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जज्बे को सलामः 75 साल की उम्र में रोजाना 8 घंटे कर रहे काम, नहीं लेते एक रुपया तनख्वाह
Mon, 23 Sep 2019 12:58 PM IST
खुशबू गोयल
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 23 Sep 2019 12:58 PM IST
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केके शारदा
- फोटो : फाइल फोटो
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लोगों को यह पता है कि रोज गार्डन, रॉक गार्डन, सुखना लेक कहां है...लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि सेक्टर-16 में गांधी स्मारक भी है। यह चंडीगढ़ का ‘राजघाट’ है। दुख इस बात का भी है कि यहां लोकल लोगों से ज्यादा तो टूरिस्ट आते हैं। उन्हें गांधी जी याद हैं लेकिन चंडीगढ़ वासी भूल गए हैं। यह कहना है गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष केके शारदा का। वह और उनकी पत्नी प्रज्ञा शारदा नवंबर 2016 से गांधी स्मारक को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। केके शारदा की उम्र 75 वर्ष है। इस उम्र भी वह रोजाना काम करते हैं। वह भी बिना किसी तनख्वाह के। केके शारदा खादी सेवा संघ, स्वतंत्रता सेनानी एसोसिएशन, आचार्यकुल आदि संस्थाओं के भी अध्यक्ष हैं। पेश है उनसे बातचीत के अंश...
सवाल: आप गांधी स्मारक से कैसे जुड़े?
जवाब: मेरे पिता एमके शारदा स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने नौकरी छोड़कर गांधी जी के साबरमती आश्रम में तीन महीने मैला उठाया था। देश की आजादी के लिए तीन बार जेल गए। देश आजाद हुआ तो पंजाब खादी बोर्ड में सर्विस की और सचिव पद से रिटायर हुए। बचपन में पिताजी द्वारा सुनाई गईं आजादी की कहानियां प्रेरित करती रहीं। पिता का गांधी जी के प्रति प्रेम देखकर ही आज तक गांधी जी से जुड़ा हुआ हूं।
सवाल: बीते तीन साल में गांधी स्मारक कितना बदला?
जवाब: सबसे पहले गांधी स्माकर में गांधी जी की मूर्ति स्थापित कराई गई क्योंकि उसके बिना गांधी स्मारक अधूरा-अधूरा सा था। यहां फुली एसी लाइब्रेरी बनाई गई, जिसमें रोजाना 70-80 बच्चे बैठकर पढ़ाई करते हैं। गांधी हाल की मरम्मत कराई गई। पूरी बिल्डिंग का कायाकल्प किया गया। गांधी जी से लोगों को जोड़ने के लिए म्यूजियम बनाया गया। कैंटीन बनाई गई। अब आगे एक ऑडिटोरियम बनाने का प्लान है, जिसको लेकर बातचीत चल रही है।
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सवाल: आप गांधी स्मारक से कैसे जुड़े?
जवाब: मेरे पिता एमके शारदा स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने नौकरी छोड़कर गांधी जी के साबरमती आश्रम में तीन महीने मैला उठाया था। देश की आजादी के लिए तीन बार जेल गए। देश आजाद हुआ तो पंजाब खादी बोर्ड में सर्विस की और सचिव पद से रिटायर हुए। बचपन में पिताजी द्वारा सुनाई गईं आजादी की कहानियां प्रेरित करती रहीं। पिता का गांधी जी के प्रति प्रेम देखकर ही आज तक गांधी जी से जुड़ा हुआ हूं।
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सवाल: बीते तीन साल में गांधी स्मारक कितना बदला?
जवाब: सबसे पहले गांधी स्माकर में गांधी जी की मूर्ति स्थापित कराई गई क्योंकि उसके बिना गांधी स्मारक अधूरा-अधूरा सा था। यहां फुली एसी लाइब्रेरी बनाई गई, जिसमें रोजाना 70-80 बच्चे बैठकर पढ़ाई करते हैं। गांधी हाल की मरम्मत कराई गई। पूरी बिल्डिंग का कायाकल्प किया गया। गांधी जी से लोगों को जोड़ने के लिए म्यूजियम बनाया गया। कैंटीन बनाई गई। अब आगे एक ऑडिटोरियम बनाने का प्लान है, जिसको लेकर बातचीत चल रही है।
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सवाल: कोई ऐसी चीज, जिसका आपको मलाल रहा हो?
जवाब: शहर के बीचोबीच सेक्टर-16 में गांधी स्मारक है। रोजाना हजारों लोग यहां से गुजरते हैं लेकिन कोई यहां नहीं आता। हैरानी की बात है कि विदेशी टूरिस्ट ढूंढते-ढूंढते किसी तरह से यहां पहुंच जाते हैं लेकिन शहरवासी यहां रहते हुए भी नहीं पहुंच पाते। लोग परिवार को लेकर सुखना लेक, रोज़ गार्डन, रॉक गार्डन लेकर जाते हैं लेकिन यहां क्यों नहीं आते। यहां तो उन्हें और उनके बच्चों को सीखने को बहुत कुछ मिलेगा। परिवार साथ यहां आकर गांधी जी के पूरे जीवन को आंखों से देख सकते हैं। उनकी वाणी को सुन सकते हैं।
सवाल: क्या कारण है कि लोग गांधी स्मारक नहीं पहुंचते?
जवाब: यह तो मेरी समझ से भी परे है। सेक्टर-16 का गांधी स्मारक चंडीगढ़ का ‘राजघाट’ है। दिल्ली के बाद चंडीगढ़ में ही गांधी स्मारक है। आस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों से लोग यहां पहुंचते हैं लेकिन लोकल लोगों की कमी है। प्रशासन के आदेशों के बाद स्कूली बच्चे यहां जरूर आते हैं। यहां पर गांधी म्यूजियम, लाइब्रेरी, खादी दुकान, नेचुरल थैरेपी आदि सारी सुविधाएं हैं, कमी है तो सिर्फ लोगों की।
सवाल: उम्र के इस पड़ाव में भी खुद को फिट कैसे रखते हैं?
जवाब: मेरा रोजाना का रुटीन काफी व्यवस्थित रहता है। रोजाना सैर, समय पर खाना, दफ्तर पहुंचना, काम करना, लोगों से मिलते-जुलते रहना, यह सब मेरे रुटीन का हिस्सा है। मुझे खाली बैठना बिल्कुल भी नहीं पसंद इसलिए ही 75 साल की उम्र में अभी भी रोजाना 8 घंटे काम करता हूं।
जवाब: शहर के बीचोबीच सेक्टर-16 में गांधी स्मारक है। रोजाना हजारों लोग यहां से गुजरते हैं लेकिन कोई यहां नहीं आता। हैरानी की बात है कि विदेशी टूरिस्ट ढूंढते-ढूंढते किसी तरह से यहां पहुंच जाते हैं लेकिन शहरवासी यहां रहते हुए भी नहीं पहुंच पाते। लोग परिवार को लेकर सुखना लेक, रोज़ गार्डन, रॉक गार्डन लेकर जाते हैं लेकिन यहां क्यों नहीं आते। यहां तो उन्हें और उनके बच्चों को सीखने को बहुत कुछ मिलेगा। परिवार साथ यहां आकर गांधी जी के पूरे जीवन को आंखों से देख सकते हैं। उनकी वाणी को सुन सकते हैं।
सवाल: क्या कारण है कि लोग गांधी स्मारक नहीं पहुंचते?
जवाब: यह तो मेरी समझ से भी परे है। सेक्टर-16 का गांधी स्मारक चंडीगढ़ का ‘राजघाट’ है। दिल्ली के बाद चंडीगढ़ में ही गांधी स्मारक है। आस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों से लोग यहां पहुंचते हैं लेकिन लोकल लोगों की कमी है। प्रशासन के आदेशों के बाद स्कूली बच्चे यहां जरूर आते हैं। यहां पर गांधी म्यूजियम, लाइब्रेरी, खादी दुकान, नेचुरल थैरेपी आदि सारी सुविधाएं हैं, कमी है तो सिर्फ लोगों की।
सवाल: उम्र के इस पड़ाव में भी खुद को फिट कैसे रखते हैं?
जवाब: मेरा रोजाना का रुटीन काफी व्यवस्थित रहता है। रोजाना सैर, समय पर खाना, दफ्तर पहुंचना, काम करना, लोगों से मिलते-जुलते रहना, यह सब मेरे रुटीन का हिस्सा है। मुझे खाली बैठना बिल्कुल भी नहीं पसंद इसलिए ही 75 साल की उम्र में अभी भी रोजाना 8 घंटे काम करता हूं।