Market Decline: क्रूड की ऊंची कीमतें और विदेशी पूंजी का बाहर जाना पड़ रहा महंगा, जानें क्या विशेषज्ञों की राय
बाजार के विशेषज्ञों ने बाजार में गिरावट आने की वजहों बताई जिसमें कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, विदेशी पूंजी का बड़े पैमाने पर बाजार से निकाला जाना और देश के बड़े नीजि बैंकों में बिकवाली के साथ ही वैश्विक संकेतों से घरेलू धारणा को कोई खास समर्थन नहीं मिलने की वजह से बाजार का माहौल अब सतर्क बन रहा है। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में गिरावट देखने को मिली, जिसमें बेंचमार्क सूचकांक, सेंसेक्स और निफ्टी 50, दोनों में 1 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। सेंसेक्स 1,000 से अधिक अंक या 1.4 प्रतिशत गिरकर 73,709 के निचले स्तर पर आ गया, जबकि निफ्टी 50 300 से अधिक अंक या 1.3 प्रतिशत गिरकर 22,845 के दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया। बाजार के विशेषज्ञों ने बाजार में गिरावट आने की मुख्य तीन वजहों बताई जिसमें कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, विदेशी पूंजी का बड़े पैमाने पर बाजार से निकाला जाना और देश के बड़े नीजि बैंकों में बिकवाली रही।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का बाजार पर क्या असर?
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार ने कहा, कच्चे तेल की कीमतें 108 डॉलर प्रति बैरल के करीब हैं, जिससे बाजार की भावना पर असर पड़ रहा है। तेजी से बढ़ती कच्चे तेल कीमतों की वजह से मुद्रास्फीति बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकी फेडरल रिजर्व, बैंक ऑफ जापान और भारतीय रिजर्व बैंक सहित प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक सख्ती की जा रही है, और समग्र आर्थिक विकास और कॉर्पोरेट लाभप्रदता पर उच्च मुद्रास्फीति और उच्च ब्याज दरों के प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
होर्मुज में तनाव बढ़ने और उसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में उछाल बाजार के लिए एक बड़ा झटका है। हालांकि लार्ज-कैप शेयरों के आकर्षक मूल्यांकन और रुपये की मजबूती ने एफआईआई (वित्तीय निवेशक) के भारत के प्रति रुख को थोड़ा सकारात्मक बना दिया है, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को देखते हुए यह सकारात्मकता लंबे समय तक बनी रहने की संभावना नहीं है
विदेशी पूंजी का बड़े पैमाने पर निकाला जाना कितना अहम?
विदेशी पूंजी का बड़े पैमाने पर बहिर्वाह बाजार के मनोबल को कम रखने वाला एक प्रमुख कारक बना हुआ है। एनएसडीएल के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अक्टूबर में अब तक 52,100 करोड़ रुपये के भारतीय शेयर बेचे हैं, जबकि 2026 में अब तक उन्होंने 3,12,402 करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं।
निजी बैंकों के शेयरों में गिरावट का क्या असर?
एचएसटी वेल्थ के संस्थापक और सीईओ हरिसेल्वन राधाकृष्णन कहते हैं, तीसरी तिमाही के नतीजों के बाद बड़े निजी बैंकिंग शेयरों में भारी गिरावट आई , जिससे बाजार का माहौल खराब हो गया। एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक और यस बैंक जैसे शेयरों में 5 प्रतिशत तक की गिरावट आई, जिसके चलते इनका क्षेत्रीय सूचकांक निफ्टी प्राइवेट बैंक 2 प्रतिशत और निफ्टी बैंक सूचकांक 1 प्रतिशत नीचे गिर गया। घरेलू स्तर पर मुख्य ट्रिगर वीकेंड में आए बैंकों के नतीजों पर बाजार की प्रतिक्रिया रही। मुनाफे में कुल बढ़ोतरी के बावजूद, निवेशकों का ध्यान मार्जिन पर दबाव, बढ़ती ऑपरेटिंग कॉस्ट और कमजोर ट्रेजरी इनकम पर रहा। हाल ही में आई जोरदार तेजी के बाद आईटी शेयरों में भी गिरावट आई; अमेरिकी टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर शेयरों में कमजोरी को देखते हुए ट्रेडर्स ने मुनाफावसूली (प्रॉफिट बुकिंग) की। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में, तो यह मजबूत नजर आता है।
क्या वैश्विक संकेतों का बाजार को नहीं मिल रहा कोई लाभ?
एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर ने कहा, वैश्विक संकेतों से घरेलू धारणा को कोई खास समर्थन नहीं मिला। वॉल स्ट्रीट पर शुक्रवार को हुई गिरावट के बाद एशियाई बाजारों में मिला-जुला कारोबार देखने को मिला; वहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में निवेश के स्तर को लेकर चिंताएं बनी रहीं, जिसका असर निवेशकों के जोखिम लेने के रुझान पर पड़ा। लगातार जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने बाजार में सतर्कता का माहौल और बढ़ा दिया है, जिससे निवेशकों का ध्यान कंपनियों की कमाई के अनुमान और व्यापक मैक्रोइकॉनॉमिक जोखिमों पर केंद्रित हो रहा है।