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कंचनः ग्रेजुएशन बीच में छोड़ फाइन आर्ट में लिया दाखिला, आज नामी पेंटर
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 21 Sep 2016 10:04 PM IST
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उत्तरप्रदेश की पेंटर कंचन चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम के दौरान
आर्ट्स से ग्रेजुएशन कर रही थीं, लेकिन बीच में ही छोड़कर फाइन आर्ट में दाखिला ले लिया। नतीजा, आज कंचन नामी पेंटर हैं। पेंटिंग अपनी भावनाओं, विचारों को व्यक्त करने का सबसे बढ़िया और उचित माध्यम है। इंसान जो महसूस करता है वह अपने आर्ट के जरिए बयां कर सकता है। यह कहना है देश की फेमस पेंटर कंचन वर्मा का।
उत्तरप्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली कंचन मंगलवार को एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने चंडीगढ़ पहुंची थी। कंचन बताती हैं कि पापा आर्मी में थे, इसलिए जहां भी उनका ट्रांसफर होता तो पूरा परिवार उनके साथ जाता। अलग-अलग राज्य में रहने से वहां की संस्कृतियों की जानकारी होने लगी। बात 1998 की है। तब हम जम्मू में थे। उस समय मैं बीए सैकंड ईयर में पढ़ती थी।
वहां मुझे जेएंडके के एक फेमस पेंटर एसएस बुलारिया मिले। उन्होंने मेरी पेंटिंग में रूचि देखकर मुझे इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट जम्मू एंड कश्मीर में दाखिला लेने के लिए कहा। उस समय तो मुझे यह भी नहीं पता था कि आर्ट का कोई स्कूल या कॉलेज भी होता है।
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जब मैंने अपने माता पिता से इस इंस्टीट्यूट में एडमिशन लेने की बात की तो उन्होंने इंकार कर दिया। लेकिन वे इससे खुश नहीं थे। काफी मनाने के बाद मेरा दाखिला करवाया। मैंने अपने शौक को पूरा करने के लिए बीए की पढ़ाई बीच में छोड़कर वहां एडमिशन लिया और पांच साल तक फाइन आर्ट की पढ़ाई की। धीरे-धीरे घर वाले भी मेरे काम की सराहना करने लग गए।
कंचन वर्मा बताती हैं कि मैं अपनी पेंटिंग्स में ज्यादातर धागे का इस्तेमाल करती हूं। मिडल क्लास फैमिली से होने के कारण मैं व्यर्थ चीजों को हमेशा अपने वर्क में इस्तेमाल करती हूं। भारतीय संस्कृ ति में मौली के धागे की बहुत ज्यादा मान्यता है। इसलिए मैंने उसका इस्तेमाल अपने आर्ट वर्क में किया है। यह होप ट्री मेरी उन्हीं क्रिएशंस में से एक है।
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उत्तरप्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली कंचन मंगलवार को एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने चंडीगढ़ पहुंची थी। कंचन बताती हैं कि पापा आर्मी में थे, इसलिए जहां भी उनका ट्रांसफर होता तो पूरा परिवार उनके साथ जाता। अलग-अलग राज्य में रहने से वहां की संस्कृतियों की जानकारी होने लगी। बात 1998 की है। तब हम जम्मू में थे। उस समय मैं बीए सैकंड ईयर में पढ़ती थी।
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वहां मुझे जेएंडके के एक फेमस पेंटर एसएस बुलारिया मिले। उन्होंने मेरी पेंटिंग में रूचि देखकर मुझे इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट जम्मू एंड कश्मीर में दाखिला लेने के लिए कहा। उस समय तो मुझे यह भी नहीं पता था कि आर्ट का कोई स्कूल या कॉलेज भी होता है।
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जब मैंने अपने माता पिता से इस इंस्टीट्यूट में एडमिशन लेने की बात की तो उन्होंने इंकार कर दिया। लेकिन वे इससे खुश नहीं थे। काफी मनाने के बाद मेरा दाखिला करवाया। मैंने अपने शौक को पूरा करने के लिए बीए की पढ़ाई बीच में छोड़कर वहां एडमिशन लिया और पांच साल तक फाइन आर्ट की पढ़ाई की। धीरे-धीरे घर वाले भी मेरे काम की सराहना करने लग गए।
कंचन वर्मा बताती हैं कि मैं अपनी पेंटिंग्स में ज्यादातर धागे का इस्तेमाल करती हूं। मिडल क्लास फैमिली से होने के कारण मैं व्यर्थ चीजों को हमेशा अपने वर्क में इस्तेमाल करती हूं। भारतीय संस्कृ ति में मौली के धागे की बहुत ज्यादा मान्यता है। इसलिए मैंने उसका इस्तेमाल अपने आर्ट वर्क में किया है। यह होप ट्री मेरी उन्हीं क्रिएशंस में से एक है।