निवेश-बचत: तनावमुक्त जीवन के लिए कर्ज प्रबंधन के स्मार्ट तरीके, सिबिल स्कोर और इमरजेंसी फंड बनाए रखें
फैसला आपके ब्याज के बोझ को कम करने में मदद करता है, लेकिन याद रखें आपका लक्ष्य और कर्ज लेना नहीं होना चाहिए। बिना प्लानिंग के कर्ज लेना खतरनाक है। आज अपने कर्ज का समझदारी से प्रबंधन करें, ताकि जीवन कर्जमुक्त और तनावमुक्त हो सकें।
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विस्तार
आजकल हर परिवार होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और एजुकेशन लोन जैसे कर्ज लेता है। अर्थव्यवस्था के लिए ये कर्ज नए पैसे को सिस्टम में लाने का एक जरिया हैं। लेकिन, मध्यम वर्ग परिवारों के लिए इन कर्ज पर लगने वाला ब्याज उनकी आर्थिक स्थिति के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। आरबीआई फरवरी से अब तक रेपो दर में कुल एक फीसदी की कटौती कर चुका है। यह मौजूदा कर्जदारों के लिए बड़ी राहत है, बशर्ते बैंक इस फायदे को ग्राहकों तक पहुंचाएं। आइए समझते हैं कि ब्याज दरों में कमी के इस दौर में हम अपने कर्ज का प्रबंधन स्मार्ट तरीके से कैसे कर सकते हैं।
वेरिएबल इंटरेस्ट तो सस्ता होगा कर्ज
अगर आपका लोन वेरिएबल इंटरेस्ट रेट पर है, यानी ब्याज दर रेपो रेट के हिसाब से ऊपर-नीचे हो सकती है (जैसे होम लोन, एजुकेशन लोन), तो आपका कर्ज सस्ता हो सकता है। लेकिन, ज्यादातर मामलों में पर्सनल और कार लोन की ब्याज दरें कर्ज लेते समय फिक्स्ड होती हैं। यानी रेपो दर के बढ़ने-घटने का ब्याज दर पर कोई असर नहीं होता है।
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कर्ज प्रबंधन के गोल्डन नियम
- कर्ज तभी लें, जब वाकई जरूरत हो: घर या कार खरीदने के लिए कर्ज लेना ठीक है, लेकिन विदेश में छुट्टियां मनाने या आईफोन खरीदने के लिए पर्सनल लोन लेना सही नहीं है। ऐसी चीजों के लिए पहले से प्लान करें और हर महीने थोड़ी-थोड़ी बचत कर बाद में खर्च करें।
- सिबिल स्कोर बनाए रखें : अच्छा क्रेडिट स्कोर आसानी से कर्ज दिला सकता है और थोड़ी छूट भी मिल सकती है। इसलिए, अपने क्रेडिट स्कोर पर नजर रखें और भुगतान में चूक से बचें।
- कुल ईएमआई को मासिक आय के 40 फीसदी से कम रखें : इससे आप भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों के लिए निवेश कर पाएंगे और घरेलू खर्चों को बिना परेशानी के मैनेज कर सकेंगे।
- पुराने कर्ज चुकाने के लिए नया लोन न लें : जब तक नया लोन वाकई बड़ा फर्क न ला रहा हो, बार-बार लेंडर बदलने से बचें। इसके बजाय, एक लेंडर के साथ रहें और जितनी जल्दी हो सके, कर्ज चुकाएं।
- इमरजेंसी फंड बनाए रखें : हमेशा कम-से-कम 3 से 6 महीने का इमरजेंसी फंड रखें, जिसमें ईएमआई सहित मासिक खर्च शामिल हों। इस राशि का इस्तेमाल सिर्फ नौकरी छूटने या मेडिकल खर्च जैसी वास्तविक आपातकालीन स्थिति में करें।
पुराने कर्ज पर ऐसी होनी चाहिए रणनीति
अगर कर्ज वेरिएबल इंटरेस्ट रेट पर है, तो आपके पास दो विकल्प होते हैं। आपको ईएमआई की राशि कम करने या लोन की अवधि घटाने के बीच किसी एक को चुनना होता है। यह फैसला उलझन भरा होता है। लेकिन, अगर आप ईएमआई राशि कम करने की जगह लोन अवधि घटाने का विकल्प चुनते हैं, तो यह समझदारी भरा फैसला होता है, क्योंकि आप पहले से ही वह राशि हर महीने अपनी आय से चुका रहे थे। ईएमआई कम कराने से खास बचत नहीं होती।
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बैलेंस ट्रांसफर में इन बातों का रखें ध्यान
कई बैंक बैलेंस ट्रांसफर का विकल्प देते हैं। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखें। जैसे बैंक की सेवा अच्छी है या नहीं, बैंक शाखा घर के नजदीक हो, ऑनलाइन सुविधाएं उपलब्ध है या नहीं। सबसे अहम प्रोसेसिंग फीस, मोरगेज चार्जेस आदि कितने हैं। बैलेंस ट्रांसफर का फैसला लेते समय देखें कि सारे शुल्क जोड़ने के बाद यह फायदेमंद है या नहीं। इसे राधिका चोपड़ा के उदाहरण से समझते हैं।
- राधिका का होम लोन चल रहा है, जिसकी बकाया राशि 12.38 लाख रुपये है। इस पर वह 9 फीसदी ब्याज दर के साथ 19,800 रुपये की ईएमआई भर रही हैं। कर्ज अवधि 7 साल है।
- अब अगर वह दूसरे बैंक में बैलेंस ट्रांसफर करती हैं, जहां 8 फीसदी ब्याज दर है। इससे उन्हें 80,000 रुपये की ब्याज बचत हो सकती है। लेकिन, लोन ट्रांसफर के बजाय अगर वह मौजूदा ईएमआई को हर माह 1,500-2,000 रुपये बढ़ा दें, उन्हें 50-60 हजार की ब्याज बचत हो सकती है। इस प्रकार, अगर ब्याज दर में एक फीसदी से ज्यादा बचत हो रही हो और आपकी बकाया अवधि 7-10 साल से अधिक हो, तभी बैलेंस ट्रांसफर पर विचार करना चाहिए।
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