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बोलने और सुनने में अक्षम...पर मंजिल कैसे पाएं, ये बात अर्चना से सीखें महिलाएं
संजीव पंगोत्रा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 24 May 2018 11:23 AM IST
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लेडी बाइकर अर्चना
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मजबूत इच्छा शक्ति हो तो वो भी हो सकता है, जो होने की उम्मीद भी न हो। कुछ ऐसी ही कहानी है बंगलूरू की रहने वाली अर्चना की। जो दस प्रतिशत कानों से सुन सकती है और बोलने में भी अक्षम हैं, लेकिन हौसला पूरा है। अर्चना के इशारों को समझाते हुए उनके एक दोस्त ने बताया कि वह मोटर बाइक पर सवार होकर बंगलूरू से लेह लद्दाख के सफर पर निकली हैं।
लेह से वापिस आते हुए वह बुधवार को चंडीगढ़ में कुछ देर के लिए रुकीं थीं। इस दौरान उन्होंने बताया कि अपनी बाइक यात्रा के जरिए यह मैसेज देना चाहती हैं कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं, खासकर दिव्यांग महिलाएं। अगर इतनी दूरी का सफर मैं कर सकती हूं तो एक आम महिला भी घर की चार दिवारी से निकल कर बहुत कुछ कर सकती है। ऐसा करते हुए उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। अर्चना पिछले कई दिनों से अपने इस सफर पर निकली हुई हैं।
यामहा से बुलेट तक की सवारी
33 वर्षीय अर्चना ने बताया कि वह पिछले 15 सालों से बाइक की सवारी कर रही है। कई साल पहले उनके दोस्त के पास यामहा मोटरसाइकिल था। एक दिन उसे चलाने का मन किया। दोस्त ने मना किया, लेकिन मैं नहीं मानी। कुछ दिनों के बाद उस मोटरसाइकिल को चलाने में पूरी तरह ट्रेंड हो गई। मेरे दोस्त ने यह मोटरसाइकिल मुझे गिफ्ट के तौर पर दे दी। इस पर छोटे मोटे टूर पर निकलने लगी। आज मेरे पास बुलेट मोटर साइकिल है और अपनी जिंदगी से सबसे लंबे टूर पर निकली हूं।
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बचपन से ड्रीम था बाइक चलाना
अर्चना कनार्टका में पली-बड़ी हैं। दसवीं करने के बाद फाइन आर्ट्स का डिप्लोमा किया और आज वह पेशे से आर्ट्स टीचर है। इन्होंने बताया कि बचपन से मेरा ड्रीम मोटर बाइक चलाना था। शारीरिक अक्षमता के कारण लोगाें को लगता था कि में इस सपने को सच नहीं कर पाऊंगी, लेकिन दृढ़ इच्छा शक्ति और कभी न हार मानने की मेरी जिद्द ने आज मुझे इस मुकाम तक पहुंचा दिया कि अकेले कई जगहों पर बाइक पर सफर कर सकती हूं।
अर्चना ने कहा कि बाइक यात्रा के दौरान कई तरह के चलैंज का सामना करना पड़ा, लेकिन अब धीरे-धीरे इन सब बातों की आदत सी हो गई है।
बंगलूरू से यात्रा शुरू करते हुए कई शहरों से गुजरते हुए लद्दाख पहुंची। अब लद्दाख से होते हुए चंडीगढ़ फिर दिल्ली और इसके बाद बंगलूरू जाकर यह सफर पूरा करेंगी।
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लेह से वापिस आते हुए वह बुधवार को चंडीगढ़ में कुछ देर के लिए रुकीं थीं। इस दौरान उन्होंने बताया कि अपनी बाइक यात्रा के जरिए यह मैसेज देना चाहती हैं कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं, खासकर दिव्यांग महिलाएं। अगर इतनी दूरी का सफर मैं कर सकती हूं तो एक आम महिला भी घर की चार दिवारी से निकल कर बहुत कुछ कर सकती है। ऐसा करते हुए उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा। अर्चना पिछले कई दिनों से अपने इस सफर पर निकली हुई हैं।
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यामहा से बुलेट तक की सवारी
33 वर्षीय अर्चना ने बताया कि वह पिछले 15 सालों से बाइक की सवारी कर रही है। कई साल पहले उनके दोस्त के पास यामहा मोटरसाइकिल था। एक दिन उसे चलाने का मन किया। दोस्त ने मना किया, लेकिन मैं नहीं मानी। कुछ दिनों के बाद उस मोटरसाइकिल को चलाने में पूरी तरह ट्रेंड हो गई। मेरे दोस्त ने यह मोटरसाइकिल मुझे गिफ्ट के तौर पर दे दी। इस पर छोटे मोटे टूर पर निकलने लगी। आज मेरे पास बुलेट मोटर साइकिल है और अपनी जिंदगी से सबसे लंबे टूर पर निकली हूं।
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बचपन से ड्रीम था बाइक चलाना
अर्चना कनार्टका में पली-बड़ी हैं। दसवीं करने के बाद फाइन आर्ट्स का डिप्लोमा किया और आज वह पेशे से आर्ट्स टीचर है। इन्होंने बताया कि बचपन से मेरा ड्रीम मोटर बाइक चलाना था। शारीरिक अक्षमता के कारण लोगाें को लगता था कि में इस सपने को सच नहीं कर पाऊंगी, लेकिन दृढ़ इच्छा शक्ति और कभी न हार मानने की मेरी जिद्द ने आज मुझे इस मुकाम तक पहुंचा दिया कि अकेले कई जगहों पर बाइक पर सफर कर सकती हूं।
अर्चना ने कहा कि बाइक यात्रा के दौरान कई तरह के चलैंज का सामना करना पड़ा, लेकिन अब धीरे-धीरे इन सब बातों की आदत सी हो गई है।
बंगलूरू से यात्रा शुरू करते हुए कई शहरों से गुजरते हुए लद्दाख पहुंची। अब लद्दाख से होते हुए चंडीगढ़ फिर दिल्ली और इसके बाद बंगलूरू जाकर यह सफर पूरा करेंगी।