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फिल्म मेकिंग में बेटियों की भूमिका को लेकर खुलकर बोलीं ये प्रोड्यूसर

Sun, 11 Sep 2016 10:05 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 11 Sep 2016 10:05 AM IST
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renowned film produnce saba deewan and vijaya singh interview
चंडीगढ़ में अपनी फिल्म की स्क्रीनिंग के लिए पहुंची विजया सिंह - फोटो : अमर उजाला
मिलिए एक ऐसी शख्सियत से, जिन्होंने फिल्म निर्माण की दुनिया में एक नाम कमाया। लेकिन वे कहती हैं कि फिल्म मेकिंग की लाइन में बेटियां कम आती हैं। इसके पीछे एक खास कारण है और वो ये कि समाज की संकुचित सोच और मानसिकता कुंठा है। आमतौर पर यही सोचा जाता है कि लड़की डॉक्टर, टीचर और नर्स बने तो ठीक है।
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यह कहना है कोटा में पैदा हुई युवा फिल्म मेकर विजया सिंह का जो शनिवार को जानी मानी फिल्म मेकर सबा दिवान के साथ फिल्म की स्क्रीनिंग के लिए गवर्नमेंट म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी आई हुई थीं। इसका आयोजन चंडीगढ़ क्रिएटिव सिनेमा सर्कल की ओर से किया गया था। कार्यक्रम की शुरुआत विजया सिंह की शॉर्ट फिल्म अनशेड्यूल्ड अराइवल्स की स्क्रीनिंग से हुई।
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11 मिनट की अवधि की इस शॉर्ट फिल्म को इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन स्कूल्स की ओर से 2016 में सीएपीए अवॉर्ड भी मिल चुका है। इसके बाद दिल्ली बेस्ड सबा दिवान की 84 मिनट की नाच-द डांस फिल्म की स्क्रीनिंग हुई। अमर उजाला के साथ बातचीत में दोनों फिल्म मेकर ने अपने सफर को साझा किया।
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दिल्ली में पैदा हुई सबा दिवान बताती हैं कि फिल्मों में जाने की उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करते समय हमें डॉक्यूमेंट्री बनानी ही पड़ती थी और यहीं से इसमें रुचि पैदा हो गई। इसके लिए उन्होंने नारीवाद को चुना।

उन्होंने बताया कि इसका कारण है कि एक औरत ही दूसरी औरत के दर्द को, उसकी भावना को बेहतर बयां कर सकती है। इसलिए फिल्मों के जरिये औरतों की सोच और उसकी इच्छाओं को दुनिया के सामने लाने का निर्णय लिया। सीता की फैमिली, दिल्ली-मुंबई-दिल्ली, नाच-द डांस और द अदर सांग उनकी चर्चित फिल्में हैं। इसके अलावा वे तवायफ पर एक पुस्तक भी लिख रही हैं।


विजया सिंह फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से इसी साल पास आउट हुई हैं।  अन शेड्यूल्ड अराइवल्स उनकी पहली डॉक्यूमेंट्री है। उन्होंने बताया कि उन्होंने इस पूरी डॉक्यूमेंट्री का शूट दो दिन में किया था। इसके अलावा वह ट्रेन जर्नी इन हिंदी सिनेमा नाम की एक पुस्तक पर काम भी कर रही है।
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