निधन के बाद अर्थी के सामने जमकर नाचे दोस्त, चिट्ठी में लिखी अंतिम इच्छा का यह वीडियो देख आश्चर्य से भर जाएंगे
Viral Video: वक्त बीतता गया और साल 2025 में सोहनलाल जैन का निधन हो गया। जैसे ही यह खबर फैली, उनके दोस्तों को उनका लिखा हुआ पत्र याद आ गया। उन्होंने तय किया कि वे अपने दोस्त की अंतिम इच्छा जरूर पूरी करेंगे। और फिर वह पल आया जिसने सबको भावुक कर दिया।
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यह कहानी है मध्य प्रदेश के मंदसौर शहर की, जहां एक बुज़ुर्ग की अंतिम यात्रा ने सबका ध्यान खींच लिया। इस अंतिम यात्रा में न कोई रोना था, न मातम। यहां तो दोस्त ने अपने पुराने वादे को निभाते हुए नाचकर अपने साथी को विदा किया। दरअसल, 9 जनवरी 2021 को सोहनलाल जैन नाम के व्यक्ति ने अपने दोस्त अंबालाल प्रजापत को एक पत्र लिखा था। इस पत्र की शुरुआत अंतिम प्रणाम से की गई थी। उन्होंने इस पत्र में अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की थी। उन्होंने लिखा था कि जब उनका निधन हो तो उनके दोस्त अंबालाल प्रजापत और शंकरलाल पाटीदार उनकी अंतिम यात्रा में नाचे। उन्होंने खास कहा था कि उनकी मौत पर कोई रोना नहीं होना चाहिए। उन्हें खुशी-खुशी विदा किया जाए। तो आज की इस खबर में हम भी आपको इसी वीडियो के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं।
अंतिम यात्रा हुई धूमधाम से
वक्त बीतता गया और साल 2025 में सोहनलाल जैन का निधन हो गया। जैसे ही यह खबर फैली, उनके दोस्तों को उनका लिखा हुआ पत्र याद आ गया। उन्होंने तय किया कि वे अपने दोस्त की अंतिम इच्छा जरूर पूरी करेंगे। और फिर वह पल आया जिसने सबको भावुक कर दिया। सड़क पर जब सोहनलाल जैन की अर्थी रखी गई तो वहां मातमी धुन नहीं, बल्कि एक खास तरह की धुन बज रही थी। माहौल में गम जरूर था, लेकिन दोस्त ने अपने आंसुओं को छुपाते हुए नाचते हुए उन्हें अंतिम विदाई दी। यह कोई आम डांस नहीं था, बल्कि सच्चे दोस्त की ओर से एक वादा निभाने की कोशिश थी। उसके कदम भले ही थिरक नहीं रहे थे, लेकिन भावनाएं गहराई से झलक रही थीं।
कबीर के शब्दों से बयां की भावना
यह पूरी घटना बहुत ही भावुक करने वाली थी। जिसने देखा वह हैरान रह गया और जिसने सुना वह सोच में पड़ गया कि क्या मौत को भी इतने सादगी और सम्मान से अपनाया जा सकता है? भारत का दर्शन यही सिखाता है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कबीर के शब्दों में भी यही बात झलकती है।
"बारी-बारी आपने, चले पियारे मीत।
तेरी बारी जीयरा, नियरे आवे नीत।।"
इस घटना ने यह साबित कर दिया कि अगर दोस्त सच्चा हो तो वह मौत के बाद भी अपने रिश्ते को निभाने से पीछे नहीं हटता। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि मौत से डरने की जरूरत नहीं, बल्कि अगर हम जीवन को सही तरीके से जिएं तो उसकी विदाई भी एक उत्सव की तरह हो सकती है।