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मिलिए एक और 'नेकचंद' से, कबाड़ से कागज उठाते हैं और जान डाल देते हैं

Wed, 10 Aug 2016 09:40 AM IST
शबनम/अमर उजाला, चंडीगढ़
शबनम/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Wed, 10 Aug 2016 09:40 AM IST
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another nekchand mohinder tuli, collects paper from garbage and give them life
चंडीगढ़ के दूसरे नेकचंद, नाम है इनका मोहिंद्र तुली - फोटो : फाइल फोटो
रॉक लेजेंड नेकचंद जैसे एक और कलाकार से मिलिए। ये कबाड़ से कागज इकट्ठा करते हैं और उनमें जान डाल देते हैं। बात हो रही है कोलाज मेकर मोहिंदर तुली की, जिन्होंने कोलॉज बनाने की कला कहीं से सीखी नहीं बल्कि अपनी कल्पना से नए प्रयोग कर इसको ग्रहण किया। आइए जानते हैं एक साधारण इंसान से प्रसिद्ध कोलॉज मेकर बनने वाले मोहिंद्र तुली की कहानी उन्हीं की जुबानी।
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सेक्टर 10 स्थित गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट में जब उनकी एडमिशन हुई तो देखा कि सभी स्टूडेंट पेंटिंग के दौरान प्रयोग में न आने वाले व्यर्थ कागज और चीजों को डस्टबिन में फेंक देते थे। रोजाना वह यही दृश्य देखते। ऐसा आभास होता कि उन सभी कागजों और चीजों में जान है और उनसे वह कुछ कह रहे हैं। एक कलाकार के हाथ से कागज को इस प्रकार डस्टबिन में फेंकना मुझे अंदर ही अंदर खाता रहता।
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एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद शाम को दोबारा स्कूल गए और डस्टबिन में पड़ी सभी व्यर्थ चीजों को घर ले आए। वह रोजाना ऐसा करते और स्टोर में उसे एकत्रित करते रहते। उन कागजों पर तारपीन ऑयल से पेंटिंग की होती थी, जिस कारण उससे दुर्गंध आती थी।
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मां ने कहा, बेकार सामान को यूज करो या वहीं फेंक आओ

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चंडीगढ़ के दूसरे नेकचंद, नाम है इनका मोहिंद्र तुली - फोटो : फाइल फोटो
एक दिन उनकी मां ने उनसे कहा कि या तो इस व्यर्थ का कहीं प्रयोग करो या फिर जहां से लेकर आए हो वहीं फेंक आओ। सौभाग्य से दो दिन बाद स्कूल में कुछ छुट्टियां पड़ गईं और एक दिन उस व्यर्थ को घर के आंगन में बिछा दिया।

उस समय न तो कोई कैनवस था और न ही फेविकोल। इसके बाद घर में पड़े एक संदूक को तोड़कर उस पर कपड़ा डालकर कैनवस तैयार किया और चित्रों को विभिन्न आकार और शेप्स में काटकर मैदे से तैयार किए गए लेप से कैनवस पर पेस्ट कर दिया।

उन्होंने 10 चित्र बनाकर उस पर रख दिए और करीब चार दिन उन्हें देखते रहे, लेकिन किसी और को दिखाने की उनकी हिम्मत न हुई। एक दिन हौसला कर स्कूल में उन पेंटिंग्स को लेकर चले गए। उस दिन क्लास शुरू होने से डेढ़ घंटा पहले वह कॉलेज पहुंचे और सभी पेंटिंग्स क्लास रूम में डिसप्ले कर दी। लेकिन स्टूडेंट्स और प्रोफेसरों को फेस करने की हिम्मत न थी।

वह पोट्रेट बनाने के बहाने से सुखना लेक पर चले गए। यह बात 1964 की है। जब 2 बजे कॉलेज आए तो देखा कि सभी उनकी पेंटिंग्स की तारीफ कर रहे थे। प्रिंसिपल से लेकर सभी प्रोफेसर ने मेरी पेंटिंग्स की तारीफ की।

1967 में मिल बेस्ट अवार्ड ऑफ द ईयर

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चंडीगढ़ के दूसरे नेकचंद, नाम है इनका मोहिंद्र तुली - फोटो : फाइल फोटो
1966 में विश्व प्रसिद्ध कलाकार प्रेम सिंह ने उन्हें आर्ट की एग्जिबिशन लगाने के लिए कहा और उन्होंने ही अमृतसर में आयोजित एक एग्जिबिशन में उनके आर्ट को भेजा। इस पर उन्हें इंडियन अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स अवार्ड से सम्मानित किया गया।

इसके बाद 1967 में इसी अकादमी की तरफ से बेस्ट अवॉर्ड ऑफ द ईयर यानी गवर्नर अवॉर्ड मिला। इतिहासकार वीएम गोस्वामी ने उनकी पेंटिंग्स को देखा और इसके बारे में लिखा। उन्होंने पेंटिंग को एक अन्य नाम कोलार से पुकारा। जिसे बाद में कोलॉज के नाम से पहचान मिली।

विभाजन के बाद करनाल में मिली जगह
- मोहिंद्र तुली का जन्म 1944 में पाकिस्तान के जिला शेखूपुरा के गांव गाजी के गाजियाना में हुआ था। विभाजन केबाद उन्हें भारत के पंजाब राज्य करनाल में रहने के लिए जगह दी गई। 1963 में उनका पूरा परिवार चंडीगढ़ आ गया।
करनाल की खूबसूरती ने जोड़ा आर्ट से
मोहिंद्र तुली ने बताया कि करनाल की खूबसूरती, वहां की दीवारें, गलियां और बाजार उन्हें हमेशा आकर्षित करतीं और उन्हें वह ख्यालों में ही उकेरते रहते। घर आकर कागज पर चित्र बनाते। कोलाज वर्क के साथ साथ मोहिंद्र तुली ने 1973 में कार्बन ड्राइंग की फील्ड में भी काम किया।
इन्होंने खरीदा तुली का वर्क
सेक्टर-10 स्थित गवर्नमेंट म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी के अलावा, पंजाब यूनिवर्सिटी म्यूजियम, होम साइंस कॉलेज चंडीगढ़ और पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना ने तुली का वर्क खरीदा। इसके अलावा यूके, यूएसए और जर्मन जैसे देशों के साथ-साथ कई देशों ने भी उनका वर्क खरीदा।
2004 में एफसीआई से सेवानिवृत्त हुए
पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ की ललित कला अकादमी से अवॉर्ड प्राप्त करने वाले मोहिंद्र तुली ने 1968 में एफसीआई में काम किया था और 2004 में वहां से सेवानिवृत्त हुए थे। उसके बाद फिर वह अपने आर्ट के साथ जुड़ गए और आज भी उसी पर काम कर रहे हैं। कोलॉज के साथ साथ तुली एक बेहतरीन लेखक भी हैं। अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटावली के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी।
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