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Namami Gange: लुप्तप्राय डॉल्फिनों के संरक्षण में जुटे डॉल्फिन मैन ऑफ इंडिया; नमामि गंगे पर दो टूक, इससे नाखुश

Sun, 03 Nov 2024 07:14 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: हिमांशु प्रियदर्शी Updated Sun, 03 Nov 2024 07:14 PM IST
सार

Namami Gange: डॉल्फिन मैन ऑफ इंडिया का मानना है कि गंगा और उसकी सहायक नदियां केवल जल स्त्रोत नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के समृद्धि का प्रतीक हैं। गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन को संरक्षित करके वे नदियों की पारिस्थितिकी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

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Namami Gange: Dolphin Man of India RK Sinha, playing an important role in conservation of Ganges dolphins
डॉल्फिन मैन ऑफ इंडिया रविंद्र कुमार सिन्हा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में डॉल्फिन मैन के नाम से मशहूर प्रोफेसर रविंद्र कुमार सिन्हा ने गंगा और उसकी सहायक नदियों में लुप्तप्राय डॉल्फिनों के संरक्षण को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। लगभग तीन दशकों से डॉल्फिन संरक्षण में समर्पित, आरके सिन्हा न केवल बिहार के पहले पद्मश्री से सम्मानित वैज्ञानिक हैं, बल्कि उन्होंने देश भर में पर्यावरण संरक्षण का आदर्श स्थापित किया है। उनके कार्य को न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है और वे संरक्षण के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक हस्ताक्षर बन गए हैं।

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डॉल्फिन संरक्षण के लिए समर्पण
रविंद्र कुमार सिन्हा पिछले 31 वर्षों से गंगा और उसकी सहायक नदियों में डॉल्फिनों के संरक्षण पर काम कर रहे हैं। उनका प्रयास मुख्य रूप से गंगा के बेसिन में पाई जाने वाली गंगा नदी की लुप्तप्राय डॉल्फिनों पर केंद्रित है। उन्होंने डॉल्फिनों को शिकार से बचाने के लिए लगातार काम किया है और मछुआरों को डॉल्फिन ऑयल के विकल्प के रूप में एक नया समाधान उपलब्ध कराया है, जिससे डॉल्फिनों की जान को कोई खतरा नहीं हो।
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सम्मान और मान्यता
रविंद्र कुमार सिन्हा को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्मश्री सहित दस बड़े पुरस्कारों से नवाजा गया है। उन्हें बिहार के पहले वैज्ञानिक होने का गौरव प्राप्त है, जिन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उनका काम न केवल भारतीय बल्कि विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा भी सराहा गया है। उनकी योजनाओं को कई पर्यावरण संगठनों ने आदर्श माना है।
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शैक्षणिक और प्रशासनिक योगदान
रविंद्र कुमार सिन्हा का संबंध बिहार के जहानाबाद जिले के एक छोटे से गांव से है। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में लंबे समय तक काम किया। बाद में नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपति बने। अपने चार साल के कार्यकाल में उन्होंने जम्मू-कश्मीर के श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी के कुलपति के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं।
 
डॉल्फिन मैन की प्रेरणा
रविंद्र कुमार सिन्हा का मानना है कि गंगा और उसकी सहायक नदियां केवल जल स्त्रोत नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के समृद्धि का प्रतीक हैं। गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन को संरक्षित करके वे नदियों की पारिस्थितिकी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका यह समर्पण हमें पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करता है और बताता है कि कैसे व्यक्तिगत प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।

 
‘मेडिकल वेस्ट गंगा में जा रहा’
नमामि गंगे परियोजना को लेकर रविंद्र कुमार सिन्हा ने कहा कि मेडिकल वेस्ट को जलाकर नष्ट करना चाहिए और तरल वेस्ट को गंगा में नहीं बहाना चाहिए। लेकिन मैं देख रहा हूं कि पटना जैसे शहर और अन्य शहरों में भी मेडिकल वेस्ट गंगा में जा रहा है। इस पर हम लोगों ने शोध किया है और पेपर पब्लिश किया है कि कितने तरह के रेसिस्टेंट बैक्टीरिया और केमिकल्स (खतरनाक) इसमें आ गए हैं, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। गंगा एक्शन प्लान यानी नमामि गंगे योजना से मुझे संतुष्टि है और बहुत अच्छी बात है। उन्होंने आगे कहा कि टेम्स वाटर क्लीनिंग दुनिया की सबसे पहली नदी साफ करो योजना थी। काफी लंबे समय तक चली है वो योजना, सैकड़ों वर्ष तक चली है तो आज टेम्स नदी बिल्कुल प्रदूषण मुक्त मानी जाती है।
 
आम लोगों और सरकारों से की सहभागिता की अपेक्षा
आरके सिन्हा ने कहा कि मेरा यही मानना है कि काम अगर होता रहेगा तो गंगा एक दिन साफ होगी। लेकिन आम आदमी की जितनी सहभागिता चाहिए वह नहीं मिल रही है। आज भी दुनिया भर की प्लास्टिक जा रही है वहां। मूर्ति विसर्जन के समय भी बहुत सारे खतरनाक केमिकल्स उसमें चले जाते हैं। इन चीजों के लिए भी हमें मल्टीप्रोंग्ड एक एप्रोच की जरूरत है कि हर तरह से हमको गंगा को साफ रखना है। इसके लिए आम जनता की सहभागिता चाहिए और राज्य सरकारों से भी उतनी ही सहभागिता चाहिए, जितनी नमामि गंगे के लिए हमारी केंद्र सरकार तत्पर है।

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