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Hindi News ›   Bihar ›   Patna News ›   Tej Pratap vs Tejashwi : Tejashwi Yadav will take policy decisions of RJD Tej Pratap not happy with this

Tej Pratap vs Tejashwi: राजद के नीतिगत फैसले लेंगे तेजस्वी यादव, क्या इससे खुश नहीं तेज प्रताप? जानें सब कुछ

Sun, 05 Jun 2022 07:36 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 05 Jun 2022 07:36 PM IST
सार

तेजस्वी यादव पहले से ही अपने सहयोगियों के द्वारा ये सभी फैसले ले रहे थे लेकिन पार्टी के विधायकों और विधान पार्षदों की ओर से 'अधिकृत' किए जाने के बाद एक तरह से उनपर मुहर लगा दी गई है कि वही राजद के अहम नीतिगत फैसले  लेंगे।

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Tej Pratap vs Tejashwi : Tejashwi Yadav will take policy decisions of RJD Tej Pratap not happy with this
तेजस्वी, तेजप्रताप - फोटो : PTI

विस्तार

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव और उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव के बीच तनातनी की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। एक बार फिर इसी तरह की खबर है। दरअसल राजद के विधायकों और विधान पार्षदों ने पिछले सप्ताह बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को पार्टी के अहम नीतिगत फैसले लेने के लिए अधिकृत किया। इसका मतलब यह है कि तेजस्वी अब पार्टी के लोकसभा और विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों या उसके राज्यसभा और विधान परिषद के उम्मीदवारों को लेकर फैसला ले सकेंगे। पार्टी के नेताओं को पद आवंटित कर सकेंगे। माना जा रहा है कि इस ताजपोशी से तेज प्रताप खुश नहीं हैं। 
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तेजस्वी यादव पहले से ही अपने सहयोगियों के द्वारा ये सभी फैसले ले रहे थे लेकिन पार्टी के विधायकों और विधान पार्षदों की ओर से 'अधिकृत' किए जाने के बाद एक तरह से उनपर मुहर लगा दी गई है। उन्हें आधिकारिक तौर पर अपने पिता और पार्टी के रूप में अपने आपको निर्विवाद नेता के रूप में घोषित करना था। राजद सुप्रीमो और उनके बीमार पिता लालू प्रसाद यादव उन्हें अपना मार्गदर्शन देना जारी रखेंगे। 
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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजद के इस कदम को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का समर्थन मिला हुआ है लेकिन उनके बड़े भाई और बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव अभी भी नाराज चल रहे हैं। तेज प्रताप हाल ही में राज्यसभा नामांकन के लिए असफल कोशिश कर चुके हैं। राज्यसभा की सीट के लिए लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी की सबसे बड़ी बेटी मीसा भारती पर पार्टी द्वारा उन्हें प्राथमिकता देने का कोई सवाल ही नहीं था। मीसा को पार्टी के दूसरे राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में भी नहीं चुना जा सकता था क्योंकि दो भाई-बहनों का नामांकन इसके लिए राजनीतिक रूप से विनाशकारी होता। इसके अलावा तेज प्रताप यादव को वास्तव में कभी बी एक गंभीर राजनेता के रूप में नहीं माना गया है। 
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इससे पहले भी दोनों भाइयों के बीच तब फरवरी 2022 में तनातनी देखने को मिली थी जब तेजस्वी यादव को राजद का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की अटकलें शुरू हो गईं थीं। तब तेज प्रताप ने तेजस्वी के अध्यक्ष बनने की संभावना को खारिज करते हुए कहा था कि उनके पिता पहले से ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उन्होंने शुरू से ही संगठन को बहुत अच्छी तरह से चलाया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष वहीं हैं और वही रहेंगे। 

तेज प्रताप, राजद के साथ-साथ तेजस्वी के सामने अपनी ताकत दिखाने की कई कोशिशें कर चुके हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने धर्मनिरपेक्ष सेवक संघ, लालू-राबड़ी मोर्चा और छात्र जनशक्ति परिषद जैसे गैर-राजनीतिक मंचों का गठन किया है। आरएसएस के काउंटर में मुट्ठीभर समर्थकों के साथ उन्होंने डीएसएस बनाया था, लेकिन यह सोशल मीडिया से आगे नहीं बढ़ पाया। 2019 के आम चुनाव से पहले गठित लालू-राबड़ी मोर्चा नाम का एक ऐसा मंच बनाया था जिसने राजद के खिलाफ तीन निर्दलीय उम्मीदवारों को खड़ा किया था। हालांकि तीनों को सफलता नहीं मिली थी। इसके अलावा हाल ही में उन्होंने जनशक्ति परिषद का गठन किया है जो अपनी ही पार्टी की कीमत पर कुछ समर्थकों को आकर्षित करने का उनका एक और प्रयास है। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ''राजद के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी अब तेज प्रताप यादव के विद्रोह के साथ सामंजस्य बिठा चुकी है। कौन जानता है, वह निकट भविष्य में अपनी पार्टी बना सकते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि उन्हें एक गंभीर नेता के रूप में नहीं लिया जाता है। उन्हें एक बड़े भाई के रूप में लिया जाता है जो अपने राजनीतिक हिस्से के लिए बेताब हैं। वह मुख्य रूप से अपने कुछ समर्थकों को लोकसभा और विधानसभा टिकट देने का अधिकार मांग रहे हैं लेकिन पार्टी यह नहीं मान सकती है। उन्हें अभी कुछ पावर मिल सकती है लेकिन उन्हें हाशिए पर रहना होगा। तेजस्वी अब निर्विवाद रूप से राजद नेता हैं और तेज प्रताप को इसे तेजी से स्वीकार करना होगा।'' 


बता दें कि राजद सुप्रीमो लालू चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने के बाद से बीमार चल रहे हैं। वह जेल में कई सालों तक सजा काट चुके हैं। फिलहाल वह जेल से बाहर हैं लेकिन पिछले पांच साल से दलगत राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। लालू प्रसाद यादव ने साल 2015 में आखिरी बार चुनाव प्रचार किया था। हालांकि पार्टी राज्य और केंद्र स्तर पर विभिन्न सदनों के चुनावों के लिए उम्मीदवारों के चयन जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर उनकी सलाह और मार्गदर्शन लेती है। फिलहाल लालू ने तेजस्वी यादव को ही पार्टी के लगभग सभी फैसले लेने की अनुमति दी है। 
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