नहीं थी। यातायात व्यवस्था भी बेहतर चल रही थी, लेकिन धीरे धीरे व्यवस्थाएं बेपटरी होती गईं। आज सफाई व्यवस्था नहीं हो पा रही है। इसके कारण लोगों को दिक्कतें हो रही हैं।
उन्होंने कहा, जनता की मांगों को देखते हुए निर्णय लेने होंगे। चंडीगढ़ को पुराने स्वरूप में लाना होगा। इसके लिए सरकार, अधिकारी ही नहीं जनता को भी साथ देना होगा। जहां जनता की भागीदारी ठीक होगी वहां व्यवस्थाएं और बेहतर होती चली जाएंगी।