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Hindi News ›   Business ›   Business Diary ›   200 Years of Hindi Journalism: From 'Udant Martand' to a Modern Media Empire

बैलगाड़ी के सफर से एआई न्यूजरूम तक: 200 साल में कैसे 25 करोड़ पाठकों तक फैला हिंदी पत्रकारिता का दायरा? समझें

Sat, 30 May 2026 07:04 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Sat, 30 May 2026 07:04 PM IST
सार

30 मई 1826 को शुरू हुए 'उदन्त मार्त्तण्ड' से लेकर 2026 के डिजिटल युग तक, हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के आर्थिक संघर्ष और सफलता की पूरी कहानी आसान भाषा में पढ़ें।

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200 Years of Hindi Journalism: From 'Udant Martand' to a Modern Media Empire
हिंदी पत्रकारिता - फोटो : amarujala.com

विस्तार

कल्पना कीजिए एक ऐसे दौर की जब खबरें छापना किसी जोखिम भरे स्टार्टअप से कम नहीं था। न कोई इंटरनेट था, न 5G नेटवर्क, और न ही करोड़ों रुपये का विज्ञापन बजट। आज से ठीक 200 साल पहले, 30 मई 1826 को कलकत्ता की संकरी गलियों से भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना घटी। इसी दिन हिंदी का पहला समाचारपत्र 'उदन्त मार्त्तण्ड' (यानी उगता हुआ सूर्य) छपकर बाजार में आया था। 

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साल 2026 में, इस ऐतिहासिक घटना को पूरे 200 वर्ष हो चुके हैं। यह महज 200 वर्षों का कैलेंडर नहीं है, बल्कि एक ऐसे सफर की महागाथा है जिसमें एक औपनिवेशिक समाज का एक छोटा सा अखबार आज अरबों डॉलर मीडिया उद्योग में तब्दील हो चुका है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि कैसे एक ऐसा अखबार जिसे कभी 500 पक्के ग्राहक नहीं मिले, आज 25 करोड़ से अधिक पाठकों तक रोजाना खबरें पहुंचाने वाली इंडस्ट्री की नींव बन गया।

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'उदन्त मार्त्तण्ड' की वह ऐतिहासिक और साहसिक शुरुआत

19वीं सदी की शुरुआत में भारत में प्रिंटिंग उद्योग अपने शुरुआती चरण में था। कलकत्ता (अब कोलकाता) में अंग्रेजी, बंगाली और फारसी के अखबार तो थे, लेकिन हिंदी (देवनागरी लिपि) का कोई अखबार नहीं था। ऐसे में उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने एक बड़ा कदम उठाया। पेशे से वकील और कलकत्ता की सदर दीवानी अदालत में 'प्रोसीडिंग्स रीडर' के पद पर काम करने वाले शुक्ल जी ने 16 फरवरी 1826 को अखबार का लाइसेंस लिया। 

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30 मई 1826 को कलकत्ता के अमर तल्ला लेन से 'उदन्त मार्त्तण्ड' का पहला अंक निकला। यह एक साप्ताहिक पत्र था जो हर मंगलवार को छपता था और इसकी भाषा खड़ी बोली और ब्रजभाषा का मिश्रण थी। उस समय टाइपसेटिंग का काम पूरी तरह से हाथों से होता था; लेड (सीसे) के एक-एक अक्षर को जोड़कर शब्द बनाए जाते थे, जिसमें बहुत मेहनत और समय लगता था। 

सिर्फ 18 महीने में क्यों बंद हो गया भारत का पहला हिंदी अखबार?

आज के दौर में मीडिया कंपनियों के पास भले ही तमाम साधन मौजूद हों, लेकिन 'उदन्त मार्त्तण्ड' का रेवेन्यू मॉडल सिर्फ सब्सक्रिप्शन पर टिका था। इस अखबार की सालाना कीमत दो रुपये तय की गई थी। कलकत्ता में हिंदी पढ़ने वाले कम थे, इसलिए इसे उत्तर भारत भेजना जरूरी था। 

यहीं से शुरू हुआ असली आर्थिक संघर्ष। उस समय अखबार भेजने का साधन बैलगाड़ी, नाव या ब्रिटिश डाक सेवा थी। ब्रिटिश डाक विभाग का शुल्क इतना ज्यादा था कि अखबार की लागत उसकी कीमत से भी ऊपर चली जाती थी। पंडित जुगल किशोर ने तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड एमहर्स्ट से डाक दरों में छूट की अपील की, लेकिन साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार ने इसे खारिज कर दिया। 

लगातार बढ़ते घाटे और विज्ञापन न होने के कारण अंततः 4 दिसंबर 1827 को महज 18 महीने बाद यह अखबार बंद हो गया। अपने अंतिम अंक में संपादक ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में लिखा था-  'आज दिवस लौ उग चुक्यो मार्तण्ड उदन्त। अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त॥' (यानी समाचारों का यह सूर्य अब आर्थिक कठिनाइयों के कारण अस्त हो रहा है)।

आजादी की लड़ाई से लेकर स्वर्णिम युग तक का सफर

भले ही पहला अखबार बंद हो गया, लेकिन उसने जो बीज बोया वह एक वटवृक्ष बन गया। इसके बाद 1845 में बनारस अखबार छपा और 1854 में भारत का पहला हिंदी दैनिक समाचारपत्र 'समाचार सुधा वर्षण' सामने आया। 

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पत्रकारिता सिर्फ समाचार देने का जरिया नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक सुधार और आजादी का हथियार बन गई थी। बाल गंगाधर तिलक का 'केसरी', गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' और महात्मा गांधी का 'यंग इंडिया' इसके बड़े उदाहरण रहे। आजादी के बाद 1980 और 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण, साक्षरता बढ़ने और नई प्रिंटिंग तकनीक (ऑफसेट) के आने से हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या लाखों से करोड़ों में पहुंच गई, जिसे प्रिंट मीडिया का 'स्वर्णिम युग' कहा गया। 2000 के दशक में 24x7 टीवी न्यूज चैनलों ने 'ब्रेकिंग न्यूज' का नया दौर शुरू किया।

आज का मीडिया साम्राज्य कितना बड़ा?

2026 के ताज़ा आंकड़ों पर नजर डालें तो आप हैरान रह जाएंगे। फिक्की-ईवाई (FICCI-EY) की नवीनतम रिपोर्ट 2026 के अनुसार:

  • विशाल उद्योग: भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग का आकार 2.78 लाख करोड़ रुपये (लगभग 32 बिलियन डॉलर) हो गया है। सरकार की ओर से जारी प्रेस इन इंडिया रिपोर्ट 2023-24 के अनुसार रोजाना करीब 23,22,92,405 अखबार लोगों तक पहुंचते हैं। मौजूदा समय में यह संख्या 25 करोड़ से ऊपर जाने का अनुमान है।
  • तेज ग्रोथ: यह उद्योग 9.1% की दर से बढ़ रहा है, जो कि भारत की 7.7% की नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर से भी ज्यादा है। 

भारत एक अद्भुत 'AND' मार्केट है!

दुनिया के पश्चिमी देशों में डिजिटल मीडिया के आने से अखबार खत्म हो रहे हैं, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। फिक्की-ईवाई रिपोर्ट और उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार भारत एक 'AND' (और) मार्केट बन गया है। इसका मतलब है कि भारतीय उपभोक्ता टीवी पर समाचार देखता है 'और' साथ ही मोबाइल पर डिजिटल न्यूज भी पढ़ता है। टीवी, प्रिंट और डिजिटल यहां एक साथ सह-अस्तित्व  में हैं।

1826 बनाम 2026: बैलगाड़ी से एआई तक का फासला

200 वर्ष के इस बदलाव को अगर हम दो हिस्सों में बांटें तो तस्वीर एकदम साफ हो जाती है:

  • वितरण और पहुंच: 1826 में अखबार बैलगाड़ी और डाक विभाग के भरोसे था, जिसकी सिर्फ 500 कॉपियां छपती थीं। आज 2026 में सोशल मीडिया, एप्ड और क्लाउड होस्टिंग के जरिए खबरें रियल-टाइम (तत्काल) करोड़ों लोगों तक पहुंचती हैं। 
  • लागत: 1826 में स्याही, कागज और डाक की लागत बहुत अधिक थी, जबकि आज इंटरनेट के कारण डिजिटल वितरण की लागत बहुत हद तक नियंत्रण में है। 
  • तकनीक: तब हाथों से लेड के अक्षर जोड़े जाते थे, आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा और एल्गोरिदम न्यूज रूम चला रहे हैं।

फेक न्यूज और विश्वसनीयता की जंग

2026 में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती ब्रिटिश हुकूमत का सेंसरशिप या पैसों की कमी नहीं है, बल्कि 'सूचना का प्रदूषण' है। आज डीपफेक, एआई-जनित भ्रामक लेख और फेक न्यूज सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। 

विशेषज्ञों का मानना है कि फेक न्यूज के इस दौर में प्रिंट मीडिया सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज का माध्यम नहीं रहेगा, बल्कि यह एक उच्च-पहुंच, उच्च-प्रभाव वाले विश्वसनीयता मंच में बदल जाएगा। जानकार कहते हैं कि आज भी छपे हुए शब्दों पर लोगों का भरोसा डिजिटल स्क्रीन के पिक्सल से कहीं ज्यादा है।

1826 में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता में जो छोटा सा पौधा लगाया था, आज वह डिजिटल तकनीक और डेटा-मुद्रीकरण के बल पर एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। लेकिन, तकनीक चाहे जितनी बदल जाए, पत्रकारिता का असली मकसद समाज का कल्याण और सत्य की खोज ही रहेगा, जैसा कि महात्मा गांधी और गणेश शंकर विद्यार्थी ने सिखाया था। आज का मीडिया उद्योग अपने इस 'स्वर्णिम युग' को तभी सार्थक ठहरा सकता है, जब वह इस आर्थिक कामयाबी के साथ-साथ अपनी संपादकीय अखंडता और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी को भी उसी मजबूती से कायम रख सके।

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