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Hindi News ›   Bihar ›   women chan change the scenario of politics in bihar

महिलाओं का रुख बदल सकता है बिहार का गणित

Sun, 13 Apr 2014 07:28 AM IST
Updated Sun, 13 Apr 2014 07:28 AM IST
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women chan change the scenario of politics in bihar

बिहार की राजधानी से करीब 150 किलोमीटर दूर जमुई रोड पर हाईवे से कुछ हटकर है सोनाय गांïव। मिलीजुली आबादी वाले इस गांव में चुनावों पर पुरुषों से बात करने पर अलग अलग राय सामने आती है।

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साथ बैठकर ताश खेलते हुए भी इस बात पर एक राय नहीं है कि किस पार्टी का जोर है। कोई मोदी का तो कोई नीतीश का तो कोई लालू का जोर बताता है।

लेकिन जब आप महिलाओं से बात करने की कोशिश करते हैं तो पहले तो वह शरमाकर जवाब देने से कतराती हैं। आस पास खड़े पुरुषों को देखकर वही दोहराती हैं, जो उनकेपति कह रहे हैं। लेकिन जब पुरुषों को दूर हटाकर उनकेमन को कुरेदा जाता है तो ज्यादातर सुर निकलते हैं कि उनके दिल में तीर छाप(जदयू) के लिए खास जगह है।

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हमारी बेटियां साईकिल पर बैठकर स्कूल जाने लगी हैं

women chan change the scenario of politics in bihar

महिलाओं के एक समूह के साथ खड़ी साबो देवी से जब पूछा जाता है कि जब पुरुष अलग अलग राय दे रहे हैं तो आप लोग तीर छाप की बात क्यों करती हो तो सीधा सा जवाब होता है कि जब से तीर(जदयू का निशान) की सरकार आई है, हमारी बेटियां साईकिल पर बैठकर स्कूल जाने लगी हैं और सुरक्षित घर लौटने लगी हैं।

लगभग यही बात सोनाय से तीन सौ किलोमीटर से भी ज्यादा दूर बक्सर के सोनवर्षा में एक टीकी केंद्र पर खड़ी महिलाओं ने भी कही। रमा देवी ने कहा कि हमरा वोट ओकरे साथ है जे हमें सुरक्षा और शिक्षा देई।

अगर यह पूरे बिहार की महिलाओं केरुख का संकेत है तो माना जा सकता है कि जनता दल(यू) ने अपना एक नया जनाधार वर्ग तैयार किया है। इसलिए उसे कम करके नहीं आंकना चाहिए।

लोकसभा चुनावों के तीसरे चरण में बिहार की छह सीटों पर मतदान हो चुका है। शेष 34 सीटों पर मतदान होना है। जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति वाले इस हिंदी प्रदेश में भाजपा लोजपा गठबंधन, जनता दल(यू) और राजद-कांग्रेस गठबंधन केबीच लगभग सभी सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला है। तीनों ही पक्षों के अपने अपने जातीय गणित हैं, लेकिन एक गणित जो पूरे चुनाव का गणित बना बिगाड़ सकता है, वह है महिलाओं का रुख।

महिलाओं का रुख जानना मुश्किल

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आमतौर पर पुरुष प्रधान भारतीय समाज में माना जाता है कि महिलाओं का वोट भी उसी को जाता है जिसके पक्ष में घर के पुरुष मुखिया की राय होती है। बिहार भी इसका अपवाद नहीं है।

लेकिन इस बार अगर बिहार में महिलाओं के चुनावी रुख का अंदाज लगाना कुछ मुश्किल हो रहा है।

भाजपा गठबंधन को उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी केप्रति लोगों में जो आकर्षण बढ़ा है, उससे महिलाओं का अधिकांश वोट उनके पक्ष में पड़ेगा। वहीं कांग्रेस राजद गठबंधन केनेताओं का दावा है कि सोनिया गांधी, राबड़ी देवी और अब मीसा भारती के मैदान में आने से महिलाओं का समर्थन उन्हें मिल सकता है।

जबकि जद(यू) को इस बात का पूरा भरोसा है कि बिहार में लालू युग केजंगल राज में सबसे ज्यादा असुरक्षित महिलाएं ही थीं और नीतीश कुमार की सरकार ने कानून व्यवस्था सुधार कर, पंचायतों एवं नगर पालिकाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देकर, राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करके और लड़कियों को स्कूल जाने केलिए प्रेरित करने के लिए साईकिल बांटने की योजनाओं की वजह से महिलाओं में जद(यू) और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केप्रति समर्थन पक्का हुआ है।

वैसे बिहार के कई गांव और कस्बों में घूमने पर ज्यादातर महिलाओं ने चुनावी सवालों पर चुप्पी साध ली और उनके पतियों ने ज्यादा मुखरता से अपनी बात रखी और दावा भी किया जहां वह वोट देंगे, घर की महिलाएं भी वहीं वोट देंगी।

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