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हरियाली के प्रहरी: पहले उठाते हैं कूड़ा फिर लगाते हैं बूटा, पीयू के इन प्रोफेसरों का योगदान है महान

Sun, 24 Oct 2021 01:11 PM IST
ajay kumar सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 24 Oct 2021 01:11 PM IST
सार

पीयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रो. एमसी सिद्धू पर्यावरण प्रेमी के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने शोध के जरिए रक्तचंदन, चिर्मिठी आदि के बीज तैयार किए। बीज से तैयार पौधे हर्बल गार्डन, बॉटनीकल गार्डन में लगाए। इसके अलावा पीयू में दीमक लगे पेड़ों का इलाज कर रहे हैं। फंगस के विशेषज्ञ हैं, इसलिए वह कई पेड़ों की जान बचा चुके। वह सुबह से ही पेड़ों का हाल लेना शुरू करते हैं जो रात तक चलता है।

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Prof RC Sobti promoting greenery in Panjab University
प्रो. आरसी सोबती - फोटो : फाइल

विस्तार

आज हम हरियाली के एक ऐसे प्रहरी से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं जिनके शोध तो देश-दुनिया में प्रसिद्ध हैं हीं, साथ ही पर्यावरण बचाने के लिए बेहतरीन कार्य कार्य कर रहे हैं। ये नेक कार्य कर रहे हैं पीयू के पूर्व वीसी प्रो. आरसी सोबती। उनका नियम है कि वह सुबह कूड़ा उठाते हैं और उसके बाद बूटा (पेड़) लगाते हैं। इसी मेहनत का परिणाम था कि पीयू में उन्होंने एक नहीं, दो नहीं, पूरे चार पार्क बनाए। अब वह पांचवां पार्क मिनी रोज गार्डन बनाने जा रहे हैं। यह पार्क साउथ कैंपस बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सामने बनेगा। 

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पाम गार्डन, रोज गार्डन प्रो. सोबती की देन, नीम के सर्वाधिक पेड़ लगाए
पीयू के पूर्व वीसी पद्मश्री प्रो. आरसी सोबती अपने कार्यकाल के दौरान पीयू कैंपस में सुबह चार बजे उठते थे। उसके बाद पांच बजे वह कैंपस के विभिन्न स्थानों पर जाकर कूड़ा उठाते थे। चॉकलेट के कागज सर्वाधिक उठाए। सफाई पूरी होने के बाद वह जगह-जगह नीम के पेड़ लगाते थे। उनकी मेहनत आज रंग लाई। 
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यही नीम के पेड़ अब बड़े हो गए हैं। उनका नीम के पेड़ लगाने का उद्देश्य था, कैंपस में मच्छरों को कम करना। हरियाली के प्रति उनका प्रेम लगातार बढ़ता गया और कैंपस में रोज गार्डन, पाम गार्डन, बोगनबिलिया पार्क आदि बनाए। हरियाली कैंपस में वही लेकर आए। पीयू के उद्यान विभाग की भी आंखें उन्होंने ही खोली थी जो उनके साथ जुटे रहे। आजकल विभाग के जिम्मेदार सो रहे हैं। 

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हरियाली पर लिख रहे हैं किताबें

प्रो. सोबती का यह अभियान अभी जारी है। कैंपस में अपने खर्च से वह एक और पार्क का निर्माण करने जा रहे हैं। 65 साल की उम्र में उनका जोश कम नहीं हुआ। यही नहीं वह हिंदी में पर्यावरण से जुड़ी पुस्तकें भी लिख रहे हैं। उनके कामों को देखते हुए ही वह दो से तीन विश्वविद्यालयों में कुलपति रहे। 

कई अन्य बड़े पदों पर आसीन रहे। उन्होंन बताया कि बायोटेक्नोलॉजी विभाग के बाहर वह मिनी रोज गार्डन बना रहे हैं। जल्द इसका काम पूरा होगा। उन्होंने सीख देते हुए कहा कि जिस मिट्टी से बने हैं, उस मिट्टी के बनना सीखो। बोलने से नहीं, काम करने से हरियाली बढ़ेगी।

प्रो. एएस अहलूवालिया: हरियाली पर किए कई शोध
पीयू के पूर्व एसवीसी एवं इंटरनल यूनिवर्सिटी बारू साहिब हिमाचल प्रदेश के प्रो. वीसी प्रोफेसर एएस अहलूवालिया का नाम भी पर्यावरण प्रेमियों में गिना जाता है। उन्होंने शहर की हरियाली पर शोध किया। पेड़ों पर रोग लगने के कारणों से लेकर उनके इलाज पर काम किया। पीयू कैंपस में वह हर दिन सुबह उठकर पेड़ों का हाल जानने जाते हें। हरियाली को जहां नुकसान होता, उस पर अपनी बात भी रखते रहे है। 

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