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जानिए कैसे कार बाजार ने बदल दी एक लड़की की जिंदगी?

Tue, 25 Oct 2016 12:20 PM IST
योगिता लिमये और सुरंजना तिवारी/ बीबीसी न्यूज़
योगिता लिमये और सुरंजना तिवारी/ बीबीसी न्यूज़ Updated Tue, 25 Oct 2016 12:20 PM IST
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Here's how the car market has changed a girl's life
- फोटो : bbc

रात के वक़्त सुजीता राजेंद्रबाबू अपने तंग रसोईघर में खाना बनाने में अपनी मां की मदद करती हैं। दिन के वक़्त वो एक सहायक इंजीनियर के तौर पर एक कार फैक्ट्री में काम करती हैं जहां वो दस लोगों की एक टीम का नेतृत्व करती हैं।

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वो जिस कार फैक्ट्री में काम करती हैं वो रेनॉ-निसान एलायंस व्हीकल के लिए कार के कल-पुर्जे तैयार करती है। सुजीता की कहानी भारत में रहने वाले उन सैकड़ों लोगों की कहानी है। वो दक्षिण भारत के एक पिछड़े हुए गांव से चेन्नई आईं और यहां आकर उनकी ज़िंदगी बदल गई। वो कहती हैं, "मैं एक छोटे से गांव किझातुर की रहने वाली हूं।
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वहां तो लोगों के पास कहीं आने-जाने के लिए गाड़ी की सुविधा तक नहीं है। चूंकि मैं ऐसे हालात में पली-बढ़ी हूं तो मुझे पता था कि मुझे पढ़ना-लिखना था और नौकरी पानी थी।" हालांकि इसके लिए उन्हें अपने परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाना पड़ा। उनके परिवार वाले उनकी शादी कर उनका घर बसाना चाहते थे।

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'शायद तब मैं गांव में खेतों में छोटा-मोटा काम कर रही होती'

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सुजीता ने डिप्लोमा की डिग्री ले रखी थी और जब पांच साल पहले रेनॉ-निसान ने जूनियर इंजीनियर के पद के लिए विज्ञापन दिया तो उन्होंने यह मौका हाथ से जाने नहीं दिया। उनका कहना है, "अगर मैंने इस फैक्ट्री में काम नहीं किया होता तो मैं आज जो हूं उसकी कल्पना भी नहीं कर सकती हूं। शायद तब मैं गांव में खेतों में छोटा-मोटा काम कर रही होती।"

निसान और रेनॉ दो अंतरराष्ट्रीय कंपनियां हैं। चेन्नई के बाहरी इलाके में दस सालों से इनकी वर्कशॉप चल रही है। आज इस इलाके को 'एशिया का डीट्रॉयट' कहा जाता है। डीट्रॉयट अमरीका का वो शहर है जो बड़े पैमाने पर कार उत्पादन करने के लिए दुनिया भर में मशहूर था।

चेन्नई का यह इलाका कार बनाने के हब के रूप में जाना जाता है

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चेन्नई का यह इलाका कार बनाने के हब के रूप में जाना जाता है। यहां निर्यात और घरेलू बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर कार का उत्पादन किया जाता है। भारत में करीब दो करोड़ 40 लाख कार एक साल में तैयार होते हैं। इसका पांचवा हिस्सा तमिलनाडु के इस इलाके में तैयार होता है।

रेनॉ-निसान के मैनेजिंग डायरेक्टर कॉलिन मैकडोनल्ड कहते हैं, "राज्य में हमने दूसरे कार निर्माताओं के प्लांट भी देखे हैं और इससे हमें तमिलनाडु में स्थानीय लोगों को अपनी ओर खींचने और उन्हें यहां तक लाने में मदद मिली।" वो बताते हैं, "2010 से तमिलनाडु में हमारे पास 15 फ़ीसदी स्पलायर्स थे। हमारे पास अब 60 फ़ीसदी भारतीय स्पलायर्स तमिलनाडु में ही हैं।

इसलिए रोजगार के नजरिए से देखें तो यह एक बड़ा आंकड़ा है।" प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मेक इन इंडिया' प्रोग्राम का एक मुख्य नारा रोज़गार पैदा करना है ताकि भारत में समावेशी विकास को बढ़ावा दिया जा सके।

यहां सस्ती दरों पर मजदूरी उपलब्ध है

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मोदी ने विदेशी कारोबारियों को भारत में उत्पादन और व्यापार करना आसान बनाने का वादा किया है। लेकिन सत्ता में आने के दो साल और कई घोषणाओं के बाद भी बेरोज़गारी की दर पांच सालों में सबसे ऊपर है। सरकारी सर्वे के मुताबिक़ 77 फ़ीसदी भारतीय घरों में नियमित तौर पर कमाने वाला कोई सदस्य नहीं है और इसलिए बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जिसका जिवन स्तर नहीं सुधर रहा है।

इसके बावजूद चेन्नई जैसी जगहें अब भी विदेशी कंपनियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। चेन्नई का जो इलाका अब मोटर हब बन चुका है, वहां कच्चा माल आसानी से मंगाया जा सकता है। यहां से महज़ 100 किलोमीटर की दूरी पर बंदरगाह मौजूद है जिससे माल मंगाने और भेजने में आसानी होती है। यहां सस्ती दरों पर मजदूरी उपलब्ध है।

'मैंने जो कुछ भी सपने देखे थे वो सब इस नौकरी की बदौलत पूरे हुए'

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घरेलू बाज़ार का विकास भारत में इस रुझान को और बढ़ाता है। कॉलिन मैकडोनल्ड कहते हैं, "आज एक हज़ार में से सिर्फ़ 20 लोगों के पास अपनी गाड़ी है। अगले पांच सालों में यह तेज़ी से बढ़ने वाला है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि 2020 तक कार बाज़ार पचास लाख तक पहुंच जाएगा। भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा कार बाज़ार बन जाएगा।" सुजीता के पास अपनी ख़ुद की कार होना किसी सपने के साकार होने से भी कहीं ज्यादा मायने रखता है।

वो कहती हैं, "मैंने जो कुछ भी सपने देखे थे वो सब इस नौकरी की बदौलत पूरे हुए। मैं अपनी भावनाओं को बयां नहीं कर सकती।" वो एक किसान की बेटी हैं। उन्होंने अपने घर में फ्रिज से लेकर टीवी तक सब कुछ खरीद लिया है लेकिन उनकी महत्वकांक्षा कुछ और ही है।

वो कहती हैं, "मैं एक स्टांपिंग शॉप की मैनेजर बनना चाहती हूं। इसके साथ-साथ मैं इस संस्था की भी मैनेजर बनने का सपना देखती हूं।" वो अपने जैसे दूसरे लोगों के लिए भी ऐसा ही चाहती हैं। वो बताती हैं, "गांव में लोग अपने बच्चों के लिए नौकरी ढूंढ़ने के लिए कहते हैं। इससे मुझे बड़ा गर्व महसूस होता है।"

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