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Crude Oil Prices: कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर, रिपोर्ट में यह दावा

Sat, 17 May 2025 06:53 PM IST
नविता स्वरूप बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: नविता स्वरूप Updated Sat, 17 May 2025 06:53 PM IST
सार

वैश्विक अर्थव्यवस्था ट्रंप टैरिफ, भारत-पाकिस्तान तनाव, अमेरिका चीन टैरिफ मुद्दे पर पारस्परिक समझौता और यूक्रेन व रूस के शांति वार्तओं से जुड़ी खबरों  की वजह से काफी अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। बाजार के विशेषज्ञों का कहना है, यह स्थिति काफी अनिश्चितता पैदा कर रही है। जिसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है। हाल ही में क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिली।

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The fall in crude oil prices will have an impact on the global economy
कच्चे तेल की कीमतों में कमी। - फोटो : पीटीआई

विस्तार

वैश्विक अर्थव्यवस्था ट्रंप टैरिफ, भारत-पाकिस्तान तनाव, अमेरिका चीन टैरिफ मुद्दे पर पारस्परिक समझौता और यूक्रेन व रूस के शांति वार्तओं से जुड़ी खबरों की वजह से काफी अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। बाजार के विशेषज्ञों का कहना है, इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर भी बढ़ सकती है। हाल ही में क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली। यह फिलहाल 63-64 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल की रेंज में कारोबार कर रहा है और मांग के कारण इसके आउटलुक दबाव में हैं।

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श्रीराम ग्रुप की वेटूवेल्थ ब्रोकर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि हाल ही में अमेरिका-ईरान प्रतिबंध कम करने से दोनों देशों में व्यापार होने की संभावनाओं बढं गई हैं। इससे  ईरानी तेल निर्यात बढ़ने की भी उम्मीद है। इसकी वजह से अचानक अमेरिकी कच्चे तेल के भंडार में वृद्धि हुई । वहीं आईईए के संशोधित आपूर्ति पूर्वानुमान की वजह से कीमतों गिरावट आई है। भविष्य में मांग को लेकर आउटलुक दबाव में है। जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

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कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का क्या है कारण?

एंजेल वन लिमिटेड के नॉन एग्री कमोडिटी उत्पाद और करेंसी विश्लेषक प्रथमेश माल्या कहते हैं, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले सप्ताह अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। जिससे निवेशकों में अतिरिक्त आपूर्ति की चिंता बढ़ गई है। दूसरी ओर ईरान आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के बदले में अमेरिका के साथ एक समझौते पर सहमत होने के लिए तैयार है। इसे तहत वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति और मांग का संतुलन कम हो सकता है। प्रथमेश बताते हैं, हाल ही में पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन और उससे जुड़े उत्पादक को ओपेक+ के रूप में जाना जाता है। वे अपने उत्पाद की कटौती को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर रहे हैं और आपूर्ति बढ़ा रहे हैं। हालांकि ओपेक ने इस साल संयुक्त राज्य अमेरिका और व्यापक ओपेक समूह के बाहर अन्य उत्पादकों से तेल आपूर्ति में वृद्धि के अपने पूर्वानुमान को कम कर दिया है। बावजूद इसके भविष्य में अमेरिकी-ईरान परमाणु समझौते की उम्मीदों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने की संभावना अधिक है।

वैश्विक अर्थव्यस्था पर तेल की कीमतों में गिरावट का क्या असर?

एमके वेल्थ मैनजमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में अमेरिका की ट्रंप सरकार की ओर से लगाए गए जवाबी टैरिफ के चलते वैश्विक विकास और मांग में स्थिरता के सामने चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार चीन पारंपरिक रूप से कच्चे तेल का बड़ा खरीदार है। लेकिन चीन की जीडीपी ग्रोथ रेट 5 प्रतिशत नीचे गिरने के बाद, चीन तेल खरीदने से पीछे हटा है। वहीं इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर देशों का झुकाव भी बढ़ा है। जिसने तेल की मांग को कम किया है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का पूर्वानुमान था कि वैश्विक तेल आपूर्ति या तो स्थिर रहेगी या मामूली रूप से बढ़ेगी, जबकि मांग की कमी होगी। यह अनुमान आर्थिक गतिविधियों में मंदी के संकेत देते हैं। कच्चे तेल कीमतें यदि और गिरती हैं तो इसका असर नकारात्मक होगा।



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आईएफएससी एलएलपी इंवेस्टमेंट मैनेजर्स के फंड मैनेजर अर्थ भारत कहते हैं, पिछले 25 सालों से अमेरिका ने बजट घाटे को और व्यापार घाटे जैसी बड़ी समस्याओं को समय के साथ बढ़ने दिया है। यह समस्याएं राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भी थी। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में इन सभी मुद्दों को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। आमतौर पर यह समस्यांए 5 से 10 साल की अवधि में हल हो जाती हैं, लेकिन ट्रंप इसे दो साल में हल करना चाहते हैं। इसलिए चीन पर 145 प्रतिशत टैरिफ और भारत पर 26 प्रतिशत टैरिफ दर जैसे नीतिगत त्रुटियां भी हो रही हैं। फिलहाल दरों में राहत दी गई है, जिसके तहत चीन पर 30 प्रतिशत टैरिफ और भारत पर 10 प्रतिशत दर लागू है। इस तरह से लिए जा रहे फैसलों और नीतियों का उलटफेर जो समय-समय पर होता रहता है यह वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता पैदा करता है और इससे इस बात का खतरा भी पैदा होता कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था मंदी की ओर तो नहीं जा रही है।

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कमोडिटी ब्रोकर्स के अनुसार 17 मई 2025 को ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत  65.39 डॉलर प्रति बैरल रही और डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल की कीमत 62.49 डॉलर प्रति बैरल रही। रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ दीर्घकालिक शांति वार्ता में प्रगति का संकेत दिया है, जिससे कीमतों पर और दबाव पड़ा है। इसके अलावा कच्चे तेल भंडार में वृद्धि और आईईए के संशोधित आपूर्ति पूर्वानुमान में प्रति दिन 38,000 बैरल की वृद्धि  हुई जिसने नीचे की ओर दबाव डाला है।

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