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पैसा लौटाओ, फिर कर्ज उठाओ: रिवॉल्विंग क्रेडिट का ऐसा चक्र, जो कारोबार को संभाले भी और फंसा भी दे; समझें खेल
Mon, 14 Sep 2026 04:29 AM IST
द बोनस
शुभम शंखधर (संपादक, द बोनस)।
शुभम शंखधर (संपादक, द बोनस)।
Published by: द बोनस
Updated Mon, 14 Sep 2026 04:29 AM IST
सार
रिवॉल्विंग क्रेडिट कारोबार के लिए नकदी की जरूरत पूरी करने का उपयोगी साधन हो सकता है, लेकिन लगातार इस्तेमाल करने पर यह कर्ज का जाल भी बन सकता है। इसमें जरूरत के मुताबिक रकम निकालने और भुगतान के बाद सीमा दोबारा इस्तेमाल करने की सुविधा मिलती है। रिजर्व बैंक इसी वजह से कुछ एनबीएफसी उत्पादों को लेकर चिंतित है। उपलब्ध ऋण सीमा को आय समझना और सिर्फ न्यूनतम भुगतान करते रहना जोखिम बढ़ा सकता है।
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लोन लेते समय क्या बातें ध्यान रखें?
- फोटो : Amar Ujala AI
विस्तार
एक छोटे कारोबारी को आज कच्चा माल खरीदना है। मजदूरों की मजदूरी देनी है। बिजली का बिल भरना है। लेकिन जिस ग्राहक को उसने माल बेचा है, उसका भुगतान 60 दिन बाद आएगा। कारोबार घाटे में नहीं है। ऑर्डर भी हैं और मुनाफे की उम्मीद भी। समस्या सिर्फ इतनी है कि कमाई बाद में आएगी, लेकिन खर्च आज करना है। ऐसे कारोबारी को पांच साल के लिए 20 लाख रुपये का एकमुश्त कर्ज नहीं चाहिए। उसे चाहिए ऐसी सुविधा जिसमें जरूरत के समय पैसा मिले, भुगतान आने पर वह वापस हो जाए और अगली जरूरत के लिए वही सीमा फिर उपलब्ध हो जाए।
यही है रिवॉल्विंग क्रेडिट यानी घूमती ऋण सुविधा। लेकिन अब इसी सुविधा को लेकर रिजर्व बैंक ने चिंता जताई है। रिजर्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी के ऋण उत्पादों को लेकर एक मसौदा जारी किया है, जिसमें सामान्य एनबीएफसी को ऐसी घूमती ऋण-सुविधा देने पर रोक लगाने का प्रस्ताव है। सवाल यह है कि जो सुविधा एक कारोबारी के लिए सहारा बन सकती है, वही रिजर्व बैंक के लिए चिंता का कारण क्यों बन गई?
एक ही सुविधा, दो अलग कहानियां
रिवॉल्विंग क्रेडिट को समझने के लिए दो तस्वीरें देखनी होंगी। पहली तस्वीर एक कारोबारी की है-मान लीजिए किसी व्यापारी को 10 लाख रुपये की ऋण सीमा मिली। उसे इस महीने चार लाख रुपये की जरूरत पड़ी। उसने उतना पैसा इस्तेमाल किया। कुछ दिन बाद ग्राहक से भुगतान आया और उसने रकम वापस कर दी। अब वही सीमा फिर से उपलब्ध है। यह कारोबार के नकदी चक्र को चलाने वाली सुविधा है।
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दूसरी तस्वीर एक उपभोक्ता की है- मोबाइल पर संदेश आता है “आपके लिए 2 लाख रुपये की तत्काल ऋण सीमा उपलब्ध है।” जरूरत के समय पैसा मिल गया। अगले महीने वेतन आया तो कुछ रकम जमा कर दी। सीमा फिर खुल गई और कुछ समय बाद दोबारा इस्तेमाल हो गई। यहीं से खतरा शुरू होता है। क्योंकि कारोबारी के लिए यह सुविधा भविष्य की कमाई पैदा करने का माध्यम हो सकती है, लेकिन उपभोक्ता के लिए यही सुविधा कई बार भविष्य की आय को आज खर्च करने का रास्ता बन जाती है।
टर्म लोन से कैसे अलग है रिवॉल्विंग क्रेडिट?
टर्म लोन में पूरी रकम एक बार मिलती है। मूलधन, ब्याज और किस्त पहले से तय होती है। जैसे-जैसे भुगतान होता है, कर्ज खत्म होता जाता है।
रिवॉल्विंग क्रेडिट में एक सीमा तय होती है। ग्राहक पूरी सीमा या जरूरत के हिसाब से उसका कुछ हिस्सा इस्तेमाल करता है। ब्याज केवल इस्तेमाल की गई रकम पर लगता है और भुगतान के बाद उपलब्ध सीमा दोबारा खुल सकती है। यही लचीलापन इसे उपयोगी भी बनाता है और जोखिम भरा भी।
रिजर्व बैंक की असली चिंता क्या है?
रिजर्व बैंक का डर यह है कि कुछ मामलों में घूमता कर्ज वास्तविक भुगतान क्षमता को छिपा सकता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति की ऋण सीमा 5 लाख रुपये है। उसने पूरी रकम इस्तेमाल कर ली। हर महीने वह थोड़ा भुगतान करता है, जिससे सीमा दोबारा खुल जाती है। लेकिन मूलधन लंबे समय तक कम नहीं होता। बाहर से खाता चलता हुआ दिखता है, लेकिन अंदर ग्राहक लगातार कर्ज पर निर्भर बना रहता है। यही स्थिति वित्तीय भाषा में चिंता का कारण बनती है। बाहर से खाता चलता हुआ दिखता है, लेकिन अंदर ग्राहक लगातार कर्ज पर निर्भर बना रहता है
तो क्या रिवॉल्विंग क्रेडिट खराब है?
जवाब है-नहीं। समस्या उत्पाद में नहीं, इस्तेमाल के तरीके में है। अगर कोई कारोबारी इस सुविधा से कच्चा माल खरीदता है, उत्पादन बढ़ाता है और भुगतान आने पर रकम वापस करता है, तो यह उसके कारोबार की ताकत बनती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति रोजमर्रा के खर्च, पुराने कर्ज की किस्त या जीवनशैली बनाए रखने के लिए लगातार इसका इस्तेमाल करता है, तो यही सुविधा धीरे-धीरे कर्ज के जाल में बदल सकती है।
कर्ज के जाल से कैसे बचें?
सबसे पहला नियम है-उपलब्ध सीमा को अपनी आय न समझें।
दूसरा, अगर कई महीनों तक मूलधन कम नहीं हो रहा है, तो यह चेतावनी का संकेत है।
तीसरा, कारोबार और व्यक्तिगत खर्च के लिए लिए गए कर्ज को अलग रखें।
चौथा, केवल न्यूनतम भुगतान की आदत से बचें, क्योंकि इससे खाता चलता जरूर रहता है, लेकिन कर्ज खत्म नहीं होता।
डिस्क्लेमर : इस लेख में छपे विचार, राय और निवेश संबंधी सुझाव अलग-अलग विशेषज्ञों, ब्रोकर फर्मों या रिसर्च संस्थानों के हैं। इनसे अखबार या उसके प्रबंधन की सहमति जरूरी नहीं है। कृपया किसी भी तरह का निवेश फैसला लेने से पहले अपने पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें। इस जानकारी के आधार पर होने वाले किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी अखबार या उसके प्रबंधन की नहीं होगी।
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यही है रिवॉल्विंग क्रेडिट यानी घूमती ऋण सुविधा। लेकिन अब इसी सुविधा को लेकर रिजर्व बैंक ने चिंता जताई है। रिजर्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी के ऋण उत्पादों को लेकर एक मसौदा जारी किया है, जिसमें सामान्य एनबीएफसी को ऐसी घूमती ऋण-सुविधा देने पर रोक लगाने का प्रस्ताव है। सवाल यह है कि जो सुविधा एक कारोबारी के लिए सहारा बन सकती है, वही रिजर्व बैंक के लिए चिंता का कारण क्यों बन गई?
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एक ही सुविधा, दो अलग कहानियां
रिवॉल्विंग क्रेडिट को समझने के लिए दो तस्वीरें देखनी होंगी। पहली तस्वीर एक कारोबारी की है-मान लीजिए किसी व्यापारी को 10 लाख रुपये की ऋण सीमा मिली। उसे इस महीने चार लाख रुपये की जरूरत पड़ी। उसने उतना पैसा इस्तेमाल किया। कुछ दिन बाद ग्राहक से भुगतान आया और उसने रकम वापस कर दी। अब वही सीमा फिर से उपलब्ध है। यह कारोबार के नकदी चक्र को चलाने वाली सुविधा है।
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दूसरी तस्वीर एक उपभोक्ता की है- मोबाइल पर संदेश आता है “आपके लिए 2 लाख रुपये की तत्काल ऋण सीमा उपलब्ध है।” जरूरत के समय पैसा मिल गया। अगले महीने वेतन आया तो कुछ रकम जमा कर दी। सीमा फिर खुल गई और कुछ समय बाद दोबारा इस्तेमाल हो गई। यहीं से खतरा शुरू होता है। क्योंकि कारोबारी के लिए यह सुविधा भविष्य की कमाई पैदा करने का माध्यम हो सकती है, लेकिन उपभोक्ता के लिए यही सुविधा कई बार भविष्य की आय को आज खर्च करने का रास्ता बन जाती है।
टर्म लोन से कैसे अलग है रिवॉल्विंग क्रेडिट?
टर्म लोन में पूरी रकम एक बार मिलती है। मूलधन, ब्याज और किस्त पहले से तय होती है। जैसे-जैसे भुगतान होता है, कर्ज खत्म होता जाता है।
रिवॉल्विंग क्रेडिट में एक सीमा तय होती है। ग्राहक पूरी सीमा या जरूरत के हिसाब से उसका कुछ हिस्सा इस्तेमाल करता है। ब्याज केवल इस्तेमाल की गई रकम पर लगता है और भुगतान के बाद उपलब्ध सीमा दोबारा खुल सकती है। यही लचीलापन इसे उपयोगी भी बनाता है और जोखिम भरा भी।
रिजर्व बैंक की असली चिंता क्या है?
रिजर्व बैंक का डर यह है कि कुछ मामलों में घूमता कर्ज वास्तविक भुगतान क्षमता को छिपा सकता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति की ऋण सीमा 5 लाख रुपये है। उसने पूरी रकम इस्तेमाल कर ली। हर महीने वह थोड़ा भुगतान करता है, जिससे सीमा दोबारा खुल जाती है। लेकिन मूलधन लंबे समय तक कम नहीं होता। बाहर से खाता चलता हुआ दिखता है, लेकिन अंदर ग्राहक लगातार कर्ज पर निर्भर बना रहता है। यही स्थिति वित्तीय भाषा में चिंता का कारण बनती है। बाहर से खाता चलता हुआ दिखता है, लेकिन अंदर ग्राहक लगातार कर्ज पर निर्भर बना रहता है
तो क्या रिवॉल्विंग क्रेडिट खराब है?
जवाब है-नहीं। समस्या उत्पाद में नहीं, इस्तेमाल के तरीके में है। अगर कोई कारोबारी इस सुविधा से कच्चा माल खरीदता है, उत्पादन बढ़ाता है और भुगतान आने पर रकम वापस करता है, तो यह उसके कारोबार की ताकत बनती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति रोजमर्रा के खर्च, पुराने कर्ज की किस्त या जीवनशैली बनाए रखने के लिए लगातार इसका इस्तेमाल करता है, तो यही सुविधा धीरे-धीरे कर्ज के जाल में बदल सकती है।
कर्ज के जाल से कैसे बचें?
सबसे पहला नियम है-उपलब्ध सीमा को अपनी आय न समझें।
दूसरा, अगर कई महीनों तक मूलधन कम नहीं हो रहा है, तो यह चेतावनी का संकेत है।
तीसरा, कारोबार और व्यक्तिगत खर्च के लिए लिए गए कर्ज को अलग रखें।
चौथा, केवल न्यूनतम भुगतान की आदत से बचें, क्योंकि इससे खाता चलता जरूर रहता है, लेकिन कर्ज खत्म नहीं होता।
डिस्क्लेमर : इस लेख में छपे विचार, राय और निवेश संबंधी सुझाव अलग-अलग विशेषज्ञों, ब्रोकर फर्मों या रिसर्च संस्थानों के हैं। इनसे अखबार या उसके प्रबंधन की सहमति जरूरी नहीं है। कृपया किसी भी तरह का निवेश फैसला लेने से पहले अपने पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें। इस जानकारी के आधार पर होने वाले किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी अखबार या उसके प्रबंधन की नहीं होगी।