वो 5 अचूक हथियार, जिनसे लालू ने छीन ली मोदी से जीत
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बिहार के नतीजों के बाद संभवतः राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक जीवन का आंकलन नए सिरे से किया जाए, जिसके दो हिस्से हों- पहला चारा घोटाले में जेल में जाने से पहले का और दूसरा उसके बाद का।
सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव ने जमानत पर बाहर आने के बाद अपनी राजनीतिक दिशा और दशा नए सिरे से तय की। कहते हैं सियासत में कामयाब वही होता है जो हवा का रुख भांपकर सियासी चाल चले...और बिहार चुनाव में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने ये काम बखूबी किया।
केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद दाल, प्याज और खाने-पीने की चीजों पर महंगाई से लेकर काला धन मामले तक केंद्र सरकार की सुस्त चाल को लालू ने ठीक से समझा...और अपने मोहरे कुछ इस तरह बिठाए कि मोदी और शाह की 'विजयी जोड़ी' भी उनसे पार नहीं पा सकी।
बिहार में नीतीश के साथ मिलकर लालू ने मोदी को शुरुआत में ही ऐसी सियासी पटखनी दी कि मोदी लाख कोशिशों के बाद भी उठ नहीं पाए और बिहार ने एक बार फिर लालू को सियासत का शहंशाह मान लिया।
अगड़ा-बनाम पिछड़ा की लड़ाई के हीरो बने लालू
बिहार में यूं तो चुनावी मंच से विकास के लाख दावे किए गए, लेकिन असली खेल जाति का था...और इस खेल के माहिर खिलाड़ी लालू प्रसाद यादव ही निकले। बिहार चुनाव को अगड़ा-पिछड़ा की लड़ाई में बदलकर लालू एक बार फिर पिछड़ों के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरकर सामने आए।
बिहार में यूं तो सरकार नीतीश कुमार की थी लेकिन लालू ने पूरा चुनाव अपने ऊपर केंद्रित कर लिया। लालू जानते थे कि बिहार में आज भी जाति की राजनीति ही जीत का असली मंत्र है इसीलिए उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण को लेकर दिए गए बयान को खूब जोर-शोर से उठाया...और हालात यहां तक बेकाबू हो गए कि पूरी भाजपा भागवत के बयान से हुए डैमेज कंट्रोल में जुट गई।
मोदी ने जब-जब मंच से लालू के कथित जंगलराज का जिक्र किया...तब-तब यादव और निचले तबके का वोट एक-एक इंच लालू की ओर सरकता गया...और इसी कछुआ चाल से लालू ने जीत का परचम लहरा दिया। लालू ने मोदी के जंगलराज के आरोप को पिछड़े तबके के अपमान से जोड़ दिया।
मोदी ने आरक्षण को लेकर कई बार यह जताने की कोशिश की, कि भाजपा आरक्षण के पक्ष में है... लेकिन तब तक ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी थी और निचले तबके का बोट लालू-नीतीश को वोट देने का मन बना चुका था।
इस अखाड़े में सिर्फ लालू का दांव चला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में नीतीश कुमार को निशाने पर लिया और उनकी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए। अगर यह चुनाव केवल मोदी और नीतीश के बीच होता तो शायद परिणाम कुछ और होते, लालू इस कमजोर कड़ी को समझ गए।
लालू ने एक तय रणनीति के तहत मोदी को उस अखाड़े में बुलाया, जहां केवल और केवल लालू का दांव चलता है...और उनकी ये चाल कामयाब भी हो गई जब मोदी ने लालू की तुलना शैतान से कर दी। यहीं नहीं खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी मोदी के पीछे पीछे इस अखाड़े में चले आए।
लालू ने इसका जवाब मोदी को ब्रह्मपिशाच कहकर तो दिया, लेकिन असल में इसके बाद लालू का वो मकसद पूरा हो गया, जिसके लिए उन्होंने मोदी को घेरा था। बिहार की जनता के लिए लालू के बयान नए नहीं थे, लेकिन एक प्रधानमंत्री के मुख से ऐसे बयान मतदाताओं को रास नहीं आए।
...और यहीं मोदी और शाह, लालू के भंवरजाल में फंस गए। लालू ने भाजपा के दोनों दिग्गजों से अपने खिलाफ बयान दिलवाए ताकि वो पिछड़े तबके की सहानुभूति बटोर सकें। लालू ने उनकी बेटी और बेटों पर दिए गए मोदी के बयान को भी जोर-शोर से उठाया।
भीड़ आज भी लालू को सुनती है...
बिहार चुनाव में कई चीजें बदलीं लेकिन नहीं बदला तो लालू का मजाकिया अंदाज...लालू ने अपने पुराने ठेठ अंदाज में भीड़ को अपनी रैलियों में बुलाया और जमकर मसखरी की। जनता ने उनकी बातों पर खूब ठहाके लगाए और यही ठहाके वोटों में बदल गए।
इस चुनाव में भीड़ के अंदर लालू को सुनने के लिए एक अजब सी उत्सुकता थी। अपने नेता को लंबे समय बाद इस रूप में देखकर बिहार की जनता गदगद थी और लालू ने भी हवा का रुख भांपकर मोदी से लेकर शाह तक, सभी को अपने मजाकिया अंदाज में घेरा।
मंच से कैमरामैन को हड़काना हो या लाइटमैन की खिंचाई...लालू को जब मौका मिला, उन्होंने जनता को खूब हंसाया। लालू को ये बात अच्छी तरह मालूम थी कि उनके पास ये शायद आखिरी मौका है अपनी खोई हुई जमीन पाने का। इस चुनाव में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र ने केवल 30 रैलियां की, वहीं लालू ने सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए कुल 242 रैलियां की।
जनता का मर्म सिर्फ लालू ने समझा
बिहार की चुनावी रैलियों में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाकर जनता से उन्हें बिहार में मौका देने की अपील करते दिखे, वहीं लालू ने अपनी रैलियों में मोदी की नीतियों और वायदों को ही निशाने पर लिया।
लालू ने जनता के उस मर्म को समझ लिया, जिसमें मोदी सरकार के कुछ वायदों को लेकर कुछ नाराजगी थी। चाहे काले धन का मामला हो या दाल और प्याज के दाम पर मचा हाहाकार हो...मोदी ने जनता से जुड़े हर मुद्दे को अपने भाषण के केंद्र में रखा।
लालू यह भी जानते थे कि बिहार की जनता डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया के वायदों से कोसों दूर है इसीलिए उन्होंने मोदी को सिर्फ छोटे-छोटे रोजमर्रा के मुद्दों पर घेरा, जिनका शायद मोदी के पास कोई जवाब नहीं था।