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Bihar: देशभर में प्रसिद्ध है देवी बगलामुखी का सिद्धपीठ मंदिर, अष्टधातु की प्रतिमा के सामने स्थापित विशेष यंत्र

Fri, 26 Sep 2025 08:49 PM IST
तिरहुत-मुजफ्फरपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुज्जफरपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुज्जफरपुर Published by: तिरहुत-मुजफ्फरपुर ब्यूरो Updated Fri, 26 Sep 2025 08:49 PM IST
सार

Bihar News: मंदिर में स्थापित मां बगलामुखी की प्रतिमा अष्टधातु की बनी हुई है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां हल्दी, दही और पीले फूलों से पूजा करने की विशेष परंपरा है।

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Muzaffarpur Bihar news : mata baglamukhi temple popular abroad for special worship navratra
प्रसिद्ध मां बगलामुखी पीतांबरी सिद्धपीठ मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार के मुजफ्फरपुर शहर के पूर्वी हिस्से, कच्ची सराय रोड पर स्थित है प्रसिद्ध मां बगलामुखी पीतांबरी सिद्धपीठ मंदिर। यह मंदिर देवी बगलामुखी के प्रमुख सिद्धपीठों में से एक माना जाता है। नवरात्र के दौरान यहां का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। खासकर सप्तमी की रात को यहां विशेष पूजा और तांत्रिक साधना होती है, जिसमें देश और विदेश से दर्जनों तांत्रिक शामिल होते हैं। यही कारण है कि यह मंदिर तंत्र साधना का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां न केवल मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों से, बल्कि पूरे बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, नेपाल और देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है कि यहां 21 दिन लगातार दर्शन करने से मां हर मनोकामना पूर्ण करती हैं।

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अष्टधातु की प्रतिमा और पूजा की विशेष परंपरा
मंदिर में स्थापित मां बगलामुखी की प्रतिमा अष्टधातु की बनी हुई है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां हल्दी, दही और पीले फूलों से पूजा करने की विशेष परंपरा है। श्रद्धालु अपनी मन्नतें मांगते हैं और मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। मंदिर में स्थापित सहस्त्रदल महायंत्र इस स्थान को अन्य मंदिरों से अलग बनाता है। इसे मंदिर के गर्भगृह के नीचे स्थापित किया गया है। मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से सौभाग्य की प्राप्ति होती है और दुखों का निवारण होता है। गुरुवार के दिन इसकी विशेष पूजा का महत्व बताया जाता है।
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नवरात्र पर तांत्रिक साधना
नवरात्र विशेषकर सप्तमी की रात्रि में मंदिर परिसर तांत्रिक साधना का केंद्र बन जाता है। इस दौरान अघोर तांत्रिक साधक बड़ी संख्या में जुटते हैं और पूरी रात हवन एवं तांत्रिक क्रियाएं संपन्न करते हैं। इसके लिए मंदिर के पीछे चार हवन कुंड बने हुए हैं। साधना के समय आम श्रद्धालुओं की सहभागिता वर्जित रहती है और महिलाओं के प्रवेश पर भी प्रतिबंध होता है।

मंदिर की स्थापना की कहानी
कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना महंत देवराज के पूर्वजों ने की थी। वे मूल रूप से वैशाली राज्य के महुआ आदलपुर से यहां आकर बसे थे। मां बगलामुखी उनके परिवार की कुलदेवी थीं। मंदिर की स्थापना से पहले उनके पूर्वजों ने कोलकाता के एक तांत्रिक से गुरु मंत्र लिया था और उनकी प्रेरणा से इस मंदिर का निर्माण किया। इस मंदिर की स्थापना वास्तु और तांत्रिक विधि से की गई थी। यहां स्थापित प्रतिमा भी तांत्रिक प्रक्रिया से ही स्थापित मानी जाती है। धीरे-धीरे तंत्र साधना और चमत्कारिक अनुभवों के कारण श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई और आज यह मंदिर पूरे देश में आस्था और साधना का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

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