बाजार की चाल: वैश्विक तनाव का भारत के बाजार पर क्या होगा असर? विशेषज्ञ बोले- निवेशकों को बनाना पड़ रहा संतुलन
इस हफ्ते कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक बॉन्ड बाजार में गिरावट जैसे दो बाहरी चिंताओं के दबाव की वजह से भारतीय शेयर बाजारों में अस्थिरता छाई रही और घरेलू निवेशकों की जोखिम लेने की प्रवृत्ति में काफी सतर्कता देखने को मिली। आइए इस बारे में हम विस्तार से जानते हैं।
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बीते हफ्ते कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक बॉन्ड बाजार में गिरावट जैसे दो बाहरी चिंताओं के दबाव की वजह से भारतीय शेयर बाजारों में अस्थिरता छाई रही और घरेलू निवेशकों की जोखिम लेने की प्रवृत्ति में काफी सतर्कता देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों का कहना है, अमेरिकी फेड अधिकारियों के बदलते रुख से भी बाजार के प्रतिभागियों को संकेत मिले। सप्ताह की शुरुआत में, जैक्सन होल में दिए गए आक्रामक रुख का बाजार पर गहरा प्रभाव पड़ा। हालांकि, सप्ताह के अंत तक, फेड गवर्नर की मुद्रास्फीति में कमी के शुरुआती संकेतों और ब्याज दरों को स्थिर रखने की इच्छा से कुछ राहत मिली, हालांकि सतर्कता का माहौल बना रहा। आनेवाले सप्ताह में वैश्विक मैक्रो-इकोनॉमिक और भू-राजनीतिक घटनाक्रम का प्रभाव बाजार पर पड़ने की संभावना है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल कैसे साबित हुई दोधारी तलवार?
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के हेड ऑफ रिसर्च विनोद नायर ने बताया, बाजार के प्रतिभागियों को भारत की मजबूत विकास गति और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के उम्मीद से बेहतर जीडीपी आंकड़ों ने घरेलू मांग की मजबूती की पुष्टि की, और यह अंतर बाजार के व्यापक दायरे में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। घरेलू बाजार पर केंद्रित और मजबूत आर्थिक विकास से जुड़े होने के कारण स्मॉल-कैप शेयरों में चुनिंदा रूप से नीचे से ऊपर की ओर खरीदारी हुई। उन्होंने कहा, घरेलू विकास की इसी मजबूती ने निजी बैंकों और रियल एस्टेट सेक्टर को भी ऊपर उठाया। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दोधारी तलवार साबित हुआ, क्योंकि इसने तेल और गैस क्षेत्र के शेयरों को मजबूत कीमतों के कारण लाभ पहुंचाया, जबकि ऑटो और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं जैसे लागत-संवेदनशील शेयरों को नुकसान पहुंचाया।
वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम का बाजार पर क्या हो सकता है असर?
सेबी रजिस्टर्ड रिसर्च एनालिस्ट फर्म एचएसटी वेल्थ के संस्थापक व सीईओ हरिसेल्वन राधाकृष्णन ने कहा, आने वाला सप्ताह में वैश्विक मैक्रो-इकोनॉमिक और भू-राजनीतिक घटनाक्रम का प्रभाव बाजार पर पड़ने की संभावना है, जो कैपिटल फ्लो और रिस्क लेने की क्षमता (रिस्क ऐपेटाइट) को तय करती रहती हैं। अमेरिका के हालिया रोजगार आंकड़ों के उम्मीद से बेहतर रहने और मजबूत इकोनॉमिक के संकेत के बाद, अब ध्यान अमेरिका के आने वाले महंगाई के आंकड़ों पर है। ये आंकड़े फेडरल रिजर्व की पॉलिसी और ग्लोबल मार्केट के सेंटीमेंट को तय करने में अहम साबित हो सकते हैं। ट्रेजरी यील्ड और ब्याज दरों की उम्मीदें महंगाई के हालात से जुड़ी रहेंगी, जबकि मिडिल ईस्ट में अनसुलझे टकराव के बीच तेल की ऊंची कीमतें मार्केट सेंटीमेंट पर लगातार दबाव बनाए रखेंगी
क्या फेड की टिप्पणियों और तेल की कीमतें तय करेंगी बाजार का मूड?
एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर ने कहा, इस हफ्ते ग्लोबल बाजार कुछ जानी-पहचानी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बाजार की चाल अमेरिकी की मॉनेटरी पॉलिसी (मौद्रिक नीति) को लेकर उम्मीदों, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया में बदलती भू-राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगी। शुक्रवार को आई अमेरिका की अगस्त महीने की मजबूत जॉब्स रिपोर्ट ने उस उम्मीद पर पानी फेर दिया जो सप्ताह के बीच में फेडरल रिजर्व के गवर्नर क्रिस्टोफर वॉलर के बयानों से जगी थी। वॉलर ने कहा था कि अगर महंगाई कम होती रहती है, तो ब्याज दरों को स्थिर रखा जा सकता है।
अमेरिका की महंगाई से जुड़ी रिपोर्ट पर क्यों टिकी हैं नजरें?
अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अगस्त में 1,62,000 नई नौकरियां जुड़ीं, जो लगभग 53,000 की उम्मीद से कहीं अधिक थीं और मार्च के बाद से सबसे बड़ी मासिक बढ़ोतरी थी, जबकि बेरोजगारी दर 4.1 प्रतिशत पर स्थिर रही। उम्मीद से अधिक मजबूत लेबर मार्केट ने इस उम्मीद को और मजबूत किया है कि फेडरल रिजर्व पॉलिसी को लंबे समय तक सख्त रख सकता है। बाजार अब इस महीने के आखिर में ब्याज दरें बढ़ने की संभावना को भी ध्यान में रख रहे हैं क्योंकि पॉलिसी बनाने वाले ऊंची महंगाई पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। अब सबकी नजरे अमेरिका की आने वाली महंगाई रिपोर्ट पर होंगी, जो फेड के पॉलिसी फैसले को तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
महंगाई का आंकड़ा उम्मीद से अधिक रहने पर सख्त मॉनेटरी पॉलिसी की उम्मीदें बढ़ सकती हैं, जिससे अमेरिकी ट्रेज़री यील्ड ऊंची बनी रह सकती है और उभरते बाजारों के शेयरों पर दबाव बना रह सकता है। इसके उलट, महंगाई का आंकड़ा कम रहने पर ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदें कम हो सकती हैं, बॉन्ड यील्ड में नरमी आ सकती है और ग्लोबल रिस्क एसेट्स को कुछ राहत मिल सकती है।
बाजार में उतार-चढ़ाव की क्या है वजह?
जानकारों और बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले सप्ताह उतार-चढ़ाव भरे दौर के बाद भारतीय इक्विटी बाजार कमजोर स्थिति में बंद हुआ। निफ्टी 50 में 1.15 प्रतिशत की गिरावट आई, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के ऊंचे स्तर ने निवेशकों के भावनाओं पर असर डाला। अमेरिका की 10-साल की ट्रेज़री यील्ड 4.78 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर बनी रही, जिससे वैश्विक वित्तीय हालात सख्त हुए और उभरते बाजारों (इमर्जिंग मार्केट्स) की इक्विटी की तुलनात्मक अपील कम हुई।