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बेमिसालः भारतीय सेना में रहे पंजाब की सरदारी, इस मुहिम में जुटे हैं रिटायर्ड मेजर जनरल ग्रेवाल
Mon, 23 Dec 2019 04:40 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 23 Dec 2019 04:40 PM IST
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रिटायर्ड मेजर जनरल जीएस ग्रेवाल
- फोटो : अमर उजाला
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जय जवान जय किसान के नारे को सार्थक करने वाले पंजाब की 21वीं सदी की शुरुआत में सेना में भागीदारी न के बराबर रह गई थी। इसे सुधारने का जिम्मा रिटायर्ड मेजर जनरल जीएस ग्रेवाल को दिया गया। ग्रेवाल ने महाराज रणजीत सिंह आर्म्ड फोर्सेस प्रिपेटरी इंस्टीट्यूट (एएफपीआई) के जरिए सेना में पंजाब की शान लौटाने का काम किया।
2010 में सेना में पंजाब के ऑफिसर्स की भागीदारी महज 2 प्रतिशत रह गई थी, लेकिन ग्रेवाल के प्रयासों से आज अकेले एएफपीआई की भागीदारी ही करीब 10 प्रतिशत हो गई है। सैन्य परिवार में जन्मे जीएस ग्रेवाल ने पटियाला के वाईपीएस से 10वीं तक की शिक्षा ली। 1968 में वह एनडीए के लिए चयनित हुए। 1971 में बतौर लेफ्टिनेंट उन्होंने सेना में कमीशन हासिल किया।
खास बात यह रही कि ग्रेवाल ने अपने पिता की रेजिमेंट हाट्स एन हार्स में ही बतौर सैन्य अधिकारी अपने कॅरिअर की शुरुआत की। 1992 में इस रेजिमेंट को उन्होंने कमांड किया। 2010 में रिटायर होने से पहले दो साल वह नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) के चीफ इंस्ट्रक्टर रहे।
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हर साल संस्थान के 25 से अधिक बच्चे एनडीए में जा रहे
बता दें कि हर साल करीब 6 लाख युवा एनडीए की परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें से 300 ही चयनित होते हैं। एएफपीआई के 47 छात्र आर्मी, 5 नेवी और 6 एयरफोर्स में बतौर अधिकारी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इंस्टीट्यूट हर साल 40-45 बच्चों को सिखलाई देता है और इनमें से औसतन 25 से ज्यादा स्टूडेंट्स हर साल एनडीए के लिए चयनित हो रहे हैं।
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2010 में सेना में पंजाब के ऑफिसर्स की भागीदारी महज 2 प्रतिशत रह गई थी, लेकिन ग्रेवाल के प्रयासों से आज अकेले एएफपीआई की भागीदारी ही करीब 10 प्रतिशत हो गई है। सैन्य परिवार में जन्मे जीएस ग्रेवाल ने पटियाला के वाईपीएस से 10वीं तक की शिक्षा ली। 1968 में वह एनडीए के लिए चयनित हुए। 1971 में बतौर लेफ्टिनेंट उन्होंने सेना में कमीशन हासिल किया।
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खास बात यह रही कि ग्रेवाल ने अपने पिता की रेजिमेंट हाट्स एन हार्स में ही बतौर सैन्य अधिकारी अपने कॅरिअर की शुरुआत की। 1992 में इस रेजिमेंट को उन्होंने कमांड किया। 2010 में रिटायर होने से पहले दो साल वह नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) के चीफ इंस्ट्रक्टर रहे।
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हर साल संस्थान के 25 से अधिक बच्चे एनडीए में जा रहे
बता दें कि हर साल करीब 6 लाख युवा एनडीए की परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें से 300 ही चयनित होते हैं। एएफपीआई के 47 छात्र आर्मी, 5 नेवी और 6 एयरफोर्स में बतौर अधिकारी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इंस्टीट्यूट हर साल 40-45 बच्चों को सिखलाई देता है और इनमें से औसतन 25 से ज्यादा स्टूडेंट्स हर साल एनडीए के लिए चयनित हो रहे हैं।
1968 में 30 प्रतिशत थी पंजाब के युवाओं की भागीदारी
ग्रेवाल बताते हैं कि 1968 में जब उन्होंने एनडीए ज्वाइन किया तब सेना में पंजाब की भागीदारी 30 प्रतिशत के करीब थी लेकिन 2010 में यह भागीदारी महज 2 प्रतिशत रह गई थी। यह बात न सिर्फ उन्हें बल्कि एनडीए के कमांडेंट एयर मार्शल रंधावा को भी खटकती थी। एक मौके पर पंजाब सरकार के सामने यह मुद्दा उठाया गया।
इसके बाद पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री परकाश सिंह बादल ने पंजाब के युवाओं को सेना में बतौर अधिकारी भेजने के लिए एक संस्थान शुरू करने की रूपरेखा तैयार की। इसी दौरान रिटायर हुए मेजर जनरल ग्रेवाल को इस संस्थान को बनाने और शुरू करने की जिम्मेदारी पंजाब सरकार ने दी। रिटायरमेंट के बाद ग्रेवाल आराम करने की बजाय पंजाब के युवाओं को उनका मुकाम हासिल करवाने की मुहिम में जुट गए।
महज एक साल के बाद 2011 में महाराजा रणजीत सिंह आर्म्ड फोर्सेस प्रिपेटरी इंस्टीट्यूट का पहला बैच शुरू हो गया। इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर के तौर पर ग्रेवाल के अनुशासन व प्रतिबद्धता की ही देन है कि दो साल का कोर्स करने के बाद 2013 से अब तक इंस्टीट्यूट के 138 स्टूडेंट्स एनडीए में जाने में सफल रहे।
इसके बाद पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री परकाश सिंह बादल ने पंजाब के युवाओं को सेना में बतौर अधिकारी भेजने के लिए एक संस्थान शुरू करने की रूपरेखा तैयार की। इसी दौरान रिटायर हुए मेजर जनरल ग्रेवाल को इस संस्थान को बनाने और शुरू करने की जिम्मेदारी पंजाब सरकार ने दी। रिटायरमेंट के बाद ग्रेवाल आराम करने की बजाय पंजाब के युवाओं को उनका मुकाम हासिल करवाने की मुहिम में जुट गए।
महज एक साल के बाद 2011 में महाराजा रणजीत सिंह आर्म्ड फोर्सेस प्रिपेटरी इंस्टीट्यूट का पहला बैच शुरू हो गया। इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर के तौर पर ग्रेवाल के अनुशासन व प्रतिबद्धता की ही देन है कि दो साल का कोर्स करने के बाद 2013 से अब तक इंस्टीट्यूट के 138 स्टूडेंट्स एनडीए में जाने में सफल रहे।