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Edible Oil Import: भारत का खाद्य तेल आयात बिल 1.75 लाख करोड़ रुपये पर पहुंचेगा, जानिए एसईए ने क्यों जताई चिंता

Wed, 22 Jul 2026 07:17 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Wed, 22 Jul 2026 07:17 PM IST
सार

भारत का खाद्य तेल आयात बिल 2025-26 में 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, जो नौ फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) ने रुपये की कमजोरी, कमजोर मानसून और वैश्विक चुनौतियों के कारण बढ़ती चिंता जताई है। देश को आयात पर निर्भरता कम करने के लिए तिलहन उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है।

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India's Edible Oil Import Bill to Hit ₹1.75 Lakh Crore: SEA Expresses Deep Concern
खाद्य तेलों का आयात। - फोटो : amarujala.com

विस्तार

भारत का खाद्य तेल आयात बिल 2025-26 विपणन वर्ष में नौ फीसदी बढ़कर 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन ने बढ़ते आयात, रुपये की कमजोरी और वैश्विक आपूर्ति दबाव को इसकी मुख्य वजह बताया है।

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एसईए ने चेतावनी दी है कि देश को तिलहन उत्पादन बढ़ाने की दिशा में तेजी से कदम उठाने होंगे। उत्पादन बढ़ाए बिना आयात पर निर्भरता कम नहीं होगी। खरीफ बुवाई में देरी और मौसम संबंधी जोखिम घरेलू उत्पादन पर असर डाल सकते हैं। इससे आने वाले महीनों में आयात का दबाव और बढ़ सकता है।
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एसईए के अध्यक्ष संजीव अस्थाना के अनुसार, पिछले वर्ष खाद्य तेल आयात बिल 1.61 लाख करोड़ रुपये था। यह इस साल 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। चालू तेल वर्ष के पहले आठ महीनों में आयात खर्च 1.19 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 99,000 करोड़ रुपये था। रुपये की कमजोरी ने आयात को और महंगा बना दिया है।

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आयात का बोझ क्यों बढ़ रहा है?

भारत का खाद्य तेल आयात लगातार बढ़ रहा है। रुपये की कमजोरी भी आयात को महंगा बना रही है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला में चुनौतियां भी एक प्रमुख कारण हैं। पिछले वर्ष के 1.61 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले इस साल 1.75 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। चालू तेल वर्ष के पहले आठ महीनों में ही 1.19 लाख करोड़ रुपये का आयात खर्च हो चुका है, जो पिछले साल की समान अवधि से काफी अधिक है।

कमजोर मानसून और वैश्विक घटनाक्रम क्या चुनौतियां ला रहे हैं?

संजीव अस्थाना ने बताया कि सामान्य से कम मानसून की आशंका है। इससे घरेलू तिलहन उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कई राज्यों में खरीफ तिलहन की बुवाई में भी देरी हुई है। अगस्त-सितंबर में कम बारिश की संभावना भी उत्पादन पर नकारात्मक असर डालेगी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंडोनेशिया का बढ़ता बायोडीजल कार्यक्रम खाद्य तेल की वैश्विक उपलब्धता को कम कर रहा है। भू-राजनीतिक तनाव और माल ढुलाई व बीमा लागत में वृद्धि भी वैश्विक खाद्य तेल कीमतों पर दबाव बना रही है।

तिलहन उत्पादन बढ़ाना क्यों जरूरी है?

एसईए के आंकड़ों के अनुसार, 17 जुलाई तक देश में खरीफ तिलहन की बुवाई 147 लाख हेक्टेयर रही। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के 155.7 लाख हेक्टेयर से कम है। यह दर्शाता है कि घरेलू उत्पादन में कमी आ सकती है। संगठन का मानना है कि यदि आने वाले हफ्तों में अच्छी बारिश होती है, तो बुवाई में तेजी आ सकती है। अस्थाना ने कहा कि भारत को आयात पर निर्भरता कम करने के लिए तिलहन उत्पादन बढ़ाना होगा। कृषि ढांचे को मजबूत करना भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से ही आयात बिल पर लगाम लगाई जा सकेगी।

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