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18 साल से सेवा पर सैनिक, हर साल 2 माह ऐसा अनोखा काम, करोगे सलाम
धर्मेंद्र यादव/अमर उजाला, भिवानी
Updated Tue, 26 Jul 2016 09:39 AM IST
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हुनर का हीरो सूबेदार कर्मबीर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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बार्डर पर तो सैनिक देशसेवा करता ही है, यहां बात एक ऐसे सैनिक की हो रही है जो बीते 18 साल से ऐसी अनोखी सेवा कर रहा है, जानकर उसपर गर्व होगा। बात 1998 की है। राजपूत रेजिमेंट के सूबेदार कर्मबीर सिंह से ट्रेन यात्रा के दौरान मुसाफिरों की प्यास देखी नहीं गई और उसी क्षण तय कर लिया कि वह प्यासे राहगीरों के लिए पानी का इंतजाम करेंगे।
इस प्रण को 18 साल हो गए। वह हर साल मई और जून महीने में फौज से छुट्टी लेकर अपने गांव के बस स्टैंड पर प्याऊ चलाते हैं और चलते वाहन रुकवाकर पानी पिलाते हैं। इन 18 वर्षों में केवल एक साल ऐसा रहा जब वे फौज से छुट्टी पर नहीं आ सके। भिवानी-हांसी मार्ग स्थित जाटू लोहारी गांव के कर्मबीर फौजी बताते हैं कि वर्ष 1998 में वे ट्रेन से कहीं जा रहे थे। बोगी में बच्चों और बड़ों का प्यास से बुरा हाल देखा।
उन्होंने पीने को पानी दिया। उसी वक्त उनके दिमाग में आया कि यह समस्या हर जगह है। इसके लिए कुछ करना चाहिए। तभी तय कर लिया कि वह अपने गांव से गुजरने वाले राहगीरों को पानी पिलाएंगे। मई-जून के महीने में गांव के रविभान, धर्मपाल, नंदराम शास्त्री व रघुवीर के साथ मिलकर गांव के बस स्टैंड पर पांच मटके रखे और वाहनों को रुकवा कर जल सेवा आरंभ की। इसके बाद हर साल वह मई-जून में फौज से छुट्टी लेकर आते और राहगीरों को पानी पिलाते।
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दो महीने की छुट्टी के दौरान सुबह नौ बजे जल सेवा शुरू करते हैं। दोपहर में एक घंटे के लंच ब्रेक के बाद शाम छह बजे तक फिर पानी पिलाते हैं। यह सिलसिला 2013 में रिटायरमेंट के बाद भी जारी है। केवल एक बार 2001 में वह गांव नहीं आ सके। सेना में एथलेटिक कोच होने की वजह से उनकी ड्यूटी ट्रेनिंग में लग गई। फौज में बाबा नाम से जाने वाले कर्मबीर बताते हैं कि जब उनके सीनियर अधिकारियों को गांव में राहगीर जल सेवा के बारे में बताया गया तो अफसरों ने कभी मई-जून में छुट्टियों से नहीं रोका।
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इस प्रण को 18 साल हो गए। वह हर साल मई और जून महीने में फौज से छुट्टी लेकर अपने गांव के बस स्टैंड पर प्याऊ चलाते हैं और चलते वाहन रुकवाकर पानी पिलाते हैं। इन 18 वर्षों में केवल एक साल ऐसा रहा जब वे फौज से छुट्टी पर नहीं आ सके। भिवानी-हांसी मार्ग स्थित जाटू लोहारी गांव के कर्मबीर फौजी बताते हैं कि वर्ष 1998 में वे ट्रेन से कहीं जा रहे थे। बोगी में बच्चों और बड़ों का प्यास से बुरा हाल देखा।
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उन्होंने पीने को पानी दिया। उसी वक्त उनके दिमाग में आया कि यह समस्या हर जगह है। इसके लिए कुछ करना चाहिए। तभी तय कर लिया कि वह अपने गांव से गुजरने वाले राहगीरों को पानी पिलाएंगे। मई-जून के महीने में गांव के रविभान, धर्मपाल, नंदराम शास्त्री व रघुवीर के साथ मिलकर गांव के बस स्टैंड पर पांच मटके रखे और वाहनों को रुकवा कर जल सेवा आरंभ की। इसके बाद हर साल वह मई-जून में फौज से छुट्टी लेकर आते और राहगीरों को पानी पिलाते।
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दो महीने की छुट्टी के दौरान सुबह नौ बजे जल सेवा शुरू करते हैं। दोपहर में एक घंटे के लंच ब्रेक के बाद शाम छह बजे तक फिर पानी पिलाते हैं। यह सिलसिला 2013 में रिटायरमेंट के बाद भी जारी है। केवल एक बार 2001 में वह गांव नहीं आ सके। सेना में एथलेटिक कोच होने की वजह से उनकी ड्यूटी ट्रेनिंग में लग गई। फौज में बाबा नाम से जाने वाले कर्मबीर बताते हैं कि जब उनके सीनियर अधिकारियों को गांव में राहगीर जल सेवा के बारे में बताया गया तो अफसरों ने कभी मई-जून में छुट्टियों से नहीं रोका।
जल सेवा में महिलाएं भी हुई शामिल
हुनर का हीरो सूबेदार कर्मबीर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
करीब 18 साल पहले चार साथियों से शुरू की गई जल सेवा से अब बड़ी संख्या में महिला व पुरुष जुड़ गए हैं। महिलाओं की टोली पानी भरने से लेकर पिलाने तक के काम में बड़ी शिद्दत से जुड़ी है। कमला, मीना, सीमा, राममूर्ति के अलावा हवासिंह, बलबीर, राजू सिंह, मुकेश, भूतड़, नीरज, रवि, कल्लू, रवि तंवर आदि राहगीरों की प्यास बुझाते हैं।
आठ साल से चल रही है राहगीरों की रसोई
वर्ष 2008 में राहगीरों के लिए खाने की व्यवस्था भी शुरू की गई। इसके लिए गांव के हर घर से एक रोटी-एक रुपया योजना शुरू की गई। गांव से एक रोटी जितना आटा आने लगा और सब्जी-रोटी बनने लगी। वाहनों में यात्रा करने वाले मुसाफिरों को भोजन का पैकेट देने का प्रयास किया, लेकिन ज्यादातर मुसाफिरों ने रुचि नहीं दिखाई। इसलिए पैकेट सिस्टम बंद करना पड़ा। गांव के बस स्टैंड पर इस रसोई में राहगीर भोजन करते हैं। कर्मबीर फौजी ने बताया कि हर रोज 50 लोगों का खाना बनता है।
सेना भर्ती के लिए युवाओं को देते हैं फ्री ट्रेनिंग
वर्ष 2013 में रिटायर हुए कर्मबीर फौजी एक और अच्छा काम कर रहे हैं। कर्मबीर सिंह पिछले दो साल से युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। इस समय आसपास के गांवों से लगभग 50 युवा प्रशिक्षण ले रहे हैं। इनमें सात हिसार जिले के तलवंडी राणा गांव के युवा हैं। कर्मबीर सिंह ने बताया कि झोझू में हुई सेना भर्ती में उनके 12 युवा सिलेक्ट हुए।
आठ साल से चल रही है राहगीरों की रसोई
वर्ष 2008 में राहगीरों के लिए खाने की व्यवस्था भी शुरू की गई। इसके लिए गांव के हर घर से एक रोटी-एक रुपया योजना शुरू की गई। गांव से एक रोटी जितना आटा आने लगा और सब्जी-रोटी बनने लगी। वाहनों में यात्रा करने वाले मुसाफिरों को भोजन का पैकेट देने का प्रयास किया, लेकिन ज्यादातर मुसाफिरों ने रुचि नहीं दिखाई। इसलिए पैकेट सिस्टम बंद करना पड़ा। गांव के बस स्टैंड पर इस रसोई में राहगीर भोजन करते हैं। कर्मबीर फौजी ने बताया कि हर रोज 50 लोगों का खाना बनता है।
सेना भर्ती के लिए युवाओं को देते हैं फ्री ट्रेनिंग
वर्ष 2013 में रिटायर हुए कर्मबीर फौजी एक और अच्छा काम कर रहे हैं। कर्मबीर सिंह पिछले दो साल से युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। इस समय आसपास के गांवों से लगभग 50 युवा प्रशिक्षण ले रहे हैं। इनमें सात हिसार जिले के तलवंडी राणा गांव के युवा हैं। कर्मबीर सिंह ने बताया कि झोझू में हुई सेना भर्ती में उनके 12 युवा सिलेक्ट हुए।