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संचिता बनर्जीः इंगलिश लिटरेचर की छात्रा, मां की जिद ने बनाया कथक डांसर

Sat, 30 Jul 2016 06:46 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sat, 30 Jul 2016 06:46 PM IST
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sanchita banerjee, classical dance, kathak dancer sanchita banerjee, art & cultural, chandigarh
क्लासिकल डांसर संचिता बैनर्जी - फोटो : फाइल फोटो
इंगलिश लिटरेचर की छात्रा है, लेकिन मां की जिद ने उन्हें कथक डांसर बना दिया। ये प्रोफाइल है, संचिता बनर्जी का। कोलकाता में जिस जगह रहती थी, वहां धारणा थी कि शादी के लिए लड़की को संगीत आना जरूरी है। इसीलिए वहां लड़कियों के घर वाले उन्हें ऐसे स्कूल में एडमिशन दिलाते थे, जहां संगीत सिखाया जाता हो। लेकिन मेरी मां कुछ हटकर करना चाहती थी।
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उन्होंने जिद की और संगीत की जगह एक डांस स्कूल में मेरा दाखिला कराया। यह कहना है ओडिसी डांसर संचिता बनर्जी का जो मंगलवार से चंडीगढ़ के सरकारी स्कूलों में आयोजित वर्कशॉप में  बच्चों को ओडिसी डांस सिखा रही हैं। संचिता बनर्जी का कहना है कि डांस स्कूल में उन्होंने कथक सीखना शुरू किया। उस समय वह पांच साल की थी। घर आकर कथक सीखती तो सहेलियां भी हारमोनियम पर रियाज करती।
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अंग्रेजी साहित्य की छात्रा व डांसर संचिता ने बताया कि कथक सीखते समय उन्हें लगता था कि डांस सीखना है और यह डांस नहीं है। क्योंकि वह गाने के साथ डांस करना चाहती थी। कथक में गाना नहीं होता। उस समय छोटी थी, इसलिए बोल भी नहीं पाती थी। फील करती लेकिन जो चाहती थी उसे एक्सप्रेस नहीं कर पाती। फिर भी कथक सीख रही थी।
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एक दिन उन्होंने टीवी पर संयुक्ता पाणिग्रही को डांस करते देखा। उनके कॉस्टयूम और नृत्य ने इतना आकर्षित किया कि ठान लिया यही नृत्य सीखना है। उस समय उन्हें इस नृत्य का नाम भी पता नहीं था। इसे सीखने के लिए गुरु ढूंढना शुरू किया। इसके बाद एक दोस्त उन्हें कोलकाता में ओडिसी डांसर शर्मिला विश्वास के पास लेकर गया। लेकिन कुछ व्यस्त होने का कारण उनके साथ टाइमिंग सेट नहीं हो पा रही थी।

उन्होंने खुद ही कोलकाता में अलोक कन्नगो के पास भेजा। वहां गुरु रतिकांता महापात्रा की वर्कशॉप अटेंड की। उनसे प्रेरित होकर निर्णय लिया कि ओडिसा जाकर यह नृत्य सीखना है। फिर कभी संचिता ओडिसा चली जाती तो कभी गुरु जी और उनकी बहू कोलकाता आकर नृत्य सिखाते। गुरु जी के इंतकाल के बाद भी यह सिलसिला अभी तक जारी है और उनकी बहू सुजाता महापात्रा से नृत्य सीख रही हैं।

बच्चों को उनकी भाषा में सिखाया जाना चाहिए
संचिता मुखर्जी ने बताया कि अगर बच्चों को उनकी भाषा में कोई बात सिखाई जाए तो वह आसानी से ग्रहण करते हैं। अगर एक टीचर उनका दोस्त बनकर सिखाए तो बच्चे उसे रुचि से सीखते हैं। ओडिसी हो या कोई और नृत्य शैली, यह ऐसी कला नहीं कि देखा और आप इसमें निपुण हो गए। इसके लिए कड़ी मेहनत व रुचि जरूरी है।


आसानी से मिली चीज की कदर कम होती है
संचिता मुखर्जी कहती हैं कि हमारे देश के लिए गर्व की बात है कि विदेशी यहां आकर हमारे पारंपरिक नृत्य और संगीत सीख रहे हैं। पद्मश्री देवयानी कुमारी जैसे और भी कई विदेशी कलाकार क्लासिकल डांस और म्यूजिक सीखने के लिए अपनी जन्मभूमि छोड़कर यहां रह रहे हैं। लेकिन दुखद है कि हमारे देश में कुछेक लोग ही इसमें रुचि ले रहे हैं और कहीं न कही वेस्टर्न म्यूजिक व डांस को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।
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