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Hindi News ›   Bihar ›   Kharna Is Celebrated On The Second Day Of Chhath Puja, Worship Of Sun, Puja Vidhi And Niyam In Hindi

Chhath Puja : आज शाम में छठ का खरना पूजा, यह गलतियां न करें; क्या किया जाता है आज... यह भी जानें

Sat, 18 Nov 2023 10:49 AM IST
आदित्य आनंद न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: आदित्य आनंद Updated Sat, 18 Nov 2023 10:49 AM IST
सार

Chhath Puja Second Day Kharna : चार दिन तक चलने वाले छठ महापर्व को काफी नियम से करना पड़ता है। यह प्रकृति को चलाने वाले सूर्यदेव की उपासना का पर्व है। यह देवी कात्यायनी से आशीर्वाद मांगने का पर्व है।

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Kharna Is Celebrated On The Second Day Of Chhath Puja, Worship Of Sun, Puja Vidhi And Niyam In Hindi
खरना का प्रसाद बनातीं महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नहाय खाय के साथ छठ महापर्व की शुरुआत हो चुकी है। चार दिन तक चलने वाले महापर्व को काफी नियम से करना पड़ता है। यह प्रकृति को चलाने वाले सूर्यदेव की उपासना का पर्व है। यह देवी कात्यायनी से आशीर्वाद मांगने का पर्व है। आज खरना है। इसमें महिलाएं उपवास रखती हैं। शाम को मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ की खीर का महाप्रसाद बनाती हैं। इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद से ही निर्जला व्रत की शुरुआत हो जाती है। इसका पारण (व्रत खोलना) अगले दिन सूर्य देने के बाद ही किया जाता है।

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खरना पूजा और प्रसाद ग्रहण के समय इन बातों का रखें ध्यान
छठ पर्व में शुद्धता का विशेष महत्व माना जाता है। अधिकतर छठवर्ती खरना का प्रसाद मिट्टी के बने नये चूल्हे पर ही बनातीं हैं। खरना पूजा के समय और प्रसाद ग्रहण करते समय बाहर से तेज आवाज नहीं आना चाहिए। इस दौरान घर से सदस्यों को तेज आवाज में बोलने या बम-फटाका फोड़ने या कोई अन्य तेज आवाज काम करने से मना किया जाता है। क्यों कि मान्यता है कि खरना पूजा के समय या खरना प्रसाद ग्रहण करते समय तेज आवाज सुनने या शोर-शराबा व्रत में बाधा उत्पन्न करती है। मान्यता यह भी है प्रसाद ग्रहण करते समय व्रती के कान में तेज आवाज आने से वह तत्काल भोजन छोड़ देती हैं। इसलिए तेज आवाज न हो, इसका खास ध्यान रखा जाता है।
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मिट्टी के चूल्हे की कीमत 100 से 200 के बीच
इधर, आज बाजार में मिट्टी का चूल्हा भी बिक रहा है। आज मिट्टी के चूल्हे की कीमत 100 से 200 के बीच है। वहीं, जलावन के लिए आम की लकड़ी का भी बाजार सजकर तैयार है। आम की लकड़ी 20 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है।छठ व्रती रूबी झा ने कहा कि खरना के पूजा के बाद हमलोग 36 घंटे का उपवास रखकर रविवार को अस्ताचल गामी भगवान भास्कर को अर्घ देने के बाद सोमवार की सुबह उदयाचल गामी भगवान भास्कर को अर्घ देने के बाद इस छठ व्रत के अनुष्ठान का समापन हो जाएगा। 
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छठ में सबसे ज्यादा महत्व किसका है?
ज्योतिष-कर्मकांड विशेषज्ञ पंडित अरुण कुमार मिश्रा के अनुसार, किसी एक बात का ज्यादा या किसी का कम महत्व नहीं है। लेकिन, सबसे ज्यादा ध्यान शुद्धता और सात्विकता का रखना पड़ता है। कार्तिक मास शुरू होते ही लहसुन-प्याज खाना अमूमन बंद हो जाता है। धनतेरस या दीपावली से ज्यादातर लोग सेंधा नमक खाना शुरू करते हैं। यह एक तरह से शुद्धता का माहौल बनाने का प्रयास होता है। छठ के लिए अनिवार्य शुद्धता का मानक पूरा करने के लिए पूर्ण सात्विक होना पड़ता। नहाय खाय से छठ व्रत की शुरुआत होती है। मन-कर्म और वचन से शुद्ध होना पड़ता है। नहाय खाय का मतलब तामसी प्रवृत्तियों की सफाई है। शारीरिक रिश्तों में दूरी रखनी होती है। कम और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना होता है ताकि शरीर का भीतरी हिस्सा भी साफ हो जाए। नहाय खाय में अरवा चावल का भात और चने की दाल के साथ कद्दू डालकर बने दलकद्दू को हर कोई खाता है। यह पूजा के लिए अलग रखे बर्तन में बनता है और यथासंभव मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी की आग पर। यह भोजन शुद्ध घी में ही बनता है।


व्रती के लिए सबसे कठिन क्या है?
नहाय खाय के साथ ही व्रती की परीक्षा शुरू होती है। नहाय खाय में शुद्ध-सात्विक भोजना मिला, लेकिन उसमें सेंधा नमक रहेगा। खरना के दिन, मतलब सूर्यादय से शाम में पूजा होने तक जल भी ग्रहण नहीं करना है। खरना पूजा 18 नवंबर को है। सूर्यास्त के बाद शाम में भोजन ग्रहण करने से पहले एकाग्रता से छठी मैया का पूजन किया जाता है। छठी मैया का विधिवत पूजन यानी दीप प्रज्वलन, पुष्प अर्पण, सिंदूर अर्पण इत्यादि क्रम से पूजन किया जाता है। इसके बाद मीठा भोजन ग्रहण करना है। मुख्यतः खीर, घी लगी रोटी अथवा घी में तली पूड़ी एवं फल ग्रहण किया जाता है। इस दिन व्रती यही सब भोजन करते हैं। पूजा के समय उसी कमरे में खाने के साथ जो पानी पी सके, उसके बाद सुबह के अंतिम अर्घ्य के बाद ही अन्न-जल ग्रहण का विकल्प होता है। मतलब, 18 नवंबर को एक बार शाम में मीठा खाना और पानी। फिर, सीधे 20 नवंबर को अर्घ्य देने तक निर्जला।

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