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इस शख्स के लिए मेडिटेशन जैसे है बर्ड वाचिंग, कैमरे में कैद किए सैंकड़ों पक्षी
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 23 Jan 2017 05:03 PM IST
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मिलिए एक ऐसे अनोखे शख्स से, जिसके लिए बर्ड वाचिंग न सिर्फ एक जुनून है, बल्कि यह उनके लिए मेडिटेशन का काम करता है। इनका नाम है, सेक्टर-17 स्थित आईटी कंपनी ग्रेसल टेक्नोलाजी के मालिक मुनीष जौहर। हर समय उनका ध्यान मोबाइल पर ही रहता है। अक्सर रात के वक्त जब उनकी नींद टूटती है तो सीधे उनकी उंगलियां मोबाइल पर चली जाती हैं।
वह रात के वक्त भी चेक करते हैं कि कहीं उनके क्लाइंट ने कोई मेल तो नहीं भेजी है, लेकिन जब वह बर्ड वाचिंग करते हैं तो उनका ध्यान कोई नहीं भटका सकता। कई बार तो एक बर्ड के खूबसूरत रंगों को कैद करने में तीन से चार घंटे वक्त लग जाता है, लेकिन इस दौरान उनका ध्यान कभी भी मोबाइल पर नहीं जाता।
पिता के साथ लेक पर गए थे, तब से बढ़ा जुनून
मुनीष ने बताया कि उनके पिता तेज बंस सिंह जौहर का सेक्टर-17 में तेजी स्टूडियो है। करीब पांच साल पहले उनके पिता सुखना लेक पर फोटोग्राफी के लिए जा रहे थे, उस दौरान मुनीष भी उनके साथ चल पड़े। पिता का स्टूडियो होने के कारण फोटोग्राफी के बारे में थोड़ा-बहुत ज्ञान पहले से था। उसी दिन उन्होंने स्ट्राक बिल्ड किंगफिशर को अपने कैमरे में कैद किया।
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किंगफिशर की यह प्रजाति बहुत ही कम चंडीगढ़ में दिखाई देती है। जब उन्हें पता चला कि यह पक्षी सालों में एक या दो बार आता है तो उसके बारे में उन्होंने किताबों, इंटरनेट व विशेषज्ञों से खोजना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे जानकारी बढ़ती गई, मुनीष का बर्ड वाचिंग पर जुनून और रुझान बढ़ने लगा।
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वह रात के वक्त भी चेक करते हैं कि कहीं उनके क्लाइंट ने कोई मेल तो नहीं भेजी है, लेकिन जब वह बर्ड वाचिंग करते हैं तो उनका ध्यान कोई नहीं भटका सकता। कई बार तो एक बर्ड के खूबसूरत रंगों को कैद करने में तीन से चार घंटे वक्त लग जाता है, लेकिन इस दौरान उनका ध्यान कभी भी मोबाइल पर नहीं जाता।
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पिता के साथ लेक पर गए थे, तब से बढ़ा जुनून
मुनीष ने बताया कि उनके पिता तेज बंस सिंह जौहर का सेक्टर-17 में तेजी स्टूडियो है। करीब पांच साल पहले उनके पिता सुखना लेक पर फोटोग्राफी के लिए जा रहे थे, उस दौरान मुनीष भी उनके साथ चल पड़े। पिता का स्टूडियो होने के कारण फोटोग्राफी के बारे में थोड़ा-बहुत ज्ञान पहले से था। उसी दिन उन्होंने स्ट्राक बिल्ड किंगफिशर को अपने कैमरे में कैद किया।
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किंगफिशर की यह प्रजाति बहुत ही कम चंडीगढ़ में दिखाई देती है। जब उन्हें पता चला कि यह पक्षी सालों में एक या दो बार आता है तो उसके बारे में उन्होंने किताबों, इंटरनेट व विशेषज्ञों से खोजना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे जानकारी बढ़ती गई, मुनीष का बर्ड वाचिंग पर जुनून और रुझान बढ़ने लगा।
300 से ज्यादा प्रजातियों को जानते हैं
चिड़िया
मुनीष पर बर्ड वाचिंग का जुनून इस कदर चढ़ा है कि वह अब तक 300 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियों के बारे में जानते हैं। कई पक्षियों को वह आवाज से पहचानते हैं। कहीं भी जाते है तो उनकी नजरें आसमान और पेड़ों पर रहती है। कैमरा भी अक्सर साथ रहता है। जैसे ही मौका मिलता वह पक्षी को अपने कैमरे से उतार लेते हैं। इसके लिए अक्सर वह ट्राइसिटी और उसके बाहर भी जाते रहे हैं।
बच्चे भी बन गए संवेदनशील
बर्ड वाचिंग का न सिर्फ मुनीष के जीवन पर असर पड़ा है, बल्कि उनके बच्चों पर भी काफी पॉजीटिव असर पड़ा है। उनकी दो बेटियां हैं। एक बेटी 11 साल की और दूसरी आठ साल की। दोनों की नजर अक्सर पेड़ पर बैठी चिड़ियां पर चली जाती है। वह अक्सर अपने पापा को इसके बारे में जानकारी देती हैं। इस बारे में उन्होंने अपने स्कूल टीचर व बच्चों को भी बताया। अब फरवरी में उनके स्कूल का बैच माइग्रेटरी बर्ड्स को देखने लेक पर जाएगा। मुनीष ने बताया कि उनमें खुद विज्ञान, भूगोल, नेचर को पढ़ने की रुचि बढ़ी है। साथ ही पर्यावरण के प्रति संवदेनशीलता भी बढ़ी है।
दुर्लभ पक्षी को ढूंढा
मुनीष की काबलियत उन्हें दुर्लभ पक्षी को ढूंढने की ओर ले गई। पिछले साल उन्होंने स्मॉल निलतवा को खोजने में कामयाबी हासिल की। पिछले साल बर्ड रेस के दौरान मुनीष और टीम ने 150 से ज्यादा पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों को अपने कैमरे में कैद किया था। यह दर्शाता है कि उनमें बर्ड वाचिंग को लेकर कितना उत्साह है। फोटो खींचते वक्त वह काफी भारी-भरकम कैमरे का इस्तेमाल करते हैं। वह करीब दो लाख के कैमरे से फोटोग्राफी करते हैं।
बच्चे भी बन गए संवेदनशील
बर्ड वाचिंग का न सिर्फ मुनीष के जीवन पर असर पड़ा है, बल्कि उनके बच्चों पर भी काफी पॉजीटिव असर पड़ा है। उनकी दो बेटियां हैं। एक बेटी 11 साल की और दूसरी आठ साल की। दोनों की नजर अक्सर पेड़ पर बैठी चिड़ियां पर चली जाती है। वह अक्सर अपने पापा को इसके बारे में जानकारी देती हैं। इस बारे में उन्होंने अपने स्कूल टीचर व बच्चों को भी बताया। अब फरवरी में उनके स्कूल का बैच माइग्रेटरी बर्ड्स को देखने लेक पर जाएगा। मुनीष ने बताया कि उनमें खुद विज्ञान, भूगोल, नेचर को पढ़ने की रुचि बढ़ी है। साथ ही पर्यावरण के प्रति संवदेनशीलता भी बढ़ी है।
दुर्लभ पक्षी को ढूंढा
मुनीष की काबलियत उन्हें दुर्लभ पक्षी को ढूंढने की ओर ले गई। पिछले साल उन्होंने स्मॉल निलतवा को खोजने में कामयाबी हासिल की। पिछले साल बर्ड रेस के दौरान मुनीष और टीम ने 150 से ज्यादा पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों को अपने कैमरे में कैद किया था। यह दर्शाता है कि उनमें बर्ड वाचिंग को लेकर कितना उत्साह है। फोटो खींचते वक्त वह काफी भारी-भरकम कैमरे का इस्तेमाल करते हैं। वह करीब दो लाख के कैमरे से फोटोग्राफी करते हैं।