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रहस्यमय राजमहल की पहाड़ियों पर मिले डायनासोर के जमाने के जीवाश्म, 20 करोड़ साल हैं पुराने

Thu, 01 Oct 2020 02:14 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Thu, 01 Oct 2020 02:14 PM IST
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Millions of years old fossils have been found on the Rajmahal hills in Jharkhand
राजमहल की पहाड़ी, झारखंड - फोटो : Facebook/Vaishnavi Bhargava

झारखंड के साहिबगंज जिले में राजमहल की पहाड़ियों पर करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (फॉसिल्स) मिले हैं। इन जीवाश्मों पर जुरासिक काल के पेड़ों की पत्तियों की छाप (लीफ इंप्रेशन) है। इसके 150-200 मिलियन वर्ष पुराने होने का दावा किया जा रहा है। माना जा रहा है कि ये जीवाश्म उन पेड़ों के हैं, जो कभी शाकाहारी डायनासोर का भोजन रहे होंगे। अब इस इलाके में जुरासिक काल (मेसोज्यायिक एज) के जंतुओं के जीवाश्म (एनिमल फॉसिल्स) मिलने की संभावनाएं फिर से बढ़ गई हैं। अगर ऐसा हुआ, तो शोधकर्ताओं के लिए उनकी रुचि के नए दरवाजे खुल जाएंगे। 



साहिबगंज स्थित पीजी कालेज में भूगर्भशास्त्र के प्राध्यापक डॉक्टर रंजीत प्रसाद सिंह ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तालझारी प्रखंड के दूधकोल गांव में मिले इन जीवाश्मों को संरक्षित करने और उस इलाके को इको सेंसेटिव जोन घोषित करने के लिए वे मुख्य सचिव और कुछ दूसरे अधिकारियों को पत्र लिख रहे हैं, ताकि कोरोना संक्रमण कम होने के बाद लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) के वैज्ञानिकों के साथ यहां खुदाई कर और जीवाश्मों की तलाश की जा सके। 

Millions of years old fossils have been found on the Rajmahal hills in Jharkhand
राजमहल की पहाड़ी, झारखंड - फोटो : Facebook/Shiva Ristorante Indiano

दूधकोल गांव साहिबगंज जिले के मंडरो में निर्माणाधीन फॉसिल्स पार्क से 45 किलोमीटर और झारखंड की राजधानी रांची से करीब 425 किलोमीटर दूर है। डॉक्टर रंजीत कुमार सिंह पिछले 12 साल से राजमहल की पहाड़ियों के जीवाश्मों पर शोध कर रहे हैं। वे बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट, आईआईटी खड़गपुर और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की कई रिसर्च टीमों का हिस्सा रहे हैं। इस इलाके में हुए तमाम शोध अभियानों में उनकी भागीदारी रही है और झारखंड में उनकी पहचान जीवाश्म विशेषज्ञ के बतौर है। 

Millions of years old fossils have been found on the Rajmahal hills in Jharkhand
राजमहल की पहाड़ियों से मिले करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook/Rajmahal Wood Fossils Park Jharkhand

रहस्यमय राजमहल की पहाड़ियां 

राजमहल की पहाड़ियों में पहले भी ऐसे जीवाश्म मिल चुके हैं। साहिबगंज के अलावा पाकुड़ और आसपास के दूसरे जिलों में भी ऐसे जीवाश्म मिलते रहे हैं। इस इलाके में पहले मिले जीवाश्मों के अंदर पहले भी ऐसे लीफ इंप्रेशन देखे जा चुके हैं। लेकिन, इससे पहले ऐसे लीफ इंप्रेशन जीवाश्मों के अंदर मिलते रहे हैं। वैज्ञानिकों ने जीवाश्मों को तोड़ने और दो चट्टानों के बीच ऐसे इंप्रेशन देखे थे। यह पहली दफा है, जब ऐसे इंप्रेशन फॉसिल्स के ऊपरी भाग और बहुतायत मात्रा में मिले हैं। इन्हें आसानी से देखा जा सकता है।

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Millions of years old fossils have been found on the Rajmahal hills in Jharkhand
राजमहल की पहाड़ियों से मिले करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook/Rajarshi Koner

जीवाश्म विषेशज्ञ डॉक्टर रंजीत सिंह ने कहा, 'दूधकोल में फॉसिल्स के ऊपर मिले कुछ लीफ इंप्रेशन टिलोफाइलम प्रजाति के पौधों के हैं। ऐसी वनस्पतियां जुरासिक काल में पायी जाती थीं, लेकिन कुछ लीफ इंप्रेशन ऐसे भी हैं, जिनकी पहचान नहीं की जा सकी है। फिलहाल, यह मान सकते हैं कि ये पेड़ काफी लंबे रहे होंगे और शाकाहारी डायनासोर ऐसी पत्तियों और इन पेड़ों की टहनियों को खाते होंगे।' 

उन्होंने यह भी कहा, 'यहां जुरासिक काल के वनस्पति जीवाश्म मिलते रहे हैं, इसलिए धरती की खुदाई कर यह पता लगाने की कोशिश की जानी चाहिए कि क्या यहां जंतुओं के जीवाश्म हैं या नहीं। यह कैसे संभव है कि यहां डायनासोर युग के पेड़ों के जीवाश्म मिलें, लेकिन डायनासोर का निशान नहीं मिले। अगर अच्छी तरह शोध करें, तो राजमहल की पहाड़ियों पर डायनासोर या जुरासिक काल के दूसरे जीव-जंतुओं के जीवाश्म या उनसे जुड़ी दूसरी चीजें (मसलन-अंडा) मिल सकती हैं।' 

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राजमहल की पहाड़ी, झारखंड - फोटो : Facebook/Apna Jharkhand

कैसे मिले जीवाश्म 

दूधकोल गांव की एक लड़की अपने मवेशियों के साथ पहाड़ियों की तरफ गयी थी। तभी महुआ के एक पेड़ के नीचे उसने चमकीला पत्थर देखा और उसे उठाकर घर ले आई। घर के लोगों को लगा कि उस पत्थर पर हिंदू देवी-देवताओं पार्वती और शंकर की आकृतियां बनी हैं। इससे भयभीत होकर वह परिवार उस पत्थर को दोबारा उसी पेड़ के नीचे रख आया। फिर यह बात गांव भर में फैल गई। गांव के लखन पंडित ने बताया कि गांववालों ने उसे देवता मानकर उसकी पूजा-अर्चना शुरू कर दी। अब वहां मंदिर बनाने की प्रक्रिया की जा रही है। दूसरे गांवों के लोग भी इसके दर्शन के लिए आने लगे हैं। वहां इन दिनों मेले-सा नजारा है। ग्रामीणों ने वहां बांस की बल्लियों का घेरा कर दिया है। 

लखन पंडित ने कहा, 'इस बीच मैंने इसकी सूचना भूवैज्ञानिक डॉक्टर रंजीत को दी। तब वे मेरे गांव आए और बताया कि यह पत्थर दरअसल क्वार्ट्ज खनिज है। इसके बाद वे दर्जनों गांववालों के साथ दूधकोल पहाड़ी के दूसरे हिस्सों की तरफ भी गए, तो उन्हें लीफ इंप्रेशन वाले जीवाश्म दिखे। फिर हम सबने उनकी मदद कर थोड़ी-बहुत खुदाई की, तब वैसे कई जीवाश्म मिले। उनपर खूबसूरत पत्तों के छाप हैं। अब गांव के लोग अपने स्तर से उसकी सुरक्षा कर रहे हैं।' 

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