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बॉन्ड में निवेश का लालच पड़ सकता है भारी:11-15% रिटर्न के पीछे कितना जोखिम? पैसा लगाने से पहले ये बातें जानें
Mon, 14 Sep 2026 04:06 AM IST
राकेश कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Mon, 14 Sep 2026 04:06 AM IST
सार
बॉन्ड को सुरक्षित निवेश मानकर आंख मूंदकर पैसा लगाना भारी पड़ सकता है। ज्यादा रिटर्न देने वाले बॉन्ड में क्रेडिट और डिफॉल्ट का जोखिम भी ज्यादा होता है। निवेश से पहले कंपनी की कमाई, कैश फ्लो, क्रेडिट रेटिंग, बॉन्ड की सुरक्षा, मैच्योरिटी और लिक्विडिटी जरूर जांचनी चाहिए। एक ही कंपनी में पूरा पैसा लगाने के बजाय अलग-अलग कंपनियों, सेक्टर और मैच्योरिटी में निवेश बांटना बेहतर रणनीति हो सकती है।
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निवेशक को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
बॉन्ड कोई डरावना निवेश नहीं है। सरकारी प्रतिभूतियों से लेकर उच्च गुणवत्ता वाले कॉरपोरेट बॉन्ड तक, डेट निवेश आपके पोर्टफोलियो को स्थिरता, तयशुदा आमदनी और विविधता दे सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि रिटर्न के साथ-साथ उससे जुड़े जोखिम को भी अच्छी तरह से समझा जाए...
भारतीय खुदरा निवेशक का स्वभाव गजब है। इक्विटी और वायदा-कारोबार में जब बाजार डराता है, तो वह सुरक्षित रिटर्न की तलाश में डेट मार्केट की ओर भागता है। लेकिन विडंबना देखिए, यहां भी वह बैंक एफडी के 7-7.5% के सुरक्षित रिटर्न से संतुष्ट नहीं है। उसे चाहिए 11, 13 या 15% का गारंटीड रिटर्न।
फिनटेक कंपनियों और ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म्स ने खुदरा निवेशकों की इसी लालसा को भांप लिया है। सेबी ने जैसे ही आम लोगों के लिए बॉन्ड में न्यूनतम निवेश की सीमा 1 लाख से घटाकर 10,000 रुपये की, बाजार में आक्रामक विज्ञापनों की बाढ़ आ गई। दावा किया जा रहा है कि 'एफडी से 500 बेसिस पॉइंट यानी 5 फीसदी ज्यादा कमाएं'। आंकड़े गवाही दे रहे हैं, खुदरा निवेशक आंख मूंदकर दलदल में उतर रहे हैं।
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आईएनआर बॉन्ड्स के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में हाई-यील्डिंग स्पेस (AA और उससे नीचे की रेटिंग वाले बॉन्ड) में रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 5.8% हो गई है, जो वित्त वर्ष 2023-24 (3.8%) के मुकाबले 50% से ज्यादा का उछाल है।
इसके उलट, सबसे सुरक्षित माने जाने वाले हाई-रेटेड (AAA) पेपर्स में रिटेल हिस्सेदारी गिरकर महज 0.2% रह गई। यानी कम रेटिंग वाले, जोखिम भरे जंक बॉन्ड्स में रिटेल का पैसा तेजी से झोंका जा रहा है। बॉन्ड कोई जादुई चिराग नहीं है, यह आपके द्वारा किसी कंपनी को दिया गया सीधा कर्ज है। अगर कोई कंपनी 14% पर आपसे पैसा ले रही है, तो सीधा मतलब है कि बैंकों ने उसे सस्ता कर्ज देने से मना कर दिया है।
निवेश से पहले समझें रेटिंग का गणित
जनवरी 2026 तक देश में आउटस्टैंडिंग कॉरपोरेट बॉन्ड्स का कुल आकार करीब 58.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इतना विशाल बाजार होने के बावजूद खुदरा निवेशक रेटिंग का असली अर्थ नहीं समझते। वे मानते हैं कि अगर किसी एजेंसी की मुहर लगी है, तो पैसा सुरक्षित है। क्रेडिट रेटिंग सिर्फ यह बताती है कि रेटिंग एजेंसी के हिसाब से कंपनी की कर्ज चुकाने की क्षमता कैसी है। रेटिंग जितनी नीचे, डिफॉल्ट का खतरा उतना ही ज्यादा।
बॉन्ड खरीदने से पहले रखें इन बातों का ध्यान
1. केवल नाम से प्रभावित न हों। कंपनी का मुख्य बिजनेस क्या है, कमाई कहां से आ रही है। प्रमोटर्स का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है?
2. मुनाफा कागजों पर हो सकता है, लेकिन बॉन्ड का ब्याज नकद से चुकाना पड़ता है। कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो देखें।
3. सिर्फ AA देखना काफी नहीं है। रेटिंग एजेंसी का रेशनल पढ़ें कि आउटलुक स्टेबल है या नेगेटिव।
4. कूपन रेट जितना ऊंचा होगा, कंपनी का जोखिम उतना ही गहरा होगा। 13% रिटर्न का मतलब है-जोखिम भी 13 गुना है।
5. बॉन्ड सिक्योर्ड है, या अनसिक्योर्ड? अगर सिक्योर्ड है तो किस संपत्ति पर पहला चार्ज है और डिबेंचर ट्रस्टी कौन है?
6. जिस पैसे की जरूरत 2 साल बाद है, उसे 7 साल मैच्योरिटी वाले बॉन्ड में सिर्फ 1% अतिरिक्त ब्याज के लालच में न फंसाएं।
7. क्या बॉन्ड पर्याप्त वॉल्यूम में ट्रेड होता है? जरूरत पड़ने पर क्या तुरंत खरीदार मिलेगा, या डिस्काउंट पर बेचना पड़ेगा?
8. कूपन रेट और वास्तविक रिटर्न में फर्क होता है। सेकेंडरी मार्केट से खरीदते वक्त बॉन्ड के प्रीमियम या डिस्काउंट प्राइस को समझें।
9. पूरा पैसा एक ही कंपनी के बॉन्ड में न झोंकें। अलग-अलग कंपनियों, सेक्टर्स और मैच्योरिटी में पूंजी बांटें।
10. इंफॉर्मेशन मेमोरेंडम और कोबेनेंट की शर्तें जरूर पढ़ें। यह भी सुनिश्चित करें कि प्लेटफॉर्म सेबी-पंजीकृत है या नहीं।
डिस्क्लेमर : इस लेख में छपे विचार, राय और निवेश संबंधी सुझाव अलग-अलग विशेषज्ञों, ब्रोकर फर्मों या रिसर्च संस्थानों के हैं। इनसे अखबार या उसके प्रबंधन की सहमति जरूरी नहीं है। कृपया किसी भी तरह का निवेश फैसला लेने से पहले अपने पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें। इस जानकारी के आधार पर होने वाले किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी अखबार या उसके प्रबंधन की नहीं होगी।
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भारतीय खुदरा निवेशक का स्वभाव गजब है। इक्विटी और वायदा-कारोबार में जब बाजार डराता है, तो वह सुरक्षित रिटर्न की तलाश में डेट मार्केट की ओर भागता है। लेकिन विडंबना देखिए, यहां भी वह बैंक एफडी के 7-7.5% के सुरक्षित रिटर्न से संतुष्ट नहीं है। उसे चाहिए 11, 13 या 15% का गारंटीड रिटर्न।
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फिनटेक कंपनियों और ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म्स ने खुदरा निवेशकों की इसी लालसा को भांप लिया है। सेबी ने जैसे ही आम लोगों के लिए बॉन्ड में न्यूनतम निवेश की सीमा 1 लाख से घटाकर 10,000 रुपये की, बाजार में आक्रामक विज्ञापनों की बाढ़ आ गई। दावा किया जा रहा है कि 'एफडी से 500 बेसिस पॉइंट यानी 5 फीसदी ज्यादा कमाएं'। आंकड़े गवाही दे रहे हैं, खुदरा निवेशक आंख मूंदकर दलदल में उतर रहे हैं।
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आईएनआर बॉन्ड्स के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में हाई-यील्डिंग स्पेस (AA और उससे नीचे की रेटिंग वाले बॉन्ड) में रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 5.8% हो गई है, जो वित्त वर्ष 2023-24 (3.8%) के मुकाबले 50% से ज्यादा का उछाल है।
इसके उलट, सबसे सुरक्षित माने जाने वाले हाई-रेटेड (AAA) पेपर्स में रिटेल हिस्सेदारी गिरकर महज 0.2% रह गई। यानी कम रेटिंग वाले, जोखिम भरे जंक बॉन्ड्स में रिटेल का पैसा तेजी से झोंका जा रहा है। बॉन्ड कोई जादुई चिराग नहीं है, यह आपके द्वारा किसी कंपनी को दिया गया सीधा कर्ज है। अगर कोई कंपनी 14% पर आपसे पैसा ले रही है, तो सीधा मतलब है कि बैंकों ने उसे सस्ता कर्ज देने से मना कर दिया है।
निवेश से पहले समझें रेटिंग का गणित
जनवरी 2026 तक देश में आउटस्टैंडिंग कॉरपोरेट बॉन्ड्स का कुल आकार करीब 58.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इतना विशाल बाजार होने के बावजूद खुदरा निवेशक रेटिंग का असली अर्थ नहीं समझते। वे मानते हैं कि अगर किसी एजेंसी की मुहर लगी है, तो पैसा सुरक्षित है। क्रेडिट रेटिंग सिर्फ यह बताती है कि रेटिंग एजेंसी के हिसाब से कंपनी की कर्ज चुकाने की क्षमता कैसी है। रेटिंग जितनी नीचे, डिफॉल्ट का खतरा उतना ही ज्यादा।
बॉन्ड खरीदने से पहले रखें इन बातों का ध्यान
1. केवल नाम से प्रभावित न हों। कंपनी का मुख्य बिजनेस क्या है, कमाई कहां से आ रही है। प्रमोटर्स का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है?
2. मुनाफा कागजों पर हो सकता है, लेकिन बॉन्ड का ब्याज नकद से चुकाना पड़ता है। कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो देखें।
3. सिर्फ AA देखना काफी नहीं है। रेटिंग एजेंसी का रेशनल पढ़ें कि आउटलुक स्टेबल है या नेगेटिव।
4. कूपन रेट जितना ऊंचा होगा, कंपनी का जोखिम उतना ही गहरा होगा। 13% रिटर्न का मतलब है-जोखिम भी 13 गुना है।
5. बॉन्ड सिक्योर्ड है, या अनसिक्योर्ड? अगर सिक्योर्ड है तो किस संपत्ति पर पहला चार्ज है और डिबेंचर ट्रस्टी कौन है?
6. जिस पैसे की जरूरत 2 साल बाद है, उसे 7 साल मैच्योरिटी वाले बॉन्ड में सिर्फ 1% अतिरिक्त ब्याज के लालच में न फंसाएं।
7. क्या बॉन्ड पर्याप्त वॉल्यूम में ट्रेड होता है? जरूरत पड़ने पर क्या तुरंत खरीदार मिलेगा, या डिस्काउंट पर बेचना पड़ेगा?
8. कूपन रेट और वास्तविक रिटर्न में फर्क होता है। सेकेंडरी मार्केट से खरीदते वक्त बॉन्ड के प्रीमियम या डिस्काउंट प्राइस को समझें।
9. पूरा पैसा एक ही कंपनी के बॉन्ड में न झोंकें। अलग-अलग कंपनियों, सेक्टर्स और मैच्योरिटी में पूंजी बांटें।
10. इंफॉर्मेशन मेमोरेंडम और कोबेनेंट की शर्तें जरूर पढ़ें। यह भी सुनिश्चित करें कि प्लेटफॉर्म सेबी-पंजीकृत है या नहीं।
| क्रेडिट रेटिंग | जोखिम का स्तर | 1 साल में डिफॉल्ट की औसत दर |
|---|---|---|
| AAA | सर्वोच्च सुरक्षा | 0.00% |
| AA | उच्च सुरक्षा | 0.05% |
| A | पर्याप्त सुरक्षा | 0.07% |
| BBB | मध्यम सुरक्षा (निवेश का न्यूनतम स्तर) | 0.46% |
| BB | सट्टा/जंक | 2.86% |
| B | उच्च डिफॉल्ट जोखिम | 8.40% |
डिस्क्लेमर : इस लेख में छपे विचार, राय और निवेश संबंधी सुझाव अलग-अलग विशेषज्ञों, ब्रोकर फर्मों या रिसर्च संस्थानों के हैं। इनसे अखबार या उसके प्रबंधन की सहमति जरूरी नहीं है। कृपया किसी भी तरह का निवेश फैसला लेने से पहले अपने पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें। इस जानकारी के आधार पर होने वाले किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी अखबार या उसके प्रबंधन की नहीं होगी।