भुखमरी से सपनों तकः वो दलित जो अब पिछड़ते नहीं
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'कौन बनेगा करोड़पति' में जाना और सुपरस्टार अमिताभ बच्चन से मिलना किसी के लिए भी खास हो सकता है। लेकिन बिहार के दानापुर के मनोज कुमार का वहां तक जाना समाज में एक बड़े बदलाव की कोशिश की तरफ इशारा करता है।
मनोज कुमार का संबंध बिहार की बेहद गरीब मुसहर जाति से है। लेकिन उनकी जिंदगी अब बदल गई है और उनकी आंखों में इंजीनियर बनने का सपना पलता है।
मनोज ही नहीं, बल्कि उनके समुदाय के लगभग तीन सौ बच्चे पटना के शोषित समाधान केंद्र में बेहतर भविष्य के रास्ते पर निकल पड़े हैं। एक ऐसा स्कूल जिसमें इस बेहद पिछड़े तबक़े के छात्रों को मुफ़्त रहने, खाने और पढ़ने की व्यवस्था है।
बढ़ता मुसहर समुदाय
सीबीएसई से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को जब मैंने अंग्रेज़ी में बातें करते हुए देखा तो एक पल के लिए लगा कि किसी कॉन्वेंट स्कूल के बच्चों के बीच बैठा हूं। उन्हें अंग्रेज़ी में बातें करते मेरी हैरानी का सबब यही था कि मैंने भी उनकी छवि इस आधार पर बनाई कि वे कैसे दिखते हैं। लेकिन जल्द ही यह छवि टूट भी गई।
इसी स्कूल के सूरज इस साल 12वीं की परीक्षा में बैठने वाले हैं और वह कहते हैं, “दावे से कह सकता हूं कि 90 प्रतिशत से कम अंक नहीं लाएंगे।”
उनका सपना बिहार प्रशासनिक सेवा में जाना है। वह कहते हैं, “मैं इसलिए प्रशासनिक सेवा में जाना चाहता हूं ताकि वे लोग जानें कि मुसहर समुदाय के लोग भी ऊपर उठ सकते हैं, अच्छी-अच्छी सेवाओं में जा सकते हैं और उनमें भी क्षमता है।”
वहीं मनोज कुमार छह अप्रैल को आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठने की तैयारी कर रहे हैं।
इस तरह हुई शुरुआत बदलाव की
इस स्कूल की शुरुआत साल 2005 में रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी जेके सिन्हा ने की थी। वह बताते हैं कि इस स्कूल का उद्देश्य सबसे पिछड़े और दबे कुचले समुदाय के लिए कुछ करना है। वह कहते हैं, “मुसहर, दलितों में महादलित के नाम से जाने जाते हैं। इनका नाम मुहसर क्यों पड़ा, क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि ये चूहे खाते हैं। मूस यानी चूहा और आहार – मुसहर। ये भूमिहीन और खेतिहर मजदूर लोग हैं, जिनका न जाने कब से शोषण होता रहा है।”
सिन्हा कहते हैं की गरीबी के कुचक्र में फंसे इन लोगों को बाहर निकालने का सिर्फ एक ही जरिया है और वह है उच्च कोटि की शिक्षा। शोषित समाधान केंद्र के पीछे अपनी इस प्रेरणा के बारे में सिन्हा एक पुराना क़िस्सा बताते हैं। सिन्हा कहते हैं, “साल 1968 की बात है। मैं आईपीएस की अपनी ट्रेनिंग के दौरान एक ग्रामीण इलाक़े में तैनात था। पता चला कि मुसहर चोरों के गैंग का लीडर एक झोपड़ी में छिपा है।
जब हम उसे पकड़ने गए, तो उस व्यक्ति को हमने सूअरों के बीच सोता हुआ पाया। यह देख कर मैं स्तब्ध रह गया। ऐसी गरीबी कभी नहीं देखी थी। तभी तय किया कि जब समय और संसाधन होगा तो इन लोगों के लिए कुछ करेंगे।”समय आया 2005 में जब जेके सिन्हा रिटायर हुए और दिल्ली से अपने गृह नगर पटना पहुंचे। चार बच्चों से शुरू किए गए उनके शोषित समाधान केंद्र में अब 300 से ज्यादा बच्चे हैं और उनका इरादा साल 2020 तक इनकी संख्या एक हजार तक करना है।
इतने गरीब की खाए चूहे
मनोज कुमार के केबीसी में जाने के बाद जिन लोगों को पहली बार मुसहर समुदाय के बारे में जानने को मिला, उनमें इलाहाबाद की शांभवी भी शामिल हैं। कई अलग-अलग तरह के काम कर चुकी शांभवी को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई समुदाय इतना भी पिछड़ा होगा कि उसे भूख मिटाने के लिए चूहे खाने की नौबत आ जाए।
अब वह समय-समय पर यहां आती हैं और बच्चों को पढ़ाने में मदद करती हैं लेकिन जब वह पहली बार पटना के शोषित समाधान केंद्र में आई तो ख़ासी हैरान हुईं।
वह बताती हैं, “जब आप ऐसी किसी जगह जाते हैं तो कुछ खास धारणाएं दिमाग में लेकर जाते हैं। यहां मेरा पहला ही दिन था। मैं फ्रेश होने के लिए नीचे गई तो मैंने देखा कि वहां पर एक बच्चा अपने दोस्त से बोलता है- डूड पास मी द टॉवेल (यार, मुझे जरा तौलिया देना)। मुझे झटका लगा, क्योंकि इन बच्चों से मुझे ये तो उम्मीद थी ही नहीं।”
कुछ इसी तरह ही हैरानी और दिलचस्प बातों से सिमरनप्रीत सिंह ओबरॉय का भी सामना होता रहता है। वह रहने वाले तो आगरा के हैं लेकिन इस स्कूल में प्रिंसिपल के तौर पर काम संभाल रहे हैं।
'सरकार ने नहीं की कोई मदद'
वह यंग इंडिया फ़ेलोशिप कार्यक्रम का हिस्सा रहे हैं, लेकिन जब उन्हें शोषित समाधान केंद्र के बारे में पता चला तो इससे जुड़े बिना नहीं रह सके।
वह बताते हैं, “यहां के बच्चे किसी चीज को हल्के में नहीं लेते हैं। हर चीज पर वे सवाल उठाते हैं। क्यों पढ़ना है, क्लासें 12 ही क्यों होती हैं। किसने यह तय किया। सारे सवालों के जवाब मुझे भी नहीं पता। ये सवाल मुझे सोचने के लिए मज़बूर करते हैं और किसी भी अध्यापक के लिए यही कामयाबी है।”
सिमरनप्रीत कहते हैं, "सब बच्चे एक जैसे ही होते हैं। इन्हें भी अलग न समझा जाए। अगर हमें इन्हें अलग तरीक़े से देखेंगे तो भेदभाव वहीं से शुरू हो जाता है। यह बात सही है कि इस स्कूल का मिशन और सोच अलग है, लेकिन बच्चे वैसे ही हैं।" अभी शोषित समाधान केंद्र स्कूल किराए पर ली हुई इमारत में चलता है लेकिन पटना में ही दो एकड़ जमीन पर स्कूल की एक भव्य इमारत बन रही है।
जेके सिन्हा बताते हैं कि उन्हें सरकार की तरफ़ से तो अब तक किसी तरह की मदद नहीं मिली है लेकिन कई संगठन और जाने माने लोगों ने उनकी मदद की है।
सपनों की ऊंची उड़ान
'कौन बनेगा करोड़पति' में मनोज कुमार के जीते 25 लाख रुपये भी इसी स्कूल के काम आए। लेकिन इसी स्कूल ने उनकी ज़िदंगी में उजाला भरा है और अब वह छह अप्रैल को आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठने जा रहे हैं।
मनोज कहते हैं कि शोषित समाधान केंद्र ने उनकी ज़िंदगी को ही बदल दिया है। वह कहते हैं, “यहां आकर पढ़ाई को लेकर नज़रिया बदल गया। आज हमारे मां बाप को भी यकीन है कि हमारे बच्चे आगे चलकर कुछ ज़रूर करेंगे।”
जिस इमारत में अभी यह स्कूल चल रहा है, वो दिखने में बेहद सामान्य लगती है, लेकिन यहां मौजूद छात्रों को देखकर लगता है कि कई सपने उड़ान भरने को तैयार हैं।