विकास और जातीय लामबंदी के बीच दुविधा में मतदाता
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बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। चुनावी रण में इस बार मोहरे जरूर पुराने हैं, लेकिन चाल सबकी नई है। मुख्य मुकाबला दो गठबंधनों के बीच दिखाई दे रहा है, लेकिन गठबंधनों की ढीली गांठ पूरे चुनावी माहौल को दिलचस्प बनाए हुए है। सुबह जाति के खोल से निकल विकास के मुद्दे पर बात करने वाले शाम को फिर जाति के खोल में समा जाते हैं।
सामाजिक और जातीय समीकरण लामबंद होकर बिखर रहे हैं। वहीं, मतदाताओं की चुप्पी विश्लेषकों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। मुकाबला नरेंद्र मादी के नेतृत्व वाले राजग और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच ही है, लेकिन वाम दलों की एका तीसरे गठबंधन के रूप में मैदान में है। वैसे पप्पू, सपा, एनसीपी और ओवैशी चौथे विकल्प या वोट कटुआ की भूमिका में खुद को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।
ऐसे में यह कहना गलत होगा कि वोट दो भागों में ही बंटेंगे। दूसरी ओर पहले एनसीपी और बाद में सपा के अलग होने से महागठबंधन की गांठ कमजोर हुई है।
राहुल किए हुए हैं किनारा
कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा जरूर है, लेकिन उपाध्यक्ष राहुल गांधी राजद प्रमुख लालू प्रसाद के साथ मंच साझा करने से अब तक परहेज किए हुए हैं।
बकौल रघुवंश प्रसाद, जिस तरह गठबंधन को लेकर जनता एकजुट हो गई है, वैसी नेताओं में एकजुटता नजर नहीं आ रही है। राजग की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। दलितों के महानेता बनकर सीटें झटकने की कोशिश में लोजपा के रामविलास पासवान और हम के जीतनराम मांझी के बीच तकरार सामने है। इन दोनों को मनाने की कोशिश में खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लगे हुए हैं।
गठबंधन के अंदर रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी बहुत सहज नहीं हैं। राजग की सबसे बड़ी समस्या भाजपा के अंदर का विरोध है। यही कारण है कि नीतीश के मुकाबले पार्टी कोई चेहरा लाने से परहेज करती दिख रही है। पिछले एक सप्ताह में आधा दर्जन से अधिक सभाओं में सुशील मोदी के खिलाफ नारेबाजी हो चुकी है।
एक-एक विधानसभा क्षेत्र में दो या दो से अधिक बागी उम्मीदवार भाजपा के लिए किसी विरोधी से ज्यादा खतरनाक साबित होंगे। यही हाल जदयू और राजद के अंदर भी है लेकिन वहां बडे़ पैमाने पर नेताओं को पहले ही नाराज किया जा चुका है। सामाजिक समीकरण बनाने के चक्कर में भाजपा ने जो नीति बनाई वह उसके लिए सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है।