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'पीजीआई चंडीगढ़ में पैसे कमाने नहीं, समाजसेवा के लिए आया हूं, इलाज करके संतुष्टि मिलती'
Thu, 12 Dec 2019 02:38 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 12 Dec 2019 02:38 PM IST
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डॉ. संतोष कुमार
- फोटो : अमर उजाला
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बिहार के एक छोटे जिले से आए पीजीआई के यूरोलाजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। डॉक्टरी की प्रारंभिक पढ़ाई उन्होंने जमशेदपुर से की। उसके बाद वे साल 1993 में पीजीआई आ गए। डॉ. संतोष कार्डियक सर्जन बनना चाहते थे, लेकिन उनका मन यूरोलाजी में लग गया। जूनियर रेजिडेंट से पीजीआई में उन्होंने अपना सफर शुरू किया।
साल 2000-2001 के बीच वे पीजीआई लखनऊ में भी रहे। उसके बाद चंडीगढ़ लौट आए और साल 2004 में पीजीआई की फैकल्टी बन गए। लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चंद्र बोस और स्वामी विवेकानंद को पढ़ने वाले डॉ. संतोष कुमार की खूबी है कि वे जितना अपने काम में माहिर हैं, उतना ही वे लोगों के बीच अपनी जगह बना लेते हैं। उनके नाम पर दस सर्जिकल इनोवेटिव टेक्निक्स भी हैं। आइये जानते हैं डॉ. संतोष कुमार के बारे में।
डाक्टर क्यों बनना चाहते थे?
मेरा बचपन बिहार के मधुबनी में बीता है। उस वक्त वहां डाक्टर नहीं होते थे। एक बार जब मेरी मां बीमार हुई तो उनके इलाज के लिए मैं रात भर भटकता रहा। घर से 40 किलोमीटर की दूरी में न तो कोई अस्पताल था और न ही डाक्टर। उस रात के संघर्ष ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। ऐसे कितने लोग उस वक्त भी और आज भी इलाज के लिए भटकते हैं। इस बात को समझा जा सकता है। उसके बाद डाक्टर की पढ़ाई की और ज्यादा से ज्यादा लोगों की सेवा का अपना मकसद बना लिया।
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साल 2000-2001 के बीच वे पीजीआई लखनऊ में भी रहे। उसके बाद चंडीगढ़ लौट आए और साल 2004 में पीजीआई की फैकल्टी बन गए। लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चंद्र बोस और स्वामी विवेकानंद को पढ़ने वाले डॉ. संतोष कुमार की खूबी है कि वे जितना अपने काम में माहिर हैं, उतना ही वे लोगों के बीच अपनी जगह बना लेते हैं। उनके नाम पर दस सर्जिकल इनोवेटिव टेक्निक्स भी हैं। आइये जानते हैं डॉ. संतोष कुमार के बारे में।
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डाक्टर क्यों बनना चाहते थे?
मेरा बचपन बिहार के मधुबनी में बीता है। उस वक्त वहां डाक्टर नहीं होते थे। एक बार जब मेरी मां बीमार हुई तो उनके इलाज के लिए मैं रात भर भटकता रहा। घर से 40 किलोमीटर की दूरी में न तो कोई अस्पताल था और न ही डाक्टर। उस रात के संघर्ष ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। ऐसे कितने लोग उस वक्त भी और आज भी इलाज के लिए भटकते हैं। इस बात को समझा जा सकता है। उसके बाद डाक्टर की पढ़ाई की और ज्यादा से ज्यादा लोगों की सेवा का अपना मकसद बना लिया।
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कुछ डाक्टर अक्सर पीजीआई में भीड़ का रोना रोते हैं? आप क्या सोचते हैं?
पीजीआई में डाक्टर पैसे के लिए नहीं, बल्कि समाज की सेवा के लिए आते हैं। पैसे कमाने के लिए तो बाहर भी जा सकते हैं। खुद मुझे भारत के विभिन्न अस्पतालों, यूके, जर्मनी, कनाडा से ऑफर हैं, लेकिन मेरा मन मरीजों के बीच बसता है। मरीज की संतुष्टि ही मेरी पूंजी है। भीड़ तो हर जगह। कहां नहीं? देखने वाली बात यह होती है कि जो आपको जिम्मेदारी दी गई है, उसका आप कैसे निर्वाह करते हैं।
चंडीगढ़ के बारे में क्या सोचते हैं?
यह एक पढ़ा-लिखा शहर है, लेकिन यहां के लोग न तो स्वास्थ्य के प्रति सचेत हैं और न ही पर्यावरण के प्रति। एक या दो फीसदी लोग हैं, जो अवेयर हैं और वही काम करते हैं। मीडिया भी अवेयरनेस नहीं फैलाती है। चंडीगढ़ में जाम की समस्या विकराल बनती जा रही है। अभी इस बारे में नहीं सोचे तो हालात आगे खराब हो सकते हैं।
पीजीआई में डाक्टर पैसे के लिए नहीं, बल्कि समाज की सेवा के लिए आते हैं। पैसे कमाने के लिए तो बाहर भी जा सकते हैं। खुद मुझे भारत के विभिन्न अस्पतालों, यूके, जर्मनी, कनाडा से ऑफर हैं, लेकिन मेरा मन मरीजों के बीच बसता है। मरीज की संतुष्टि ही मेरी पूंजी है। भीड़ तो हर जगह। कहां नहीं? देखने वाली बात यह होती है कि जो आपको जिम्मेदारी दी गई है, उसका आप कैसे निर्वाह करते हैं।
चंडीगढ़ के बारे में क्या सोचते हैं?
यह एक पढ़ा-लिखा शहर है, लेकिन यहां के लोग न तो स्वास्थ्य के प्रति सचेत हैं और न ही पर्यावरण के प्रति। एक या दो फीसदी लोग हैं, जो अवेयर हैं और वही काम करते हैं। मीडिया भी अवेयरनेस नहीं फैलाती है। चंडीगढ़ में जाम की समस्या विकराल बनती जा रही है। अभी इस बारे में नहीं सोचे तो हालात आगे खराब हो सकते हैं।
सेक्सोलॉजिस्ट कौन होते हैं?
चिकित्सा क्षेत्र में सेक्सोलॉजिस्ट नाम की कोई डिग्री नहीं होती है। सेक्सोलॉजिस्ट के नाम पर जो दुकानें चलती हैं, उसमें सिर्फ लोगों को ठगा जाता है। यूरोलॉजिस्ट ही सेक्स संबंधी समस्या को देखते हैं। यदि किसी को कोई दिक्कत आती है तो उसे यूरोलॉजिस्ट से ही मिलना चाहिए।
कभी आपका मन निराश होता हो
मैंने आपको बताया कि मरीज ही मेरे लिए सब कुछ हैं। जब वह दुखी होता है तो मेरा मन भी निराश होता है। खासकर जब वह इलाज के लिए भटकता है। इलाज का इंतजार मेरा भी दर्द बढ़ाता है।
लोगों को हेल्दी रहने का आपका मंत्र
रोजाना एक्सरसाइज, योगा और मेडिटेशन करें। धूप में कम से कम 25 मिनट का वक्त बिताएं। रेड मीट न खाएं। 50 साल की उम्र में एक बार प्रोस्टेट कैंसर की जांच जरूर करवाएं। समय पर पता चलने से खर्च बचता और जीवन स्तर सुधरा रहता है।
चिकित्सा क्षेत्र में सेक्सोलॉजिस्ट नाम की कोई डिग्री नहीं होती है। सेक्सोलॉजिस्ट के नाम पर जो दुकानें चलती हैं, उसमें सिर्फ लोगों को ठगा जाता है। यूरोलॉजिस्ट ही सेक्स संबंधी समस्या को देखते हैं। यदि किसी को कोई दिक्कत आती है तो उसे यूरोलॉजिस्ट से ही मिलना चाहिए।
कभी आपका मन निराश होता हो
मैंने आपको बताया कि मरीज ही मेरे लिए सब कुछ हैं। जब वह दुखी होता है तो मेरा मन भी निराश होता है। खासकर जब वह इलाज के लिए भटकता है। इलाज का इंतजार मेरा भी दर्द बढ़ाता है।
लोगों को हेल्दी रहने का आपका मंत्र
रोजाना एक्सरसाइज, योगा और मेडिटेशन करें। धूप में कम से कम 25 मिनट का वक्त बिताएं। रेड मीट न खाएं। 50 साल की उम्र में एक बार प्रोस्टेट कैंसर की जांच जरूर करवाएं। समय पर पता चलने से खर्च बचता और जीवन स्तर सुधरा रहता है।