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Bihar : विशेषज्ञों के पांच पदों में चार खाली; X-Ray और लैब में एक-एक कर्मी, 15 में चार GNM; कैसे रुकेगा रेफर?
Sat, 04 Jul 2026 07:23 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गयाजी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गयाजी
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 04 Jul 2026 07:23 PM IST
सार
Bihar News: सरकार रेफरल रोकने की तैयारी में है, लेकिन अस्पतालों में क्या रातोंरात सबकुछ बदलने की स्थिति है? 15 अगस्त मियाद है। ऐसे में 'अमर उजाला' ने ग्राउंड पर देखा कि विदेशी पर्यटकों के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र गया में स्वास्थ्य-संसाधन कैसा है?
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बोधगया पीएचसी के ऑपरेशन थियेटर में सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड की कमी दिख रही।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अगले माह से बिहार सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) से मरीजों के रेफरल पर रोक लगाने की तैयारी में है, ताकि अधिक से अधिक मरीजों का इलाज स्थानीय स्तर पर हो सके। लेकिन अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बोधगया के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की जमीनी हकीकत इस योजना की राह में बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट में अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों, तकनीकी कर्मियों और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी उजागर हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब विश्व प्रसिद्ध बोधगया PHC का यह हाल है तो जिले के अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कितने तैयार होंगे?
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स्टाफ की भारी कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों का टोटा
बोधगया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में करीब दस डॉक्टरों की आवश्यकता है। पांच विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वीकृत पदों में फिलहाल सिर्फ एक विशेषज्ञ डॉक्टर कार्यरत हैं। लैब टेक्नीशियन के तीन पदों के मुकाबले केवल एक कर्मी है। एक्स-रे टेक्नीशियन के तीन पदों में भी सिर्फ एक ही कार्यरत है। 16 जीएनएम के स्वीकृत पदों के विरुद्ध मात्र चार जीएनएम तैनात हैं। इसके अलावा कई अन्य तकनीकी और सहायक कर्मियों की भी कमी बनी हुई है।
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इंफ्रास्ट्रक्चर भी बना बड़ी बाधा
सिर्फ मानव संसाधन ही नहीं, अस्पताल का बुनियादी ढांचा भी जरूरत के अनुरूप नहीं है। ओपीडी भवन का अभाव है। कई जरूरी जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड जैसी आवश्यक सेवाएं नहीं होने के कारण गंभीर मरीजों को रेफर करना मजबूरी बन जाती है।
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प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी बोले: 100 प्रतिशत तैयार नहीं हैं
बोधगया पीएचसी के प्रभारी चिकित्सक डॉ. मनोज कुमार ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि सरकार की मंशा सराहनीय है। गरीब मरीजों का इलाज उनके अपने स्वास्थ्य केंद्र में हो, इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में सभी पीएचसी पूरी तरह तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सड़क दुर्घटना, मारपीट या सिर में गंभीर चोट जैसे मामलों में सीटी स्कैन की आवश्यकता होती है, जिसकी सुविधा यहां उपलब्ध नहीं है। इसी तरह कई मरीजों को अल्ट्रासाउंड की जरूरत पड़ती है, लेकिन अस्पताल में इसकी भी व्यवस्था नहीं है। ऐसे मामलों में मरीजों को रेफर करना मजबूरी है।
पर्यटन स्थल के अनुरूप नहीं हैं सुविधाएं
डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि बोधगया अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल है और यहां स्वास्थ्य सुविधाएं भी उसी स्तर की होनी चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि अस्पताल में कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। इसके बावजूद डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी सीमित संसाधनों में 24 घंटे मरीजों को सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बोधगया का ऑपरेशन थिएटर बेहतर है, लेकिन आईसीयू संचालित करने के लिए एनेस्थेटिस्ट नहीं है। स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ सहित अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की भी पोस्टिंग नहीं हो सकी है। फिलहाल सामान्य चिकित्सकों के भरोसे अस्पताल की पूरी व्यवस्था चल रही है।
दवाएं उपलब्ध, लेकिन संसाधन बढ़ाने की जरूरत
प्रभारी चिकित्सक के अनुसार अस्पताल में आवश्यक दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन केवल दवा उपलब्ध होने से बेहतर स्वास्थ्य सेवा नहीं दी जा सकती। यदि सरकार चाहती है कि सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ही अधिकांश मरीजों का इलाज हो, तो अस्पतालों के भवन, उपकरण, जांच सुविधाएं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
ग्राउंड रिपोर्ट से उठे बड़े सवाल
बिहार सरकार की नई व्यवस्था का उद्देश्य मेडिकल कॉलेजों और बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव कम करना है। लेकिन बोधगया पीएचसी की तस्वीर बताती है कि बिना पर्याप्त डॉक्टरों, तकनीकी कर्मियों और आधुनिक जांच सुविधाओं के रेफरल पर पूरी तरह रोक लगाना आसान नहीं होगा। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पहले स्वास्थ्य केंद्रों को संसाधनों से सशक्त बनाना होगी, तभी मरीजों को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराया जा सकेगा।
(इनपुट- रंजन सिन्हा, गयाजी)