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रंगमंच में अपने गुरु गुरशरण सिंह से मिले 100 रुपये अब तक संभालकर रखे हैं: अनीता शब्दीश

Fri, 14 Sep 2018 03:40 PM IST
रूबी सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रूबी सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Fri, 14 Sep 2018 03:40 PM IST
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Artist Anita Shabdeesh Success Story
अनीता शब्दीश
तीन साल की थी जब से पापा के साथ रंगमंच देखने जाती थी। 7वीं कक्षा में पंजाब के महान थियेटर निर्देशक गुरशरण सिंह ने मुझे पहला मौका दिया। 1993 में उनके प्रोडक्शन में बने नवां जन्म में अभिनय कर मानो मेरा ही नया जन्म हुआ हो। लेकिन इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उस दिन मेरी एक्टिंग से खुश होकर उन्होंने मुझे 100 रुपये नाटक की फीस दी। जो मेरे लिए एक इनाम के रूप में थी, जो अब तक मैंने संभाल कर रखे हैं।
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कुछ इन बातों से रंगमंच में कदम रखने वाली पंजाब की मशहूर थियेटर आर्टिस्ट अनीता शब्दीश ने अपने अनुभव साझा किए। उन्हाेंने बताया कि पंजाब में उस दौर में महिला आर्टिस्ट रंगमंच में आने से कतराती थीं। लेकिन उन्होंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया और पंजाब के हर कोने में गुरशरण सिंह के साथ प्ले किया। वे आज खुद फिल्म से ज्यादा थियेटर आर्टिस्ट कहलाना पसंद करती हैं। 1993 से शुरूआत करने वाली यह बेहतरीन अदाकारा वर्तमान समय में न केवल पंजाबी थियेटर को भारत में बल्कि कैनेडा, इंग्लैंड, अमेरिका एवं थाईलैंड सहित अन्य देशों में पहुंचा रहीं हैं।
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सुचेतक रंगमंच मोहाली की डायरेक्टर अनीता शब्दीश ने बताया कि वे अब तक एक हजार से अधिक स्टेज शो देश विदेश में कर चुकी हैं। वे पंजाबी फिल्मों में भी काम कर रही हैं। लेकिन उन्हें थियेटर करना बेहद पसंद है। उन्होंने बताया कि रंगमंच के जरिए ही उन्होंने एक मुकाम हासिल किया है। जिसको वे हर पल जीती हैं। अपने पिता के साथ मोहाली के ओपन थियेटर में रंगमंच से उन्होंने अपनी शुरूआत की और वे आज ट्राइसिटी के युवाओं को रंगमंच के गुर सिखा रही हैं।
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युवाओं को थियेटर करने से मिलता है मौका
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में एक्टिंग में जाने वाले युवा कलाकारों को थियेटर करना चाहिए, क्योंकि यह एक्टिंग में निखार लाता है। उन्होंने बताया कि रंगमंच को सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी बेहद पसंद किया जाता है। उनके पति लेखक शब्दीश ने बताया कि उनकी पत्नी उनके लिए हमेशा एक प्रेरणा रहीं हैं, जिन्होंने पंजाब में उस दौर में नाटक के जरिए सामाजिक संदेश दिए, जब रंगमंच पर आने से लड़कियां डरती थीं।
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